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मां गंगा और भारतीय संस्कृति भारत की आत्मा के ऐसे अंश हैं कि जैसे गंगा विभिन्न कोणों से, विभिन्न मोड़ों से गुजरने के बाद भी अपनी पवित्रता को नष्ट नहीं होने देती, वहीं भारतीय संस्कृति भी विभिन्न उतराव-चढ़ाव के दौर में अपनी पवित्रता को नष्ट नहीं होने दिया। इसलिए कहा गया है, ‘गंगा तेरा पानी अमृत!’

मां गंगा हमारी प्रकृति भी हैं और हमारी संस्कृति भी। एक ओर जहां हमारी दिव्यता, भव्यता है, वहीं दूसरी ओर हमारी सभ्यता भी है। मां गंगा के भारतीय राष्ट्र के विकास में योगदान की चर्चा करते समय सर्वप्रथम नदी के रूप में गंगा ने हमें क्या-क्या दिया, इसके धार्मिक, आध्यात्मिक, भौगोलिक और इसके किनारे रचे-बसे इतिहास व संस्कृतियों का गहरा अध्ययन महत्व रखता है।

पूरे विश्व की कुल आबादी के दस प्रतिशत भू-भाग को अन्न, धन, जीवन देने वाली यह नदी अपने किनारे विश्व का सबसे बड़ा उपजाऊ मैदानी क्षेत्र बनाती है। नदी जीवन का हमारे लिए संस्कृति के दर्पण में क्या महत्व है, इसको एक घटना से उद्धृत कर रहा हूं। २४ फरवरी, १९५४ को वाराणसी में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने छात्रों के बीच में एक घटना सुनाई कि दक्षिण भारत के किसी मंदिर के दर्शन हेतु जब वह गए तो मंदिर के द्वारपाल ने उनसे पूछा कि तुम किस नदी की संतान हो? तो लोहिया ने प्रगतिशीलता की भाषा में कहा कि हम अपने माता-पिता की संतान हैं, किसी नदी की नहीं। प्रत्युत्तर में उस अनपढ़ चौकीदार ने यह कहा कि तुम मूर्ख हो, दुनिया का कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता से पहले किसी न किसी नदी की संतान है। इससे लोहिया चौंक गए और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। वापस आने के बाद वाराणसी के अंदर ‘हिमालय गंगा बचाओ सम्मेलन‘ में दृढ़ता के साथ यह स्वीकार किया कि हम गंगा नदी की संतान हैं।

स्वामी विवेकानंद जी जब समुद्र मार्ग से अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे तो उनके साथ घट भरकर गंगा जल भी जा रहा था और उन्होंने अपने गुरुभाई अनुभूतानंद एवं तुरियानंद जी को पत्र लिखते समय मां गंगा के गुणों का वर्णन किया है जिसका विवेकानंद साहित्य में परिव्राजक नामक पुस्तक में उल्लेख मिलता है। गंगा और गीता हिन्दू समाज की प्राणवायु हैं। इसके बगैर हम हिन्दू समाज का चिंतन नहीं कर सकते हैं। यह वाक्य स्वामी विवेकानंद ने मां गंगा के गुणों का वर्णन करते हुए ‘गंगाम् वारि मनोहारि, नारायण चरणं च्यूत:’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।

आइये हम विचार करते हैं कि गंगा भारत के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? हिमालय के दक्षिण में उतरकर २८० छोटी-बड़ी सहायक नदियों की श्रृंखला को लेकर भारत के नौ राज्यों, जिनकी आबादी लगभग ६५ से ७० करोड़ के बीच में है, उनके रहन-सहन, खान-पान को प्रभावित करती हुई, जीवन देती हुई गंगा पूर्व में बंगाल की खाड़ी में जाकर गंगा सागर में अपने अस्तित्व को बनाए रखती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया की कोई भी नदी जब सागर में मिलती है तो सागर के अस्तित्व से जानी जाती है परंतु विश्व की यह एकमात्र नदी है जिसमें भारत की २८० नदियां मिलते ही अपना अस्तित्व समाप्त कर देती हैं और गंगा के नाम से जानी जाती है। धीरे-धीरे बंगाल की खाड़ी में पहुंचने पर सागर का नाम भी ‘गंगासागर‘ हो जाता है।

