हिंदी विवेक : we work for better world...

दीवाली से दो दिन पहले धनतेरस की सुबह लगभग दस बजे तक ही डॉ रविकान्त सहाय के घर पर अच्छी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी। अगल-बगल के पड़ोसी डॉ सहाय के हॉस्पिटल के साथी डॉक्टर और रिश्तेदार आ चुके थे।
दीवाली जैसा त्यौहार जो सबके लिए प्रकाश और खुशी लेकर आता है। ऐसे दिन डॉ रविकान्त के जीवन का मजबूत सम्बल, उनके मार्ग का अवलम्ब आज उनसे छूट कर कहीं दूर चला गया था। इतना दूर…..जहॉं से वापस आने के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं।

डॉ रविकान्त सहाय जो इतनी कम उम्र में ही एक योग्य कार्डियोलाजिस्ट बनकर शहर में एक अच्छा मुकाम बनाने में सफल हो रहे थे, कल रात उनके पिताजी अमरकान्त सहाय ने नींद की गोलियॉं खाकर आत्महत्या कर ली थी। आज सुबह पॉंच बजे जब नौकर ने उन्हें चाय देने के लिए दरवाजा खटखटाया तब काफी देर तक कोई उत्तर न मिलने पर वह उनके बेटे को बुला लाया। किसी तरह दरवाजा खुलने पर पता चला कि काफी घण्टे पहले ही अमरकान्त की सांसे बन्द हो चुकी थी। बगल की मेज पर नींद की गोली की खाली शीशी और दूध का गिलास पड़ा था।

ये सब देखते ही रविकान्त स्तब्ध रहे गये। लोग रविकान्त को सॉंत्वना दे रहे थे, मगर डॉ रविकान्त के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि जिन्दगी भर अपने बेटे को मजबूत बनाने और जीवन से संघर्ष करना सिखाने वाले उनके पिताजी इस तरह जिन्दगी से कैसे हार मान सकते हैं ?

अमरकान्त सहाय की अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी। शाम तक उनका अंतिम संस्कार करके उनके बेटे रविकान्त घर लौट आये।
हर वक्त अपने बेटे रविकान्त को तरह तरह के आदेश और उपदेश देते रहने वाले अमरकान्त सहाय अब एकदम खामोश होकर तस्वीर में कैद हो चुके थे। बेटे के डाक्टर बन जाने के बावजूद उसे छोटे बच्चों की तरह हर वक्त वे सीख दिया करते थे। जमाने की अच्छाई-बुराई और अपने जीवन के अनुभव देते रहते। समाज में कैसे उठना-बैठना चाहिए, किससे कैसी और कितनी बातें करनी चाहिए…कर्त्तव्यपालन में कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए….जैसी तमाम सीख वह लगभग हर रोज ही बेटे को दिया करते थे।

बचपन से ही वे रवि को अफसर, डॉक्टर, इंजीनियर जैसा ऊँचा मुकाम दिलाना चाहते थे। हॉंलाकि वह खुद मोटरपार्ट्स का बिजनेस करते थे। मगर बेटे को पढ़ा-लिखा कर समाज में सम्मानित तथा ऊँचे मुकाम पर देखना उनका एकमात्र सपना था। शुरू से ही उन्होंने उसे अनुशासित जीवन जीना सिखाया था। यहॉं तक कि छुट्टियों में जब बच्चे मौज-मस्ती करते हैं, तब भी वे रवि को किसी न किसी प्रतियोगिता की ही तैयारी कराते रहते।

रवि जब कभी पढ़ते-पढ़ते थक जाता और कहता कि ‘पापा….अब मैं थक गया हूँ।’ तब पिता अमरकान्त उससे कहते, ‘रवि…जब तक तुम्हें तुम्हारी मंजिल….तुम्हारा लक्ष्य न मिल जाय। तब तक तुम कभी मत थकना।’ रवि पढ़ने-लिखने में होशियार और कक्षा का मेधावी छात्र था। मगर उसकी पसन्द का विषय शुरू से ही आर्ट्स रहा। वह कला के क्षेत्र में आगे चलकर नाम कमाना चाहता था।

रंगों की दुनिया जब वह अपने ब्रश से बनाता, तो उस अनजानी दुनिया में ही खो जाता। पढ़ने के बाद का समय वह अपने रंग, ब्रश और कागज के साथ ही बिताता। मगर न जाने क्यों उसके पापा को बेजान रंगों की दुनिया कभी रास ही नहीं आयी।
वे हमेशा कहते कि, ‘वह नहीं चाहते कि उनका बेटा काले, नीले रंगों की दुनिया के अंधेरों में कहीं खो जाय। उसे अभी फलक पर रौशन होना और फिर पापा के कहने के मुताबिक रवि अपनी रंग-बिरंगी रंगों की दुनिया से हटकर फिजिक्स, कैमिस्ट्री के फार्मूेलों में और गंधहीन रंगहीन केमिकल्स की दुनिया में चला आता ।

जब तक उसकी मॉं कामाक्षी थीं। तब वह अपने बेटे को उसके हर जन्मदिन पर रंग, ब्रश और कैनवस लाकर देती, चूँकि वह खुद भी कलाप्रेमी थीं । इसलिए वह भी चाहती थीं कि एक दिन उनके बेटे के बनाए चित्रों की तारीफ दुनिया करे। उसे एक महान् चित्रकार, कलाकार के रूप में जाना जाय। देश-विदेश तक उसकी कला की प्रशंसा हो।

रवि के माता-पिता के सपनों में अंतर था। पिता अपने सपनों को उसमें पूरा होता देखना चाहते थे और उसके लिए उन्होंने बहुत परिश्रम भी किया। अपने अंदर के पिता के स्नेह को भी कई बार उन्होंने दबाकर बेटे को लक्ष्य की ओर अग्रसर किया था। यह बात अलग है कि पिता के प्रेम, स्नेह की छाया को उनके अनुशासन एवं फटकार की तेज ध्ाूप में रवि अक्सर महसूस नहीं कर पाता था।

उसके इंटर पास करने के बाद ही एक बार मॉं की अचानक तबियत बिगड़ी और समय से पहले ही वह अपने पति और बेटे को सदा के लिए छोड़कर चली गयी। उनके जाने के बाद उनके सपने भी कहीं अंधेरों में खो गये। शायद बीते समय की ध्ाूल में वे सपने रवि की आँखों से भी ओझल हो गये।

समय बीतता गया और वह दिन आ गया। जब रवि पढ़-लिखकर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ रविकान्त सहाय बन गया। कितने खुश हुए थे….उस दिन उसके पिताजी मानों वह डिग्री उन्हें ही मिली हो। हर वक्त उनके तनाव से भरे चेहरे और चिंता की लकीरों से भरे माथे को पहली बार डा. रवि ने प्रफुल्लित देखा था। जल्द ही डा रवि को शहर के जाने-माने अस्पताल में नौकरी मिल गयी। सुख-सुविधापूर्ण अस्पताल, अच्छी सैलरी, नाम, शोहरत सब कुछ डॉ रवि को मिला।

एक दिन जब उसने अपने पापा से अस्पताल में चलकर अपना केबिन उन्हें दिखाने की बात की। तब उन्होंने कहा कि, ‘वे चाहते हैं कि एक दिन उनके बेटे के नाम पर पूरा अस्पताल हो। पता नहीं यह उनकी इच्छा थी या महत्त्वकांक्षा मगर तत्काल रवि के दिल पर जरूर ठेस लगी कि आज अगर मम्मी होतीं तो वह कितनी खुश होतीं। पहली बार में ही चलकर अस्पताल में अपने बेटे को डाक्टर की कुर्सी पर बैठा देखतीं । लोगों का इलाज करते देख उसकी बलाएँ लेती। मगर पापा को अपने बेटे की आज की खुशी से कोई मतलब ही नहीं है। वे हमेशा आने वाले कल के बादलों को देखते हैं। आज के सुख की शीतलता से उन्हें कोई ठंडक नहीं मिलती।

उनका बेटा चाहता था कि एक बार उसके पिता यह कहें कि व उसकी उन्नति से खुश हैं। मगर न जाने क्यों उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा। बेटे को कभी उसकी उन्नति पर, कोई खुशी मिलने पर उन्होंने गले नहीं लगाया। उनके चेहरे पर हमेशा खिंची रहने वाली चिंता की रेखाएँ देखकर रवि कभी समझ नहीं पाया, कि उसके पिताजी क्या चाहते हैं ? अब उनकी कौनसी ख्वाहिश है। जबकि वास्तव में अमरकान्त सहाय का अपने बेटे के लिए उनके दिल में भरा असीम प्यार ही उनकी चिंता का कारण था। वह सोचते कि कहीं उनके खुश होने से उनके बेटे की उन्नति सीमित न रह जाय।

लेकिन डाक्टर बनने के बाद जहॉं सब लोग रवि के काम, उसके शालीन व्यवहार की तारीफ करते नहीं थकते वहीं घर में हर छोटी-बड़ी बात पर अमरकान्त उसे रोकते टोकते रहते।
पिता अमरकान्त की मृत्यु हुए लगभग महीना भर हो गया। मगर अभी तक डॉ रवि यह समझ नहीं पा रहे थे, कि आखिर इतने मजबूत दिलोदिमाग के इंसान पापा ने कायरो की तरह आत्महत्या जैसा कदम क्यों उठाया ? पूरे घर में अकेले रह गये रवि को बार-बार पिताजी की कमी खल रही थी। मॉं के जाने के बाद पिताजी का साथ था। मगर अब अस्पताल की चहलपहल से घर वापस आने पर उसे घर का सन्नाटा मानों काटने को दौड़ता था ।
एक शाम वह घर आकर पापा की आलमारी में से एक किताब ढूँढ़ रहे थे। तब अचानक उनके हाथ एक डायरी लगी, पापा अक्सर डायरी में कुछ लिखते रहते थे। लेकिन रवि ने कभी भी उनकी डायरी पढ़ने की हिम्मत नहीं की थी।
आज जब वह इस घर में तो क्या, इस दुनिया में नहीं है। तब उनके बेटे ने उस डायरी को पढ़ने के लिए हाथ में उठाया। डॉ रवि पन्ने पर पन्ने पलटते गये। पापा की डायरी में लिखा एक-एक शब्द जो उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे के लिए लिखा था, कितना स्नेह भरा था….। पापा ने हर छोटी-बड़ी बात, झगड़े, खुशियॉं…गम….सभी का जिक्र उस डायरी में किया था।
डॉ रवि बैठकर उस डायरी के शुरूआती पन्ने पढ़ ही रहे थे कि तेज हवा आने से खिड़कियॉं खुलने बंद होने लगी।
शायद आँधी आ रही है….सोचकर उन्होंने खुली डायरी मेज पर रखी और खिड़की के पास गये। ठंडी हवा का झोंका अंदर आ रहा था, लेकिन हवा इतनी तेज थी कि वे खिड़की बंदकर वापस आ गये। मेज पर रखी डायरी के पन्ने खड़-खड़ उड़ रहे थे।

