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देश के स्वतंत्रता संग्राम को भारतीय स्वाभिमान की जागृति का संग्राम भी कहा जाता है। राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण के विरुद्ध लोक-चेतना का यह प्रबुद्ध अभियान था। यह चेतना उत्तरोतर ऐसी विस्तृत हुई कि समूची दुनिया में उपनिवेशवाद के विरुद्ध मुक्ति का स्वर मुखर हो गया। परिणामस्वरूप भारत की आजादी एशिया और अफ्रीका की भी आजादी लेकर आई। भारत के स्वतंत्रता समर का यह एक वैश्विक आयाम था, जिसे कम ही रेखांकित किया जाता है। इसके बनिस्बत फ्रांस की क्रांति की बात कही जाती है। निसंदेह इसमें समता, स्वतंत्रता एवं बंधुता के तत्व थे, लेकिन एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की अवाम उपेक्षित थी। अमेरिका ने व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और सुख के उद्देश्य की परिकल्पना तो की, परंतु उसमें स्त्रियां और हब्शी गुलाम बहिष्कृत रहे। मार्क्स और लेनिनवाद ने एक वैचारिक पैमाना तो दिया, किंतु वह अंतत: तानाशाही साम्राज्यवाद का मुखौटा ही साबित हुआ। इस लिहाज से गांधी का ही वह विचार था, जो सम्रगता में भारतीय हितों की चिंता करता था। इसी परिप्रेक्ष्य में दीनदयाल उपध्याय ने एकात्म मानववाद और अंत्योदय के विचार दिए, जो संसाधनों के उपयोग से दूर अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान की चिंता करते हैं।

कमोबेश इन्हीं भावनाओं के अनुरूप डॉ भीमराव आंबेडकर ने संविधान को आकार दिया। इसीलिए जब हम सत्तर साल पीछे मुड़ कर संवैधानिक उपलब्धियों पर नजर डालते हैं तो संतोष होता है। प्रजातांत्रिक मूल्यों के साथ राष्ट्र-राज्य की व्यवस्थाएं जीवंत हैं। बीच-बीच में आपातकाल जैसी अतिरेक और अराजकता भी दिखाई देती है, लेकिन अंतत: मजबूत संवैधानिक व्यवस्था के चलते लंबे समय तक ये स्थितियां गतिशील नहीं रह पातीं। फलत: तानाशाही ताकतें स्वयं ही इन पर लगाम लगाने को विवश हुई हैं।

यही कारण है कि प्रजातंत्र, समता, न्याय और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ विधि का शासन अनवरत है। भारत की अखंड़ता और संप्रभुता स्थापित करने की द़ृष्टि से सरदार पटेल जैसे लोगों ने कूटनीतिक कड़ाई से 600 से भी ज्यादा रियासतों का विलय कराया। हैदराबाद व जम्मू-कश्मीर रियासतों का विलय हुआ। जमींदारी उन्मूलन व भूमि-सुधार हुए। सर्वोदयी नेता विनोबा भावे ने सामंतों की भूमि को गरीब व वंचितों में बांटने का उल्लेखनीय काम किया। पुर्तगाल और फ्रांस से भी भारतीय भूमि को मुक्त कराया। गोवा आजाद हुआ और सिक्किम का भारत में विलय हुआ।

चीन और पाकिस्तान के आक्रमणों का सामना किया। इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को विभाजित कर दो देशों में बांटने का दुस्साहसिक कार्य किया। इसी पृष्ठभूमि में गुटनिरपेक्ष व शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाली ठोस विदेश नीति अपनाई। विकेंद्रीकरण की नीति अपनाते हुए इंदिरा गांधी ने ही राजाओं के प्रीविपर्स बंद किए और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। देश में औद्योगीकरण की बुनियाद रखने के साथ सामरिक महत्व के इसरो व डीआरडीओ जैसे संस्थान अस्तित्व में आए। इन्हीं की बदौलत हम प्रक्षेपास्त्र और अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने में सक्षम हुए।

हरित क्रांति की शुरूआत करके खाद्यान्न के क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर हुए, बल्कि कृषि उपजों के निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने में भी समर्थ हुए। ये उन्नति के कार्य इसलिए संपन्न हो पाए, क्योंकि 1990 से पहले तक हमारे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी सही रूप में बौद्धिक होने के साथ स्वदेशी की भावना रखते थे और नैतिक द़ृष्टि से कमोबेश ईमानदार थे। इसलिए ग्रामों से ज्यादा पलायन नहीं हुआ और खेती-किसानी समृद्ध बने रहे।

सरकारी शिक्षा की पाठशालाओं से ही निकले इस कालखंड  के लोग ही श्रेष्ठ वैज्ञानिक अभियंता और चिकित्सक बने। यही नहीं आज हम जिन प्रवासी भारतीयों की बौद्धिक व आर्थिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, वह आठवें दशक के अवसान और नौंवे दशक के आरंभ की वह पीढ़ी है, जो कनस्तर और बिस्तरबंद के साथ सरकारी विद्यालयों में पढ़ कर देश व दुनिया में छाई हुई है। बावजूद अंग्रेजी व विदेशी और निजी शिक्षा को सरंक्षण देने की द़ृष्टि से हमने कई ऐसे नीतिगत उपाय कर दिए, जिससे समूची सरकारी शिक्षा व्यवस्था निराशा और हीनताबोध से ग्रस्त होती चली गई। अब तो प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के संस्थान भी छात्रवृत्तियों और मध्यान्य भोजन के बहाने भीख के कटोरों के बूते चल रहे हैं।

बहरहाल, तमाम उपलब्धियों के बीच शिक्षा में ही नहीं सभी क्षेत्रों में नैतिक मूल्यों का क्षरण हुआ। आपातकाल के बाद जनता दल की गठबंधन सरकार गिरने के बाद संजय गांधी की युवा-टोली को राजनीति में प्रवेश मिला, उसने मूल्यों के अवमूल्यन की पृष्ठभूमि रची। हाशिए पर पड़े सामंत और जमींदार बड़ी संख्या में एकाएक राजनीति की केंद्रीय भूमिका में आ गए। जब ये विधायक एवं सांसद के रूप में सत्ता-तंत्र में हस्तक्षेप के अधिकारी हुए तो इन्होंने पुन: मृतप्राय: सामंती दुष्प्रवृत्तियों को सींच कर हरा-भरा कर लहलहा दिया। गांधी और नेहरू के निष्ठावान अनुयायी लगभग निर्वासित कर दिए गए। नतीजतन 1984 में पंजाब में पनपे उग्रवाद के चलते इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो प्रतिकार स्वरूप पूरे देश में कांग्रेसी सत्ता के सरंक्षण में सांप्रदायिक हिंसा हुई।

इसी की पृष्ठभूमि से भाषाई, जातीय व क्षेत्रीय अस्मिताएं प्रखर आंदोलन के रूप में उभरीं। 1989 में जब वीपी सिंह की सरकार को देवीलाल ने अस्थिर किया तो उन्होंने मंडल का पिटारा खोल दिया। इसे लेकर मंडल-कमंडल में भी हिंसक टकराव देखने में आए। फलस्वरूप राममनोहर लोहिया के जो अनुयायी भाषाई आंदोलन चला रहे थे, उनकी प्राथमिकता पिछड़ों के जातीय और क्षेत्रीय हितों में जमींदोज हो गई। मुलायम, लालू, शरद, नीतीश और मायावती इन्हीं आंदोलन के अगुआ रह कर मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री बने। यही वह दौर रहा है, जिसमें धनबल और बाहुबल का राजनीति में पर्दापण हुआ तथा अपराध का राजनीतिकरण एवं राजनीति का अपराधीकरण हुआ। कांग्रेस और भाजपा भी इससे अछूते नहीं रहे। रही-सही कसर 24 जुलाई 1991 को सरंचनागत समायोजन के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में व्यापार का जो समझौता हुआ, उसने देश की आर्थिक आजादी को लगभग 500 साल के लिए गिरवी रख दिया। नतीजतन हम नवउपनिवेश के गुलाम होते जा रहे हैं।

अतएव लगता है कि संविधान की प्रस्तावना के उदात्त आदर्श व उद्देश्य पूरे नहीं हुए हैं। गोया राजनीति त्याग, समता, अपरिग्रह और जनसेवा की भावना से प्रेरित होने की बजाय लाभकारी व्यवसाय, धनोपार्जन का माध्यम और सत्तासुख भोगने का साधन बनती जा रही है। भारतीय संविधान ने संसदीय प्रणाली को स्वीकार किया, जिसमें समस्त निर्वाचित जन-प्रतिनियों और मंत्रियों के पवित्र उत्तरदायित्व की परिकल्पना है। साफ है, संविधान निर्माताओं ने ऐसी संकल्पना कतई नहीं की थी, जिसमें मंत्रियों के दायित्व में आम आदमी बहिष्कृत होता चला जाए। इसी कुटिल मंशा के चलते सत्ता में भागीदार अपने लिए तो अधिकतम प्रजातांत्रिक अधिकारों की मांग उठाते हैं, लेकिन दूसरों को उनके प्रजातांत्रिक अधिकार दिलाने के कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता जताते नहीं दिखते हैं।

अधिकार और कर्तव्य की यह ऐसी विडंबना है, जो लोकतंत्र की बढ़ती उम्र के साथ जटिल होती जा रही है। इसी तात्कालिक लाभ की द़ृष्टि के चलते नेताओं की दलों के प्रति निष्ठा भंग हुई है। लिहाजा, चुनावी मौसम में दलबदलुओं के टिड्डी दल दिखाई देने लगते हैं। इसी कारण संसद और विधानसभाएं दलबदल और अस्थायी बहुमत का दंश झेलने को बाध्य हो रही हैं।

स्वतंत्रता के बाद से ही हम पढ़ते व सुनते चले आ रहे हैं कि भारत एक कृषि-प्रधान देश है। इस समय भी देश में कृषि उत्पादन चरम पर है। वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2016-17 में 275 मिलियन टन खाद्यान्न और करीब 300 मिलियन टन फल व सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। बावजूद किसान आत्महत्या और किसानों द्वारा सड़कों पर फसल और दूध नष्ट करना, अर्से से चिंतनीय पहलू बना हुआ है। किंतु अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने नए बजट प्रावधान करते हुए यह संकल्प लिया है कि वह 2022 तक खेती-किसानी से जुड़े लोगों की आमदनी दोगुनी करेगी। इस हेतु विभिन्न फसलों पर समर्थन मूल्य बढ़ाए गए हैं। साथ ही फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण एवं कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की इच्छा जताई है और नीतिगत उपाय भी किए हैं। भुगतान के डिजिटल लेन-देन से भी किसान, गरीब और वंचितों को उनके हक का पूरा पैसा मिलने लगा है। यहां गौरतलब है कि जिस आर्थिक विकास को हम 7 से 7.8 प्रतिशत तक ले जाना चाहते हैं, वह ग्रामीण भारत पर फोकस किए बिना संभव ही नहीं है। यही जमीनी विकास आर्थिक विकास की कुंजी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी आर्थिक मजबूती में पिछले कई दशकों की कृषि उत्पादकता ने अहम् भूमिका निभाई है, तथापि सच्चाई यह है कि आज कृषि हमारे आर्थिक विकास के ऊंचे मानकों से बहुत नीचे है। बड़े उद्योग, सेवा क्षेत्र, विनिर्माण आदि कृषि के मुकाबले आगे निकल गए हैं। इसलिए इसे सरकारी सरंक्षण से संवारे जाने की ऐसी ही निरंतरता बनी रहना चाहिए।

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