हिंदी विवेक : we work for better world...

*****दिलीप ठाकुर*****

अ गर कोई महिला किसी फिल्म का निर्देशन करती है तोक्या फिल्म की कथा में कोई अंतर होता है? इस प्रश्न का उत्तर हां ही होना चाहिये। परंतु हर महिला निर्देशिका को यह करना संभव नहीं हो सका।
महिलाओं का किसी विषय की ओर देखने का दृष्टिकोण अलग होता है। ‘नौकरी’ जैसे सामाजिक विषय की ओर देखने का महिलाओं और पुरुषों का दृष्टिकोण अलग होता है। पुरुष उसकी ओर परंपरागत के रूप में देखता है और महिला परिवार को थोडी और अर्थिक सहायता मिलने के दृष्टिकोण से देखती है। फिल्मों की बात करें तो अगर फिल्म में विवाह बाह्य संबंधों को दिखाना है तो कोई पुरुष निर्देशक यह दिखयेगा कि कैसे कोई व्यक्ति परस्त्री की ओर शारीरिक रूप से आकर्षित होता है और अगर महिला निर्देशिका होगी तो वह दिखायेगी कि किस तरह कोई स्त्री भावनात्मक रूप से किसी पुरुष की ओर आकर्षित होती है।
हालांकि सभी महिला निर्देशिकाएं यह दिखने में सफल नहीं हो पायी कि स्त्रियों का नजरिया अलग हो सकता है।
फराह खान का ही उदाहरण लें। वह मूलत: नृत्य-निर्देशिका है। जब उन्हें यह ज्ञात हो गया कि उनके नाम को एक चमक मिल गयी है तो उन्होंने स्वतंत्र रूप से निर्देशिका के रूप में काम करना शुरू किया। ‘ओम शांति ओम’, ‘मैं हूं ना’, ‘तीस मार खां’ और ‘हैप्पी न्यू इयर’ जैसी उनकी फिल्मों में क्या दिखाई देता है? यह दिखायी देता है कि उसे ‘महामनोरंजन का महामासाला’ साकार करना है। उनपर सत्तर के दशक की मसाला फिल्म(खासकर मनमोहन देसाई की फिल्मों का) खास प्रभाव दिखाई देता है। तात्पर्य यह है कि उन्होंने यह भूलकर कि वह एक स्त्री है ऐसी फिल्में बनाईं जो निश्चित रूप से ‘गल्ला पेटी’ का भार बढायेंगी। उसने मार्केट का ध्यान रखा। यहां तक कि उसने अपनी फिल्मों की नायिकाओं को प्लास्टिक की गुडिया के रूप में दिखाया। सुष्मिता सेन, कैटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण इत्यादि नायिकाएं उनके निर्देशन में कुछ ज्यादा ही तडक-भडक अंदाज में दिखीं। इसकी जगह अगर उन्होंने स्त्री के मन, सत्व, स्वामित्व, अस्मिता आदि की ‘खोज’ की होती तो अच्छा होता। एक स्त्री दूसरी स्त्री के दुखों को समझ सकती है, इस सोच को दरकिनार करते हुए उन्होंने भी पुरुषों की तरह ही महिलाओं को प्रदर्शन की वस्तु के रूप में दिखाया।
अपर्णा सेन अभिनय से निर्देशन की ओर रुख करनेवाली महिला हैं। उन्होंने बहुत पहले ‘परोमा’ फिल्म बनाते समय महिलाओं की भावनओं को महत्व दिया था। मूलत: बंगाली में निर्मित यह फिल्म बाद में हिंदी में बनाई गयी। एक बंगाली परिवार में परोमा(राखी) परंपरा, सभ्यता, संस्कार आदि मूल्यों का जतन करती है। घर का वातावरण आनंदित है। ऐसे में परोमा के फोटोग्राफर मित्र से उसकी पहचान होती है। वह फोटोग्राफर सोचता है कि उसमें कुछ फोटोजनिक है। उसके बार-बार कहने पर