खिड़की बन्द होने पर पन्नों का शोर भी शांत हो गयां डॉ रवि वापस आकर अपनी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर डायरी पढ़ने लगे।
डायरी में बॉंये पृष्ठ तक ही लिखा था, दॉंया पृष्ठ खाली था। हवा के झोंके से सारे लिखे हुए पन्ने एक तरफ हो गये थे। शायद वही आखिरी पन्ना था…..पापा की जिन्दगी का। जब उन्होंने आखिरी बार उस डायरी में कुछ लिखा होगा।
डॉ रवि उसे पढ़ने लगे। उसमें लिखा था ‘‘आज मैंने रवि को देर से घर लौटने पर डॉंट दिया। मेरी गलती थी…बेटा इतना बड़ा डाक्टर है और मैं उसे किशोरवय लड़कों की तरह अब भी अनुशासित करता हूं। उसने भी आज तक मुझसे इस तरह ऊँची आवाज में कभी बात नहीं की थी। मगर आज मेरे बोलने पर वह अचानक ही बिगड़ गया और मुझसे कहा कि ‘मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ । जो आपके हर तरह के प्रश्न का उत्तर देता रहूँ। ठीक समय पर घर आऊँ,…ठीक समय पर खाना खाकर सो जाऊँ। घड़ी की सुईयों से बंधकर काम करते-करते मैं ऊब गया हूँ।’

मैं अपनी मर्जी से खुलकर जीना चाहता हूँ। मैं आपके बंधन…आपके अनुशासन की बेड़ियों से मुक्त होना चाहता हूँ। मेरी ख्वाहिशें…मेरी पसंद….मेरा सब कुछ आपके बंधन में दम तोड़ता जा रहा है।’ कहकर वह मेरे सामने से चला गया ।
लेकिन उसके कहे शब्दों ने मेरे दिल को कॉंच की तरह चीर डाला। मुझे….मेरी बातों……..मेरी सीख को मेरा ही बेटा ‘बंधन’ कह रहा है। मेरा प्यार उसे बेड़ियों की जकड़न सा लगता है। मेरी फिक्र को वह कैद समझता है।
‘‘नहीं….नहीं….अब ऐसा नहीं होगा।’’
‘‘मैं अपने बेटे को किसी बंधन में नहीं रखूँगा। मैं खुद उसे बंधनमुक्त कर दूँगा। बंधनमुक्त होगा मेरा बेटा….आज के बाद ।’’
डायरी के इस पन्ने के नीचे तारीख लिखी थी…. नवम्बर..। डॉ रवि इस पन्ने के अंतिम शब्दों को पढ़कर स्तब्ध रह गये।
‘पन्द्रह नवम्बर…..का हर अक्षर उनके हलक में अटक गया। यानि पापा ने उसी शाम अपने को खत्म करने का इरादा कर लिया था और अगले दिन उसे क्रियान्वित भी कर डाला।
ओह….पापा का जब निष्प्राण शरीर देखा था तब भी उन्हें यह ध्यान नहीं आया कि एक दिन पहले उन्होंने पापा से क्या कह डाला था। दरअसल हॉस्पिटल में एक मरीज के परिवारवालों से उनकी कुछ अनबन हो गयी। एक क्षेत्रीय नेता ने आकर उनपर इलाज में लापरवाही करने का आरोप भी लगाया था, हालॉंकि तुंरत बात संभल गयी थी। मगर फिर भी घर आने तक भी डॉ रविकान्त के जेहन में वही बात छायी रही। इस पर घर में देर से आने पर पिताजी के बोलने पर वे अचानक ही फट पड़े थे।

‘ओह….पापा…….आपने मुझसे एक बार तो पूछा होता कि मैंने ऐसा क्यों कहा। ओह……….मैंने पापा के प्यार को बंधन कैसे कह दिया। क्या…मैं नहीं जानता हूँ कि आप मुझसे कितना प्यार करते थे। ओह….पापा….ये क्या हो गया।’
डॉ रवि उस डायरी के पन्ने पर अपने हाथ फिरा रहे थे । जिस पर उनके पापा की ऊँगलियॉं अंतिम बार चली होगी । वे उसे महसूस कर रहे थे और उनके आँखों से बहते आँसुओं से शायद उनके पिता की आत्मा पर पड़ा बोझ कम हो रहा था, कि उनका प्यार बेटे के लिए प्यार था कोई कैद या……बंधन नहीं।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu