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शिर्डी का साईंबाबा संस्थान दुआ, दवा, सेवा तथा भक्ति और शक्ति की अनोखी मिसाल है। भक्तों को बेहतर सुविधाओं के साथ-साथ शिर्डी के विकास की विभिन्न योजनाएं लागू की जा रही हैं। नए-नए उपक्रम स्थापित किए जा रहे हैं। सन २०१८ साईं बाबा का समाधि शताब्दि वर्ष है। इस वर्ष दुनिया भर से करोड़ों लोग यहां आएंगे, मानो साईं भक्तों का महाकुंभ लगने वाला है। पेश है साईं संस्थान के नवनियुक्त अध्यक्ष भवन निर्माता सुरेश हावरे जी से हुई विस्तृत बातचीत के मुख्य अंश-

आप अध्यात्म से अधिक विज्ञान के आधार पर जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति हैं। आपके कर्तृत्व के कारण आप शिर्डी साईं संस्थान के अध्यक्ष बने, विज्ञान और अध्यात्म इन दोनों की ओर देखने का आपका दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।

शिर्डी देवस्थान एक आध्यात्मिक केंद्र है और मैं विज्ञान का विद्यार्थी। मुझे ऐसा लगता है, यदि हम अपनी परंपरा देखें, हिन्दुस्थान का इतिहास देखें, सांस्कृतिक विरासत देखें तो कहीं पर भी विज्ञान और अध्यात्म में संघर्ष नहीं दिखाई देता है। मेरा मानना है कि ये दोनों क्षेत्र एक दूसरे के विरोधी नहीं अपितु पूरक हैं। यूरोप में ऐसा विरोधाभास दिखा था जब अध्यात्म और विज्ञान में संघर्ष हुआ। यूरोप की धर्मसत्ता कहती थी कि पृथ्वी केंद्र में है और पृथ्वी के इर्दगिर्द सारे ग्रह तारे घूमते हैं, सूर्य भी पृथ्वी के इर्दगिर्द घूमता है। लेकिन विज्ञान का यह मानना था सूर्य केंद्र में है। पृथ्वी और अन्य तारे सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। धर्मसत्ता का आग्रह था कि उनकी मान्यता ही विज्ञान को माननी होगी। धर्मसत्ता के विरोध में जाने वाला व्यक्ति राष्ट्र का विरोधी है, मानवता का विरोधी है। उसे दण्ड भोगना होगा। गैलीलियो को अपनी जिंदगी जेल में काटनी पड़ी, बहुत अत्याचार सहने पड़े। अंतत: यह सिद्ध हुआ कि जो विज्ञान कहता था वह सत्य था, जो धर्मसत्ता मानती थी वह गलत था। सूर्य केंद्र में है और पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है। यह एक संघर्ष का उदाहरण अगर देखें तो इसके अलावा और कोई संघर्ष के उदाहरण अपने इतिहास में या मानव के इतिहास में नहीं है। मनुष्य के लिए विज्ञान में जो अनुसंधान हुए हैं उनका सारा केंद्र मनुष्य के बाहरी जीवन को प्रभावित करने वाला है। अध्यात्म मनुष्य के आंतरिक जीवन का विचार करता है। विज्ञान अंदर नहीं जाता; अध्यात्म बाहर नहीं जाता। अध्यात्म मनुष्य के अंतराल का विचार करता है।

भारतीय आध्यात्मिक तत्वज्ञान मानवता की ओर किस दृष्टिकोण से देखता है?

भारतीय अध्यात्म यह मानता है कि सारे जीव एक परमेश्वर के अंग हैं, एक ही परमेश्वर की संतान हैं। सारे एक दूसरे से सम्बंधित हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं, एक दूसरे का विकास करने में ही सब का भला है। स्वयं के अलावा अन्य लोगों को हम पराया समझते हैं। अध्यात्म उन्हें पराया नहीं समझता। परायों को मदद करने की इच्छा जब मन में पैदा होती है तभी ऐसा माना जाता है कि आध्यात्मिकता की ओर प्रवास शुरू हो गया है। मैं इस आध्यात्मिकता की तरफ जा रहा हूं।

“शिवभावेय जीवसेवा” यह अध्यात्म एवं सेवा का सूत्र है। शिर्डी संस्थान के द्वारा संपन्न हो रही शिव और जीव सेवा की संकल्पना किस प्रकार है?

शिर्डी के साईं बाबा का जीवन चरित्र ‘सत् चरित्र’ के रूप में विद्यमान है। साईं चरित्र के दो प्रमुख अंग हैं। एक है साईं लीला और दूसरा है साईं सेवा। साईं लीला में बाबा ने जो अनन्य लीलाएं की हैं; जिन्हें लोग चमत्कार कहते हैं, उसकी जानकारी है। साईं बाबा के जीवन का दूसरा अंग है, जो उन्होंने अपने पूर्ण जीवन काल में किया है वह है ‘सेवा’। उन्होंने स्वयं अपने हाथ से रूग्णों की सेवा की, पीड़ितों को मदद की, जो भूखे हैं उनके लिए भिक्षा मांग कर अन्न प्राप्त किया। अन्न को पीसा, आटे से खाना बनाया, खिलाया। वृक्षारोपण के काम उन्होंने किए हैं, बच्चों के शिक्षा के काम उन्होंने किए हैं, गोरक्षा के काम उन्होंने किए हैं, प्राणीमात्र की भलाई का विचार उन्होंने किया है। यह साईं की सेवा का पहलू है। हैजा-प्लेग जैसा कोई रोग अगर पूरी तरह फैल गया, तो उससे लोगों को बचाने के लिए, लोगों को मुक्त कराने के लिए, आराम दिलाने के लिए उन्होंने कई सारी लीलाएं कीं। उन लीलाओं का उद्देश्य भी सेवा ही रहा। लोक सेवा, गरीबों की, दीन-दुर्बलों की, पीड़ितों-वंचितों की सेवा बाबा ने अपने जीवन में की। उन्हीं का अनुसरण साईंबाबा संस्थान कर रहा है।

शिर्डी संस्थान का पदभार स्वीकारने के बाद आपको किस प्रकार की कमियां महसूस हुईं? उन कमियों की पूर्ति के लिए कौन से प्रयास किए जा रहे हैं?

यदि सेब का पेड़ जड़ से उखड़ जाए तो वह सब की नजर में आता है। परंतु जब पेड़ से सेब गिरता है तो किसी का ध्यान नहीं जाता। उस पर सिर्फ न्यूटन का ही ध्यान जाता है। ऐसा नहीं था कि न्यूटन के देखने सेपहले सेब नहीं गिरे या न्यूटन के बाद सेब नहीं गिरे। परंतु सिर्फ न्यूटन ने इसका अवलोकन किया और उसमें उन्हें गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत मिला। सीधी-सादी बातों में बड़ी-बड़ी बातें छिपी होती हैं। सीधी बातों को समझना, मेरा स्वभाव रहा है।

तीन साल पहले मैं शिर्डी गया था। भीड़ इतनी थी कि उस भीड़ के कारण मैं समाधि स्थान से बाहर ढकेल दिया गया। मुझे बहुत दुख हुआ, गुस्सा भी आया। मैंने मेरी पत्नी से कहा कि शिर्डी की यह मेरी आखरी यात्रा है। अब इसके बाद मैं शिर्डी कभी नहीं आऊं गा। उसके बाद मैं तीन साल वहां नहीं गया। चार महीने पूर्व मुझे मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस और रावसाहब दानवे ने बुलाया और मुझे संस्थान का अध्यक्ष बनाने की बात की तो मैंने उन्हें यह सारी घटना बताई तथा पूछा कि ‘मेरा विचार क्यों कर रहे हैं?’ तो उन्होंने कहा कि ‘देखो! हो सकता है कि बाबा का बुलावा आया होगा।’मैंने भी वह संकेत समझा और जिम्मेदारी का स्वीकार किया।

पदभार स्वीकारने के बाद मैं सर्वप्रथम जो सर्वसाधारण लाइन होती है, जिसमें भक्त जाता है उस लाइन में यह देखने गया कि भक्त किस सुविधा-असुविधा का अनुभव करता है। मैंने देखा, दो महिलाएं अपने नन्हें बच्चों को दूध पिला रही थीं। निश्चित ही यह संकोचजनक बात थी, परंतु वे भी क्या करतीं; क्योंकि वहां ‘बेबी फीडिंग रूम’ नहीं था। अत: हमने तुरंत ‘बेबी फीडिंग रूम’ बनवाया और ऐसी सभी महिलाएं जिनके गोद में बच्चे होते हैं, उन्हें उनके परिवार सहित बिना लाइन में खड़े हुए दर्शन कराने की व्यवस्था की।

फिर आगे बढ़ा तो कुछ वृद्ध व्यक्ति दिखे। यह भी मुझे बहुत असुविधाजनक बात लगी कि वृद्धों को तीन-चार घंटे लाइन में खड़े रह कर दर्शन लेना पड़ता है। अत: हमने यह निर्णय लिया कि जितने भी ज्येष्ठ नागरिक हैं उनके लिए एक अटेंडंट के साथ सीधे दर्शन की व्यवस्था की जाए। फिर देखा कि कुछ रूग्ण हैं, कुछ दिव्यांग व्यक्ति हैं। उनकी असुविधा को देखते हुए उनके लिए भी सीधे दर्शन की व्यवस्था की गई है। दर्शन हॉल में पर्याप्त मात्रा में प्रकाश योजना नहीं थी, हवा ठीक नहीं थी, पानी ठीक से नहीं था। अत: नई खिड़कियां बनाने और सारी लाइन को वातानुकूलित करने के लिए कहा है। ये निर्णय हमने किए हैं।

दस रुपये प्रति बोतल के हिसाब से पानी की बिक्री हो रही थी। मैंने इसे रोक दिया। मेरे विचार से पानी पर सभी का अधिकार है। वह बिना मूल्य सभी को मिलना चाहिए। ऐसे ही दो रुपये में चाय की बिक्री हो रही थी। उस पर भी मैंने रोक लगा दी। अब चाय, कॉफी, दूध, बिस्कीट सभी भक्तों को मुफ्त में दिया जाएगा। प्रसाद भक्तों को दर्शन के पहले दिया जाता था। अब मैंने प्रसाद का वितरण दर्शन के बाद करवाया। उदी प्रसाद के लिए भी अलग से लाइन लगानी पड़ती थी। अब उसका वितरण भी प्रसाद के साथ ही होता है। बाबा को लोग फूल हार चढ़ाते हैं। रोज लगभग एक टन फूल वहां पर चढ़ाए जाते हैं। हमने एक प्रयोग किया; अब जो फूल लोग चढ़ाते हैं उन फूलों को भक्तों को ही ‘प्रसाद’ रूप में दिया जाता है। भक्तों ने भी बहुत आनंद से इसे स्वीकार कर लिया।

आपका संकल्प है कि शिर्डी का साईं संस्थान सेवाभिमुख हो। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपने क्या कदम उठाए हैं?

शिर्डी में दो अस्पताल हैं- एक जनरल हॉस्पीटल और दूसरा सुपर स्पेशालिटी हॉस्पीटल। सुपर स्पेशालिटी हॉस्पीटल में बड़ी बीमारियों जैसे मस्तिष्क से सम्बंधित, न्यूरोलॉजिकल, स्पाईन, ऑस्थाग्रॉजी, नेफरोलॉजी आदि का इलाज किया जाता है। सर्जरी की जाती है। रोज ४०००/५००० पेशंट की ओपीडी वहां पर होती है। लगभग २०० डॉक्टर वहां पर विद्यमान हैं। कुल मिला कर ५५० बेड दोनों हॉस्पीटल में हैं। साढ़े पांच लाख लोग प्रति वर्ष इसका लाभ उठाते हैं। जिनके पास पीला या केसरी राशन कार्ड है उनके लिए ये सारी सुविधाएं मुफ्त है। उनके साथ जो अटेंडेन्ट आते हैं उनके निवास, भोजन की व्यवस्था भी यहां पर है। दुर्गम इलाकों से लोग यहां पर आते हैं। यहां दुआ और दवा का संगम है। यह ऐसा एक केंद्र है जहां केवल हॉस्पीटल ही नहीं वरन् यहां थेलसेमिया के पेशंट को रक्तदान किया जाता है और वह भी निःशुल्क। यहां ब्लड बैंक भी है। यहां हर गुरुवार को रक्तदान शिविर लगते हैं।

हमने विचार किया कि, क्यों न हर रोज रक्तदान वहां पर कराएं और महाराष्ट्र में अन्य जगहों से अलग-अलग ब्लड बैंकों को बुला कर उनको रक्तदान का लाभ उठाने के लिए कहा जाए। अत: अब यह योजना बनी है कि यहां रोज रक्तदान होगा। अन्य ब्लड बैंक भी यहां से रक्त ले कर जा सकेंगे। शिर्डी में साईं मंदिर में रक्तदान की एक परंपरा बने ऐसा विचार लेकर के हम आगे बढ़े हैं। दुनिया भर में यह एक चित्र दिखाई दें कि गुरुवार के दिन अन्नदान और रक्तदान दोनों होगा। यह बाबा के चरणों में भक्तों ने अर्पित की हुई सेवा होगी। जैसे तिरुपति में केशदान होता है वैसे ही साईं मंदिर शिर्डी में रक्तदान हो। यही हमारा प्रयास है। ऐसे कई सारे सेवा कार्य वहां पर चलते हैं, स्कूल, कॉलेज चलते हैं। आय टी आय चलता है। आय टी आय तो अत्याधुनिक तथा नावीण्यपूर्ण हैं। सारे प्रवेश ऑनलाइन होते हैं।
विशेष बात यह है कि साईं बाबा के जिन भक्तों की इंडस्ट्रीज हैं वे प्लेसमेंट्स के लिए वहां पर आते हैं। ९०% विद्यार्थियों का प्लेसमेंट होता है। यह एक रिकॉर्ड है। मुझे नहीं लगता कि देशभर में और कोई ऐसी आय टी आय होगी जिसका ९०% प्लेसमेंट होता है। देशभर में जो आय टी आय हैं उनमें प्रथम क्रमांक पर साईं संस्थान है। अन्नदान बड़े पैमाने पर होता है। ५०,००० से १,००,००० भक्त रोज अन्नदान का लाभ लेते हैं। यहां सौर ऊर्जा से चलने वाला एक बड़ा रसोई घर है। यहां का सोलर पुरस्कार प्राप्त है। वहां एक साईं भक्त ने चपाती बनाने की मशीन भेंट की है। एक घंटे में २०,००० चपातियां बनाती हैं। इधर से आटा डालो और उधर से चपाती तैयार होकर आती है। कई लोग अन्नदान का लाभ उठाते हैं। लेकिन यहां जूठे खाने का अपव्यय भी बहुत होता है। दिन भर में ढाई टन अनाज बेकार हो
जाता है। ढाई टन का मतलब है कि ५००० लोग भोजन कर सके इतना अनाज फेंक दिया जाता है। जिस द्रोण से भोजन परोसा जाता है उसका आकार बहुत बड़ा था। हमने उसे आधा कर दिया। भक्तों से विनती की कि यह प्रसाद है। इसका अपव्यय न करें। इस तरह से अन्न का अपव्यय ढाई टन से घट कर १ टन पर आया है। १ टन अर्थात प्रति व्यक्ति २७ ग्राम का बेस्टेज। इसे पूरी तरह से रोकना हमारा उद्देश्य।

पर्यावरण संवर्धन के दृष्टिकोण से शिर्डी साईं संस्थान के माध्यम से कौन सी योजनाएं चलाई जाती हैं?

पर्यावरण की दृष्टि से शिर्डी को ग्रीन शिर्डी बनाने का निर्णय हमने किया है। शिर्डी हरीभरी हो। चारों तरफ शिर्डी में पेड़-पौधें लगे। जितने भी रास्ते हैं उसके जो द्विभाजक हैं उसमें पेड़-पौधे लगाएंगे। जितने सर्कल्स हैं उन्हें पेड़-पौधें लगा कर सुशोभित करेंगे। शिर्डी स्वच्छ होगी, भक्तों को स्वच्छता का अनुभव होगा। केवल मंदिर ही स्वच्छ रहे यह उचित नहीं है। पूरे शिर्डी ग्राम को स्वच्छ रखने के लिए हमने एक अभियान चलाने का निर्णय किया कि सारी इंडस्ट्रीज, भक्तगण, विद्यार्थी और नागरिकों को लेकर शिर्डी को स्वच्छ करते हैं। लोगों ने हमसे पूछा कि ‘‘स्वच्छता के बाद जो कचरा जमा होगा उसे कहां डालेंगे।’’ मैंने कहा ‘‘अभी तक जहां डालते थे वहीं।’’ तब उन्होंने कहा कि अभी तक सूखे कुएं में डालते थे। परंतु जिन ६ सूखे कुंओं में कचरा डाला जाता था वे सभी भर चुके हैं। यह बड़ी विकट समस्या थी। मैंने सोचा इस पर कोई टेक्नॉलॉजिकल सोल्यूशन होना चाहिए। मुझे ‘सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट’ का प्लांट लगाना उपयुक्त लगा। अब कुछ ही दिनों मे ऐसा प्लांट लगेगा जो कचरे की समस्या को खत्म कर देगा।

दो और बातें हमने सोची हैं। मुंबई से शिर्डी जाने का एक पालकी मार्ग है। उस पूरे मार्ग पर नीम के पेड़ लगाए जाए। दूसरा यह कि, शिर्डी में जो बाबा का प्रिय नीम वृक्ष है, जिसके नीचे बैठ कर बाबा ने साधना की थी, उस नीम के पत्ते मीठे हैं। उस पेड़ का टिश्यू कल्चर बना कर कई नीम के पेड़ बनाए जाए और उन्हें दुनिया भर में मौजूद साईं मंदिरों को भेंट दिया जाए।

जहां-जहां बड़े आध्यात्मिक संस्थान हैं वहां संस्थान और ग्राम पंचायत या प्रशासन की व्यवस्था के बीच संघर्ष होता है। शिर्डी में किस प्रकार का माहौल है?

माहौल हर जगह एक प्रकार का ही होता है। शिर्डी कोई अलग नहीं है। मतभेद तो होते ही रहते हैं। लेकिन उनमें से सामंजस्यपूर्ण मार्ग निकालना ही कुशलता है। शिर्डी मंदिर और गांव को हमने कभी अलग नहीं माना। गांव की जनसंख्या करीब ४०,००० है और आने वाले भक्तों की संख्या ५० हजार से १ लाख प्रति दिन है। गांव का जो मुख्य व्यवसाय है वह भी भक्तों पर ही निर्भर है। बाहर से आने वाले भक्त गांव के लिए पूरक हैं जिसे गांव के लोगों ने भी जाना है। स्थानीय लोग छोटी-मोटी दुकानें, होटल चलाते हैं। आसपड़ोस के पचास गांव में फूलों की खेती होती है। पचास गांव के किसानों की रोजी-रोटी चलती है। हार फूल, नारियल, प्रसाद बेचने वाले इत्यादि कई लोगों का निर्वाह मंदिर के आधार पर चलता है। लोगों को भी यह भलीभांति मान्य है। शिर्डी का विकास हो यह पहला उद्देश्य रखा है।

शिर्डी साईं संस्थान के माध्यम से के विकास के लिए किस तरह का योगदान दिया जाता है?