वह उसे एक बार फोटो खींचने की इजाजत देती है। उन फोटो को देखकर उसे अपनी सुंदरता का संज्ञान होता है। उसका पति काम के सिलसिले में हमेशा बाहर रहता है। वह उस फोटोग्राफर से प्रेम करने लगती है और अनजाने में अपना सबकुछ उसे सौंप देती है। इनके संबंध सामाजिक बंधनों से बहुत आ निकल जाते हैं। जब उसके घर के लोगों को यह पाता चलता है तो उसे अपराधबोध होता है। उसके मन में हलचल होने लगती है।
परोमा के भावों को फिल्म में बखूबी दिखया गया है। स्त्री की सुंदरता के बजाय उसकी भावनायें फिल्म में अधिक अच्छी तरह से दिखाई गयी है। फरहा खान और अपर्णा सेन जैसी दो अलग-अलग तरह की निर्देशिकायें हमारी फिल्म इंडस्ट्री में हैं।
फिल्म इंडस्ट्री के एक सौ दो वर्षों के काल में महिला निर्देशकों के कम होने का एक कारण इसके तंत्रों होना भी कहा जा सकता है। निर्देशक किसी जहाज के कर्णधार जैसा होता है। उसे कई काम संभालने होते हैं। सेट, कपडे, गीत, पोस्टर, फिल्म का व्यवसाय आदि। यह सब एक साथ संभालना कठिन है।
समय के साथ परिवर्थन होने लगा और हर क्षेत्र की तरह इस क्षेत्र में भी महिलाओं ने यहां भी पुरुषों के साथ-साथ महिला निर्देशकों की संख्या भी बढने लगी। महिला निर्देशकों के नामों पर गौर करें तो हमें सन १९३० में पहली निर्देशिका दिखाई देती है। फातिमा बेगम ने पहली मूक फिल्म ‘बुलबुले परिस्तान’ बनाई। दीपा मेहता, कल्पना लाजमी, सई परांजपे, नंदिता राय, झोया अख्तर, भावना तलवार, गुरिंदर चड्ढा, मीरा नायर, मेघना गुलजार, किरण राव, विजया मेहता, अनुजा रिझ्वी, रेवती आदि नाम लिये जा सकते हैं। हेमा मालिनी शाहरुख खान को छोटे पर्देसे बडे पर्देपर लाईं। जिसे वे आज भी याद करते हैं। अभिनेत्री के तौर पर अन्य निर्देशकों के लिये काम करने के दौरान जो स्वतंत्रता मिलती है वह स्वयं निर्देशक होने के दौरान नहीं मिलती। शायद इसलिये ही उन्होंने फिर से निर्देशन का जिम्मा नहीं संभाला।
मेघना गुलजार ‘फिलहाल’ के माध्यम से इस क्षेत्र में उतरीं। उनसे सभी को बहुत उम्मींदें थी। क्योंकि वे गुलजार जैसे संवेदनशील व्यक्ति की बेटी हैं। इस फिल्म के लांच के दौरान भावनात्मक माहौल दिखाई दिया। हालांकि ‘फिलहाल’ देखते समय वह कहीं से पटरी से उतरा हुआ दिखाई दिया। अच्छी कथा सूझना और उसे परदे पर साकार करना भी एक हुनर है। सई परांजपे में यह हुनर दिखाई देता है। उनके बहुआयामी फिल्मों के देखकर उनके प्रति आदर बढ जाता है। झोया अख्तर ने जिंदगी न मिलेगी दोबारा में तीन मित्रों के रिश्तों को बखूबी पेश कर अपने निर्देशन का लोहा मनवाया।
आज सभी क्षेत्रों स्त्रियां अपने कामों की छाप छोड रहीं हैं। ऐसे में महिला निर्देशकों की संख्या बढने से फिल्मों मे गुणात्मक वृद्धि होगी। इससे हमारी फिल्म इंडस्ट्री में सकारात्मक परिवर्तन होगा।
मो. : ९८७०६१६२१६
 

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu