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दुनिया भर का कूड़ा-कर कट संजो कर पता नहीं क्यों रख लेते हैं? इनकी यह बीमारी पता नहीं कब जाएगी ? अरे सुनते हो…..जरा इधर तो आना। निर्मल बड़बड़ाई। …..कुछ इसी अंदाज में हमारे सन्डे की शुरूआत होती है।
घर की साफ-सफाई का यह दौरा, वैसे तो उन्हें प्रतिदिन पड़ता है, लेकिन संडे का दौरा कुछ ज्यादा ही सीरियस होता है। ……आज वह सुबह से ही मेरी बुक सेल्फ पर मेहरबान हो गई थीं। पता नहीं क्यों?
अरे कहां चले गए… जरा देखो तो……ये किसी काम के तो नहीं हैं। फिर निर्मल की आवाज आई। हे भगवान…..ये संडे पता नहीं क्यों आ जाता है? ये न ही आए तो अच्छा। तुम तो संडे को भी चैन से नहीं बैठने दोगी। कहो क्या हुआ? क्यों चिल्लाए जा रही हो? मैंने कहा।
पास गया तो देखा, एक पैकेट खुला पड़ा था जिससे निकले ढेर सारे कार्ड फर्श पर बिखरे पड़े थे। मैंने एक कार्ड उठाया और पढ़ने लगा। कार्ड के ऊपर मोटे अक्षरों में ‘चित्रशाला’ शब्द छपा हुआ था……यह मेरी पेन्टिग शॉप के उद्घाटन के अवसर का निमंत्रण कार्ड था जिसे मैंने ही बड़े अच्छे तरीके से प्रिंट कराया था। ……कार्ड पढ़ते-पढ़ते मैं बीस-बाईस वर्ष पीछे अतीत में जा पहुंचा। …….इनकी भी एक मजेदार कहानी है……लेकिन अब ये किसी काम के नहीं हैं, इन्हें भी पेपर की रद्दी के साथ बेच देना। यह कहते हुए मैं पुन: अपने रीडिंग रूम में आ गया, वह कार्ड अब भी मेरे हाथ में था। कुर्सी में बैठते ही अतीत के पन्ने खुलने लगे।
मुझे कानपुर यूनीवर्सिटी से १९८० की एम.ए. चित्रकला में गोल्ड मेडल प्राप्त हुआ था। …….घर में पैसे की तंगी थी, जिससे मैं भविष्य को लेकर काफी चिंतित रहता था। वैसे मैं मध्यम श्रेणी के परिवार से था। पिता जी मेरे जन्म से एक माह पहले गुजर चुके थे। शायद इसी से हायर एजूकेशन के लिए मुझे परिवार वालों से प्रापर सपोर्ट नहीं मिल पा रहा था। क्योंकि हमारे ‘संयुक्त परिवार’ के ताऊ जी मुझे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। वह चाहते थे कि मैं भी उनके बेटे की तरह खेती-बाड़ी में हाथ बटाऊं। ताऊ जी के एक ही बेटा था, जिन्हें पढ़ाने का पूरा प्रयास किया गया था किंतु अपनी कुछ आदतों के चलते वह ५ वर्ष में भी हाईस्कूल नहीं पास कर पाए थे।
मेरी विधवा मां ने अनेक विपत्तियां सह कर मुझे पाला था। ईश्वर की कृपा से मैं बचपन से ही पढ़ाई में बड़ा होशियार था। इण्टर तक की पढ़ाई में तो खास व्यवधान नहीं आए थे, किन्तु कालेज की पढ़ाई प्रारम्भ करते ही समस्याएं आने लगीं थीं। वैसे जमीन जायदाद पर मेरा भी पूरा हिस्सा था, किन्तु मालिकाना सत्ता ताऊ जी के हाथ में होने के कारण कई बार कालेज की फीस चुकाने के लिए भी पैसे बड़ी मुश्किल से प्राप्त होते थे। कई बार वो पैसे जमीन में फेंक दिया करते, जो अंागन में फैल जाते। जिन्हें मैं एक-एक कर उठाता था।
एक बार मैं दृढ़ संकल्प करके शहर लौटा था कि अब घर से एक पैसा भी नहीं मागूंगा। अपनी मेहनत से फीस, कमरे का किराया आदि की व्यवस्था करूंगा। इसी संकल्प के कारण कुछ दिनों बाद ही आई दीपावली को मैं अपने गांव नहीं गया था। जब कि हर त्योहार को मैं अपनी मां के पास अवश्य पहुंचता था। मुझे पता था कि मां बड़ी बेसब्री से मेरा इन्तजार करेंगी, किन्तु मेरे लाख चाहने के बाद भी उस बार मेरे पैर घर जाने को तैयार नहीं हुए थे।
इसी मुख्य समस्या के कारण मैं हर समय कुछ न कुछ प्लानिंग किया करता कि आगे की पढ़ाई कैसे चले? इन परिस्थितियों में भविष्य की चिंता लाजिमी थी। ……मेरा एक जिगरी दोस्त था जय। बहुत ही सीधा, सच्चा भरोसेमंद और मिलनसार। हम दोनों क्लासमेट थे। जय मुझ पर बहुत विश्वास करता था, उसे जब भी कोई प्राब्लम आती वह सीधे मेरे पास आ जाता। मेरे पास आते ही उसकी सारी टेन्शन रफूचक्कर क्यों हो जाती थी, भगवान जाने। उसे मेरे प्रति पता नहीं इतना कान्फीडेन्स क्यों था। मैं जो भी करूंगा बिल्कुल ठीक होगा, उसका यह विश्वास मुझे भी अक्सर एक निराले आत्मविश्वास से भर देता।
जय भी एक साधारण परिवार से था। मेरी तरह ही उसके परिवार वाले भी पढ़ाई की गाड़ी को किसी तरह खींच कर यहां तक तो ले आए थे, लेकिन अब आगे सब कुछ तो हम लोगों को स्वयं ही करना था।
भविष्य को लेकर अनेक तरह की योजनाएं हम दोनों के मस्तिष्क में उभरतीं, लेकिन पैसे के अभाव में साकार रूप लेने से पहले ही दम तोड़ देतीं। एम.ए. की पढ़ाई पूर्ण हो जाने के बाद अब क्या किया जाए? समझ में नहीं आ रहा था। ठीक इसी समय किसी ने द्वार पर दस्तक दी। कौन हो सकता है? इस समय? ….. आता हूं….कह कर मैं गया और कुंड़ी खोल दी। अरे जय तुम! आओ आओ, ….यार इस समय मैं तेरे बारे में ही सोच रहा था, मैंने कहा। मेरे बारे में जय ने आश्चर्य से पूछा, अरे भला मुझ से ऐसी कौन सी गुस्ताखी हो गई कि जनाब मेरे ही बारे में सोचते रहते हैं। छोड़ अब ये बता तेरे हालचाल कैसे हैं? कैसा है तू? इस बार काफी दिनों बाद मूहूर्त निकला है तेरा। जरा जल्दी-जल्दी आया कर यार।
मैं तो ठीक हूं…. तू अपनी सुना… तू तो ठीक-ठाक है न? जय का प्रश्न था, मैं बोला क्या सुनाऊं यार? बात कुछ समझ में नहीं आ रही….. हम दोनों ने एम.ए. तो कर लिया, लेकिन….. अब आगे क्या करना है? समझ में नहीं आता। जिंदगी के इक्कीस बाईस वर्ष तो पढ़ाई में खप गए। घर वालों ने तो जैसे-तैसे करके गाड़ी यहां तक खींच दी। अब… हमें ही तो कुछ सोचना पड़ेगा। मैंने दृढ़तापूर्वक कहा। जय बोला अरे यार हम दोनों की थिकिंग भी कितनी मैच करती है। कमाल है, इसी बात को लेकर मैं भी कल से बड़ा व्यथित हूं। कुछ रास्ता न सूझने पर मैं सीधा तेरे पास चला आया। तू तो जानता ही है कि इस मुल्ला की दौड़ सिर्फ मस्जिद तक है। अब तू ही बता क्या करना है?
अरे तू तो समझता है मेरे पास कोई अलादीन का चिराग है कि तू आया और समस्या साल्व? अरे अब तू भी आ गया है तो हम दोनों बैठ कर ठंडे दिमाग से सोचेंगे…… कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा। कहता हुआ मैं चाय बनाने के लिए स्टोव जलाने लगा। चल पहले थोड़ी-थोड़ी चाय हो जाए। अरे यार क्यों खामाखां परेशान होता है? जय ने शालीनता से कहा। नहीं यार मूड बनाने के लिए कुछ तो चाहिए न……. फिर तू तो जानता ही है कि अपनी स्थिति ऐसी भी नहीं है कि मैं ‘किसी दूसरे तरीके’ से मूड बनाने की बात सोचूं। हम दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़े थे। ……मैंने स्टोव जलाकर चाय चढ़ा दी थी।
यार जय तू तो जानता ही है कि आजकल सर्विस का कितना अकाल है। मेरे तेरे जैसे करोड़ों नौजवान अपनी-अपनी पढ़ाई की पूंजी ये डिग्रियां लिए यहां से वहां, उधर से इधर, फुटबाल की तरह मारे-मारे फिर रहे हैं। लेकिन कोई दो टके को भी नहीं पूछ रहा। मैंने एक कटु सत्य जय के सामने रखा। जय बोला हां यार तू बिल्कुल ठीक कह रहा है। है तो बिल्कुल ऐसा ही। फिर हम करें क्या? कुछ तो करना ही होगा न। जय के जवाब में भी एक हकीकत थी। इसीलिए मैं तो इस पक्ष में हूं कि क्यों न हम दोनों कोई अपना बिजनेस शुरू करें? जय का तर्क था।
चूंकि हम दोनों टेक्निकल हैण्ड तो थे ही, ‘इसलिए एक पेन्टिग शॉप खोलने की बात पर सहमति बन गई। उसी दिन जाकर पास की मार्केट में काफी तलाश करने पर एक छोटी सी दुकान २०० रूपए महीने पर किराए पर मिल गई थी। जिसे अग्रिम भुगतान करके हम लोगों ने पेन्टिग का सारा साजोसामान दुकान में ठीक से व्यवस्थित किया था। दुकान का विधिवत उद्घाटन हुआ, माइक बजा, फीता कटा, नारियल फूटा, मिठाई के पैकेट बंटे …….यानि की वह सब हुआ, जो ऐसे अवसरों पर होता है। पेन्टिग शॉप का नाम चित्रशाला रखा गया था, और यही कार्ड शॉप के प्रचार प्रसार हेतु काफी संख्या में वितरित किए गए थे।
उस दिन बड़ी उमंग थी, काफी लोग इकट्ठे हुए थे। पास की एक परचून की दुकान के मालिक श्री गुप्ता जी भी पधारे थे। जिनका नाम ‘मुकेश’ था। प्रारम्भिक परिचय के बाद उन्होंने अपनी दुकान में कुछ लेखन कार्य हेतु बात की। सारी बात समझ कर मैं पेन्ट ब्रुश लेकर उनके साथ पेन्टिग करने चला गया। चूंकि हमारे बिजनेश का यह प्रथम कार्य था अत: हम लोगों ने लेने-देने की कोई स्पष्ट बात नहीं की थी। हां मैंने इतना जरूर कहा था कि आप स्वयं ही समझदार हैं, मेहनत देख कर आप जो भी उचित समझना दे देना।
काउन्टर काफी बड़ा था जिस पर लिखा जाना था। विषय को एक पेपर पर नोट कर के मैंने जगह की ठीक से पैमाइस की। लाइन, बार्डर आदि सेट करके लेखन कार्य में लग गया। दोपहर का समय था, काउन्टर पर सीधी धूप पड़ रही थी। चूंकि पहला कार्य था इसलिए मैंने बड़े इत्मिनान से, बड़े ही रूचिकर ढंग से सारी लिखाई सम्पन्न की थी। मुझे इस कार्य में लगभग पांच घंटे लग गए थे।
कार्य पूर्ण हो जाने पर गुप्ता जी को पेन्टिग कार्य दिखा दिया। लिखाई बड़े ही सुन्दर ढंग से की गई थी। अत: गुप्ता जी भी काफी खुश थे। पहला कार्य संतोषजनक होने पर मैं भी खुश था। मैंने कहा गुप्ता जी अब इजाजत दीजिए, समय काफी हो गया है, दुकान भी बढ़ानी है। वह बोले, ठीक है, अब आप बता दें, आप की सेवा कितनी हुई? मैंने कहा, आप तो स्वयं ही समझ सकते हैं, मेहनत और खर्च को देखते हुए आप जो भी उचित समझें दे दें।
गुप्ता जी अपनी पेन्ट की जेब से कुछ पैसे निकालते हुए मुस्करा कर बोले, लीजिए। मैंने पैसे लेने के लिए खुशी से हाथ बढ़ा दिया। हथेली पर एक सिक्का रख कर वह बोले ठीक है, कम तो नहीं है? मेरी नजर पच्चास पैसे के सिक्के पर पड़ी, मेरी आंखें आश्चर्य से गुप्ता जी को देखने लगीं। प्रत्यक्ष में तो मेरी आंखों से कुछ नहीं निकला लेकिन अप्रत्यक्ष में मेरी आंखों ने बहुत कुछ कह दिया कि यह क्या दे रहे हैं? सर आप तो मेरे पितातुल्य हैं, मैंने चिलचिलाती धूप में खड़े होकर पांच घंटा पेन्टिग की, दस-पन्द्रह रूपये का पेन्ट भी स्वयं ही लगाया। जिसका पारिश्रमिक आप पचास पैसे दे रहे हैं? सिर्फ पचास पैसे? जैसे कि मैं कोई भीख मांग रहा हूं? मैं मुस्कराने का प्रयास करते हुए पुन: बोला गुप्ता जी क्यों मजाक कर रहे हैं? प्लीज, जल्दी कीजिए, मुझे देर हो रही है। मेरी निगाहें गुप्ता जी के सपाट, भावविहीन चेहरे को पढ़ रही थीं। वे बोले अरे आप भी कमाल करते हैं, क्या पचास पैसे कम हैं? तो क्या आप पचास रूपए की उम्मीद लगाए हुए थे? मैं अगर ऐसा समझता तो किसी और से लिखवा लेता। वे….. आगे बोले….. देखिए मैं आपकी मेहनत के हिसाब से आपको उचित पैसे दे रहा हूं, इससे ज्यादा मैं एक कौड़ी भी नहीं दे पाऊंगा। अरे इतनी महंगी लिखाई करते हो तो पहले ही तय कर लेना चाहिए था?
मैं अवाक खड़ा था, जैसे मुझे किसी ने पत्थर का बना दिया हो, मैं आगे कुछ कहने में अपने को समर्थ नहीं पा रहा था। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, कि इस देश में ऐसे लोग भी बड़ी शान से जी रहे हैं।
मैंने महसूस किया कि मेरी आंखें कुछ भी ठीक से नहीं देख पा रही हैं, गले में कुछ अवरोध सा महसूस हो रहा था, मेरी आंखों की कोरों पर दो बड़े से मोती छलक आए थे। मैंने बड़ी बेबसी से दुकानदार की तरफ देखा, और पचास पैसा काउन्टर के ऊपर रख दिया। अपना पेन्टिग का सामान उठाया और वहां से अपनी चित्रशाला की तरफ चल दिया। अनेक प्रकार के भावों से भरे मेरे कदम तेजी से अपनी शॉप की तरफ बढ़ रहे थे। अप्रत्याशित हार का दर्द सीने पर तो था ही किन्तु साथ ही विजय की एक मुस्कान भी थी, कि मैंने उसके पचास पैसे नहीं लिए, क्योंकि शायद वह पैसे उसके लिए ज्यादा कीमत रखते थे। मैं अपनी पलकों के दो अमूल्य मोती भी उसकी दुकान में न खर्च करने में कामयाब हो गया था, उन्हें मैंने अपनी रुमाल में जो छुपा लिया था क्योंकि ऐसे व्यक्तियों के पास इन अमूल्य वस्तुओं की कीमत चुकाने की दम भी तो नहीं होती…..बेचारे रहम के पात्र हैं न।
काफी समय लग गया जय बोला था, वह काफी समय से अपनी मेहनत की पहली कमाई देखने के लिए बहुत उत्सुक था। बताओ कितने पैसे मिले जय की प्रश्नसूचक नजर मुझ पर थी। मैं उससेे नजरें नहीं मिला पा रहा था। जैसे मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया हो। मैं एक तरफ पड़े टूटे से स्टूल पर धीरे से बैठ गया। अरे क्या बात हुई? रमेश भाई, बोलते क्यों नहीं? बताओ तो सही, क्या हुआ?
जय हमें अपनी चित्रशाला बंद करनी पड़ेगी। बन्द करनी पड़ेगी? लेकिन क्यों? जय मैं नज़रे झुकाए हुए ही बोला था, हम इस जमाने में फिट नहीं हो पा रहे हैं। मैंने सारी घटना जय को बयां कर दी। अरे वाह, ऐसे कैसे? यह कोई उनके घर की खेती है? इतने ढेर सारे काम के मात्र पचास पैसे? तुम बैठो, मैैं जा रहा हूं, इस ‘गुप्ता जी’ के बच्चे के पास। अरे उल्लू समझ रखा है क्या उसने? पचास पैसे दे रहा है, जैसे हम कोई भीख मांग रहे हैं। अपने आपको बड़ा चालाक समझता है न वो…, मैं अभी ठीक करके आता हूं उसे, …….जय जाने क्या-क्या बड़बड़ाता हुआ, मेरे मना करने के बावजूद, गुप्ता की दुकान पर जा पहुंचा था।
जय ने अपने पैसे मांगे, लेकिन होना क्या था, वही ढाक के तीन पात, जिसने ठान ही रखा है कि बेईमानी करनी है, जिसकी नियति में ही खोट हो, वहां आप क्या कर सकते हैं? शायद कुछ नहीं। बहसा-बहसी में वहां भीड़ इकट्ठी हो गई। पानी ढलान की तरफ ही भागता है, एक तो लोग कुछ बोले नहीं, तमाशाई बने देखते रहे। एक आध ने कुछ कहना भी चाहा तो ‘गुप्ता’ ने डपट दिया, आप अपना काम कीजिए, यहां फालतू की वकालत करने की जरूरत नहीं है।
अन्तत: लोग जय को ही कहने लगे थे, कि आपको सारी बातें पहले ही तय कर लेनी चाहिए थीं। अभी आप लोग बच्चे हैं? जमाने की कतार में आइए।
जय गुप्ता की दुकान से वापस आया तो उसके मस्तक पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट झलक रही थीं। बिना कुछ कहे वह भी एक टूटी कुर्सी पर आकर बैठ गया। हम दोनों खामोश थे, मानस पटल पर अनेक विचार आ जा रहे थे। हम सोच रहे थे कि क्या वाकई जमाना उन्नति करके बहुत आगे जा चुका है। सहयोग, प्रेम, सम्बन्ध, ईमानदारी, मानवता आदि महज कागज की इबारतें मात्र रह गई हैं। इनका कहीं कोई अस्तित्व नहीं रहा?
बचपन से लेकर आज तक जो भी पढ़ा, सीखा, समझा, वो सब झूठ था। वह सारी मानवतावादी बातें हम लोग फालतू में ही पढ़ते आए थे? इन सबका जब जिंदगी से कोई लेना देना ही नहीं है तो फिर ये हमें क्यों पढ़ाई जाती हैं? इसी तरह के अनेकानेक प्रश्नों ने जैसे हम दोनों की सारी शक्ति क्षीण कर दी थी।
हम दोनों ‘चित्रशाला’ का सामान पैक करने लगे थे। …….फिर सारा सामान अपनी-अपनी साइकिलों में लाद कर दो किलोमीटर पैदल चल कर अपने क्वार्टर पर पहुंच गए। इस समय तक रात के करीब दस बज चुके थे अत: जय भी मेरे पास ही ठहर गया था। हम लोगों की भूख मिट चुकी थी, कुछ करने की इच्छा नहीं हो रही थी। एक दो बातें करने के बाद हम दोनों बिस्तर पर लेट गए, लाइट ऑफ थी। कब किसको नींद आयी, पता नहीं चला ?
क्या सोच रहे हो? लो चाय पी लो, और तैयार हो जाओ। बाजार चलना है, बहुत सा सामान लाना हैं मिसेज की आवाज ने मुझे वर्तमान में आ खड़ा किया। मैं आंखों में वही गीलापन महसूस कर रहा था, ठीक ही किया था उसने। मैंने लिस्ट बना ली है जरा पैसे कुछ अधिक ले लेना। मुझे एक साड़ी भी परचेज करनी है।
मैंने गहरी सांस ली, मन में काफी बोझ सा महसूस हो रहा था। बड़े बेमन से बाजार जाने की तैयारी करने लगा। आखिर गृहस्थी की जिम्मेदारी भी तो निभानी है।

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