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जम्बू भालू के पिता सर्कस में काम करते थे। जब वह सर्कस से सेवानिवृत हुए तो उन्हें एक मोटर साइकिल ईनाम में मिली। मोटर साइकिल देख जम्बू बहुत खुश हुआ। दो-चार दिन में ही उसने मोटर साइकिल चलानी सीख ली। फिर क्या था, वह सारे जंगल में मोटर साइकिल चलाने लगा। वह उसे बहुत तेज चलाता था। उसके रात-दिन मोटर साइकिल चलाने से जानवरों की नींद हराम हो गई।
एक दिन उसके गुरूजी चंचल बंदर ने उसे समझाते हुए कहा- ‘‘तुम मुझ से पढ़ते रहे हो। मेरी बात मानो तो मोटर साइकिल इतनी तेज मत चलाया करो। कभी गिर जाओगे तो चोट लग जाएगी। तुम जरूरत न होने पर भी उसका हॉर्न बजाते रहते हो, इससे सभी जानवरों को परेशानी होती है।’’ पर जंबू पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
उसी जंगल में पूसी बिल्ली का अस्पताल था। वह जम्बू के साथ ही पढ़ी थी। दोनों में शुरू से ही पटती नहीं थी। जम्बू गुस्सैल और लड़ाकू था और पूसी सीधी और सादी थी।
एक बार जम्बू ने बिना वजह ही पूसी को पीट दिया था, तब उसने उसकी शिकायत गुरूजी चंचल बंदर से की थी। गुरूजी ने जम्बू को मुर्गा बनने की सजा दी थी। जम्बू जब मुर्गा बना था तो सभी बच्चों को बड़ा मजा आया था। लेकिन जम्बू को बहुत बुरा लगा था।
जम्बू अपनी बुरी हरकतों की वजह से पढ़ नहीं पाता था और अक्सर फेल हो जाता था, जबकि पूसी लगातार पास होती थी। अब वह डॉक्टर बन गई थी। चूंकि जम्बू पूसी से चिढ़ता था इसलिए वह पूसी के अस्पताल के सामने जाकर खूब हॉर्न बजाया करता था। इससे अस्पताल में भरती मरीजों को बहुत परेशानी होती थी।
एक दिन पूसी ने जम्बू से कहा- ‘‘जम्बू भैया, यहां शोर मत किया करो। मरीजों की नींद टूट जाती है, मुझे भी काम करने में दिक्कत होती है।’’
तब जम्बू रौब से बोला था- ‘‘मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है। मेरे मन में जो आएगा, मैं वही करूंगा।’’ कह कर वह और भी तेज हॉर्न बजाता हुआ आगे चल दिया।
जम्बू की हरकतें बढ़ती जा रही थीं। उसकी मोटर साइकिल से कई जानवरों के हाथ-पैर टूट चुके थे। अब जम्बू की मोटर साइकिल से जंगल के जानवर बेहद डरने लगे। वे उसकी आवाज सुनते ही एक तरफ रास्ता छोड़ कर भाग जाते थे। जानवरों को भागता हुआा देख कर जम्बू बेहद खुश होता था।
एक दिन वह तेजी से मोटर साइकिल चलाता हुआ जा रहा था। आगे एक मोड़ था, फिर भी उसने मोटर साइकिल की चाल धीमी नहीं की। मोटर साइकिल तेज तो थी ही इसलिए मोड़ आने पर वह मोटर साइकिल को संभाल नहीं पाया और एक तरफ एक मोटे पेड़ से जा टकराया।
मोटर साइकिल के पेड़ से टकराते ही वह गेंद की तरह उछल कर दूर झाड़ियों में जा गिरा। गिरने पर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा- ‘‘बचाओ…. बचाओ… हाय मैं मर गया…’’
तब आसपास के सारे जानवर दौड़े आए। उन्होंने जम्बू को झाड़ियों में से बाहर निकाला। अब तक वह बेहोश हो चुका था। उसका सारा शरीर खून से लथपथ हो गया था। उसकी एक टांग भी टूट गई थी।
फिर उसको पूसी के अस्पताल में लाया गया। पूसी ने जब जम्बू को घायल देखा तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने तुरंत जम्बू के कटे-फटे घावों पर टांके लगाए और उसकी एक टांग पर प्लास्टर चढ़ा दिया।
थोड़ी देर बाद जम्बू को होश आया तो उसने खुद को पूसी के अस्पताल में पाया। उसने देखा कि उसके घायल हो जाने से जंगल के जानवर बेहद दुखी हैं। यह सब देखकर जम्बू को बड़ा पश्चात्ताप हुआ।
धीरे-धीरे जम्बू ठीक हो गया। ठीक हो जाने पर उसने पूसी से माफी मांगते हुए कहा- ‘‘मुझे माफ कर दो बहन, मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया। फिर भी तुमने मेरी जान बचाई है।’’
फिर वह चंचल गुरूजी के घर गया और उनसे आदरपूर्वक बोला- ‘‘गुरूजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपकी बात नहीं मानी तभी मेरा यह हाल हुआ है।’’
इसी तरह जंगल के सब जानवरों से जम्बू ने माफी मांगी और भविष्य में ऐसा न करने की प्रतिज्ञा की।

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