अब बाबा की समाधि शताब्दी आने वाली है। उसके उपलक्ष में Infrastructure Development का बड़ा विषय लिया गया है। यहां रास्ते बहुत छोटे हैं। ट्रैफिक बहुत हो जाता है। अत: शिर्डी के लिए बायपास निकाले। कुछ रास्ते वन-वे किए। ११ रास्तों के विकास का प्रकल्प शिर्डी संस्थान के माध्यम से ही लिया गया। उसमें से ९०% पूरे हो गए। यहां पर पानी की भी बड़ी समस्या है। पिछले साल दो महीने संस्थान के निवासालय भी बंद रखने पड़े; क्योंकि पानी की व्यवस्था नहीं थी। शिर्डी ऐसी जगह हैं जहां पर बारिश बहुत कम होती है। वहां पानी की कमी दूर करने के लिए ४ तालाब बने हुए हैं, जिनमें बांध से लाकर पानी जमा किया जाता है। दो महीने के पानी का वहां पर संचय है। अभी संचय क्षमता बढ़ाना एक उपाय है। दूसरा, बिलवंडे बांध शिर्डी से ८० किमी दूर है। उस बांध का पानी शिर्डी के लिए रिजर्व किया गया है। महाराष्ट्र शासन की ओर से बांध से पाइप लाइन के द्वारा शिर्डी में पानी लाने के काम को भी मंजूरी मिली है। यह काम मंदिर की ओर से ही होगा जिसमें लगभग ४०० करोड़ का खर्च होगा।

“ग्लोबल साईं टेंपल समीट” यह किस प्रकार का उपक्रम है? इस उपक्रम के प्रयोजन का मुख्य हेतु क्या है?

साईं मूवमेंट दुनिया की सब से बड़ी मूवमेंट है। देश भर में ३००० से अधिक साईं मंदिर हैं। देश के बाहर विदेशों में ४०० से अधिक मंदिर हैं। केवल अमेरिका में ८० साईं मंदिर हैं। यूरोप, जर्मनी, इंग्लैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, दुबई, मलेशिया, सिंगापूर, आस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैण्ड में भी हैं। इतने बड़े पैमाने पर जो साईं भक्ति का जो विस्तार हुआ है, उसे अभी तक किसी ने एकत्रित नहीं किया। इनमें नेटवर्किंग का अभाव है। हमने यह सोचा कि सारे मंदिर शिर्डी साईं संस्थान के साथ जोड़ दिए जाने चाहिए। शिर्डी साईं संस्थान इन सब का एक केंद्र बने। भक्ति और शक्ति का केंद्र। साईं भक्ति को, साई मूवमेंट को एक संगठित स्वरूप की आवश्यकता है। साईं मंदिर मतलब क्या? साईं मंदिर अन्नदाता होना चाहिए, साईं मंदिर रक्तदान का केन्द्र होना चाहिए, साईं मंदिर में समाज सेवा के उपक्रम होने चाहिए। ऐसे कार्यक्रम स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रख कर सभी मंदिर करें। इसे ही संगठित स्वरुप देने का उद्देश्य है।

क्या सीमा पर शहीद होने वाले जवानों या कर्तव्यपूर्ति के समय शहीद होने वाले पुलिस कर्मियों के लिए संस्थान के माध्यम से सहायता करने की कोई योजना है?

यह विषय मन में जरूर है परंतु अभी तक इसमें कुछ हुआ नहीं है। लेकिन यह विषय बहुत अच्छा है। इस विषय को हम प्राथमिकता देंगे। क्योंकि सैनिक सीमा का सुरक्षा रक्षक है। तभी हम यहां पर चैन की सांस ले सकते हैं, चैन की नींद ले सकते हैं। पुलिस कर्मचारी भी दिनरात अपना कार्य करते रहते हैं। त्योहारों में हम तो खुशियां मनाते हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं। अपने परिवारों के साथ नहीं रहते। ऐसे लोगों का सम्मान होना, उनके प्रति अपने मन में श्रद्धा का भाव होना अत्यंत जरूरी है।

शिर्डी साईं बाबा के वास्तव्य से पुनीत हुआ स्थान है। साईं बाबा की समाधि के दर्शन करने के लिए देश भर से साईं भक्त शिर्डी आते हैं। उन भक्तों को ज्यादा समय शिर्डी में रह कर अध्यात्म एवं पर्यटन का लाभ मिल सके इस विषय में कौन से विचार संस्थान कर रहा है?

साईं दर्शन के लिए लोग आते हैं। साईं दर्शन के बाद भक्त ऐसे ही चला जाए यह ठीक नहीं है। वह भक्ति भाव से भीग कर जाए। भक्ति भाव से परिपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन करने का विचार हमने किया है। एक कार्यक्रम की शुरूआत भी की है। शाम को ४ से ६ बजे तक और रात को ७.३० से ९.३० बजे तक प्रति दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे जिनमें साईं भजन, कीर्तन, साईं संगीत, प्रवचन, समाज जागृति के कार्यक्रम, सामाजिक जानकारी नीतिमूल्यों पर आधारित कार्यक्रम आदि शामिल हैं। एक साईं सृष्टि का प्रकल्प भी हमने सोचा है; जिसे जानेमाने कला निर्देशक नितिन देसाई डिजाइन कर रहे हैं। साईं सृष्टि में अनेक दालान होंगे जिनमें चल चित्र, लाइट और साउंड, म्यूजिकके द्वारा भक्तों को साईं चरित्र दिखाया जाएगा। साईं बाबा की सौ फुट की मूर्ति भी होगी। और बड़े-बड़े २४/२५ दालान उसमें होंगे। दो-तीन घंटे तक साईं चरित्र का अध्ययन करने का अनुभव भक्त ले सकेंगे। साईं लेजर शो कराने का हमने निर्णय किया है। ऐसा एक स्टेडियम होगा जिसमें लोगों का मनोरंजन भी होगा और ज्ञानवर्धन भी होगा। विज्ञान के अलग-अलग शो चलते रहेंगे। साईं भक्तों के साथ-साथ आसपड़ोस के स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थी भी इसका लाभ ले सकेंगे। ३००, ४०० लोग एक साथ आकाश दर्शन का कार्यक्रम देख सके ऐसा एक प्लेनेटेरियम भी वहां पर होगा। एक स्टार गेजिंग गैलरी बनाएंगे जिसमें २५-३० दूरबीनें होगीं। विद्यार्थी शनि, गुरु, शुक्र अलग अलग तारे, वायु मंडल, तारा मंडल देख सकेंगे। वैक्स म्यूजियम भी वहां पर बनाया जाएगा। इसमें भारत भर के संतों की प्रतिकृतियां बनाई जाएंगी। पूरे भारत भर में हर प्रांत में कई संत हैं। यह संतों की भूमि है। इसलिए वहां पर संतों का वैक्स म्यूजियम बनाया जाएगा। ऐसे कई सारे कार्यक्रम करने का विचार है।

२०१८ में ‘साईं समाधि शताब्दी’ वर्ष सपन्न हो रहा है, इस वर्ष में कार्यक्रमों का नियोजन किस प्रकार होगा?

महाराष्ट्र सरकार की ओर से एक समिति नियुक्त की गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में यह समिति नियुक्त हुई है। कुंभ मेले जैसा यह आयोजन होगा। करीब साढ़े चार करोड़ लोग उस वर्ष में शिर्डी में आएंगे। आयोजन, नियोजन, सुरक्षा, आवागमन, कम्यूनिकेशन, ट्रान्सपोर्ट आदि सारी व्यवस्था का अध्ययन किया जा रहा है। केवल शिर्डी में ही यह कार्यक्रम नहीं होगा बल्कि दुनियाभर साईं मंदिरों के द्वारा भी ये कार्यक्रम होंगे। कुछ रेकॉर्ड ब्रेक कार्यक्रम करने का भी विचार किया गया है। एक साथ सारे मंदिरों में गुरुवार को महाआरती का कार्यक्रम हो। एक साथ दुनिया भर में यह रेकॉर्ड बनेगा। करोड़ों लोगों ने साईं बाबा की आरती की है। साईं चरित्र का पारायण किया है। जगह-जगह से पालकी यात्राएं शिर्डी में आती हैं। देशभर से अलग-अलग जगहों से पालकी यात्रा साईं मंदिरों को भेंट करते-करते शिर्डी तक पहुंचे। श्रीनगर, गुवाहटी, गुजरात जैसे भारत के १६ जगहों से ऐसी पालकियां निकलेगी और वे सारी एक ही दिन शिर्डी में पहुंचेगी। इस प्रकार एक पालकी यात्रा का भी नियोजन चल रहा है।

कुछ समय पहले आध्यात्मिक संतों ने शिर्डी संस्थान के प्रति प्रश्न उठाए हैं। उस संदर्भ में आपके विचार क्या हैं?

इसके बारे में मैं यह कहूंगा कि साईं बाबा ने अपने चरित्र में स्पष्ट रूप से लिख रखा है कि ऐसे आरोप-प्रत्यारोप करने वाले कई लोग होंगे। उनका काम उन्हें करने दो और हम अपना काम करें। वाद-विवाद से भी श्रद्धा बड़ी है। श्रद्धा वाद-विवाद पर मात करेगी। श्रद्धा के साथ सबूरी भी जरूरी है। देखा जाए तो धार्मिक क्षेत्र में विवाद होना उचित नहीं है। विवाद भी धार्मिक स्वरूप का नहीं है। विवाद अहंकार स्वरूप का है। मैं बड़ा या तू बड़ा ऐसा विवाद है। आध्यात्मिक क्षेत्र में अहंकार अपने-आप में कमजोरी प्रस्तुत करता है और जो कमजोर है वही विवाद उठाते हैं। बड़े संतों के बारे में विवाद उपस्थित करके अपने-आप को प्रसिद्धि प्राप्त दिलाना यह भी एक उद्देश्य हो सकता है; क्योंकि उसमें मुफ्त में प्रसिद्धि मिल जाती है।

आप अध्यात्म से अधिक विज्ञान के आधार पर जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति हैं। देश के आध्यात्मिक श्रध्दा के स्थान शिर्डी संस्थान के अध्यक्ष के नाते कार्य करते समय आपका अनुभव किस प्रकार रहा?

पहले मैं साईं बाबा के बारे में बिलकुल नहीं सोचता था। और, अब साईं बाबा के अलावा कुछ नहीं सोचता हूं। पहले तीन साल मैं शिर्डी नहीं गया। अब शिर्डी के अलावा कहीं जाता नहीं हूं। बुलावा आता है तभी आप जाते हैं। बाबा कहते हैं तू थोड़े ही आया है, मैंने खींच लिया है तुझे तब तू आया है। मेरी नजर सारे भक्तों पर है। जो भी मेरा स्मरण करेगा मैं उसको कभी नही भूलूंगा। जो भी मेरी उंगली पकड़ लेता है उसे मैं जिंदगी भर नहीं छोड़ता हूं। तू भागता कहां है!

मोबाइल नंबर – 9869206106

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