गंगा जब हिमालय से निकलती हैं तब भी तीन धाराओं में (भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी) त्रिपथगा के रूप में यात्रा प्रारम्भ करती हैं और बंगाल की खाड़ी तक पहुंचते-पहुंचते पुन: त्रिपथगा के रूप में गंगासागर में वृहद दर्शन होते हैं। हमारा देश प्रतीकों से जाना जाता है। गंगा भारत के समस्त नदियों की लक्षण हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार गंगा भगवान विष्णु के पदनख से निकलकर ब्रह्मा के कमंडल से होती हुई शिव की जटाओं से भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर धराधाम पर आने का विचार करती है। हमारी संस्कृति में त्रिदेव सिद्धांत के अनुसार भगवान विष्णु पालन के देवता हैं, ब्रह्मा सृष्टि के देवता हैं और भगवान शिव संहार के देवता हैं तो स्वभाविक है कि मां गंगा सृष्टि, संचालन और संहार तीनों गुणों से युक्त त्रिपथगा के रूप में भगवान शिव के त्रिशूल अर्थात् दैहिक, दैविक, भौतिक ताप जिन्हें त्रिशूल के रूप में जानते हैं, इनसे मुक्ति देने हेतु मां गंगा का अवतरण नदी के रूप में भारत की पवित्र भूमि पर हुआ है। अतएव गंगा जी की चर्चा करते समय इनके जल के महत्व को अमृत तत्व के रूप में शास्त्रकारों ने ब्रह्मद्रवा के रूप में स्वीकार किया है। गंगा में समाज को जोड़कर रखने का सर्वोत्तम गुण है। भारतीय संस्कृति में चार कुंभ के मेलों में से दो कुंभ गंगा के किनारे ही लगते हैं। ब्रह्मा के कमंडल से लेकर रैदास की कठौती तक की गंगा यात्रा भारतीय संस्कृति के ताने-बाने को स्पष्ट करती है। ब्रह्मा का कमंडल जहां अध्यात्म, ब्रह्मविद्या, ब्रह्मतेज और पारब्रह्म परमेश्वर को पाने की, उनके दर्शन की अलौकिक जिजीविषा के प्रति हमारा आकर्षण पैदा करता है, वहीं रैदास की कठौती सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति की मां गंगा के प्रति अपार श्रद्धा को प्रदर्शित करती है। इसी कारण सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय उसके गुरु ने कहा था कि हो सके तो भारत से लौटते समय गंगा, गीता और एक गुरु मेरे लिए ले आना। शायद ये तीनों भारत के पंचगव्य, गीता, गंगा, गौ, गायत्री और गोविंद के रूप में हमें हमारी संस्कृति का दिग्दर्शन कराते हैं।

दक्षिण भारतीय शासक चोलवंश के प्रतापी शासक राजेंद्र चोल ने गंगा विजय को विश्व विजय का नाम दिया था इसीलिए कर्नाटक के अंदर गंगई कोंड चोल्लपुरम् नामक नगर बसाया और उसके मध्य में गंगा जल कलश स्थापित किया। मुगल बादशाहों का गंगा जल से प्रेम किसी से छिपा नहीं है। इस कारण भारतीय संस्कृति में मां गंगा अद्वितीय और महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

भारतीय विकास के संदर्भ में गंगा के प्रवाहमान जीवन को देखें तो गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की यात्रा २५२५ किलोमीटर अपने किनारे आठ बड़े महानगरों को, २२ नगरपालिकाओं को, छोटे-बड़े सैकड़ों नगरों को जीवन देती हुई अपने बेसिन के नौ राज्यों की उर्वराशक्ति को शक्ति प्रदान करती हुई निरंतर बहती चली जाती है। किसी भी नदी के किनारे भारतीय ऋषि परंपरा द्वारा की गई तपस्या नदी के जल को आध्यात्मिकता से ओतप्रोत कर देता है। गंगा की कहानी कुछ ऐसी ही है। भगीरथ की तपस्या, उनकी श्रमशक्ति और चार-चार पीढ़ियों का बलिदान गंगा को धरती पर आने के लिए विवश कर देता है। वहीं कहीं पर भारद्वाज ऋषि याज्ञवल्क्य को कथा सुनाते तो कहीं विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को चरित्रवन (बक्सर) में शिक्षा एवं दीक्षा देते, गंगा सागर में कपिलमुनि शांख्य दर्शन का प्रतिपादन करते हुए मिल जाएंगे। कहीं इसके तट पर बेलूर मठ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद जैसे तेजवान संन्यासी को निर्माण करते हुए मिलेंगे और यह कहते हुए कि मां गंगा और भारतीय संस्कृति भारत की आत्मा के ऐसे अंश हैं कि जैसे गंगा विभिन्न कोणों से, विभिन्न मोड़ों से गुजरने के बाद भी अपनी पवित्रता को नष्ट नहीं होने देती, वहीं भारतीय संस्कृति भी विभिन्न उतराव-चढ़ाव के दौर में अपनी पवित्रता को नष्ट नहीं होने दिया।

इसी कारण भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गंगा एक महत्वपूर्ण विषय रही हैं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म गंगा के तट पर वाराणसी में और संघर्ष का क्षेत्र बिठूर में, यह दोनों गंगा के ही मैदान हैं। मंगल पाण्डेय का विद्रोह बैरकपुर सैनिक छावनी कोलकाता भी गंगा के तट पर और मेरठ छावनी का विद्रोह भी गंगा के किनारे ही हुआ। देश में सर्वप्रथम अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला स्थान बलिया भी गंगा के तट पर ही है। अध्यात्म जगत में अकेले काशी में ही पूरे देश से आकर तपस्या करने वाले बड़े-बड़े संत गंगा के गुणों के कारण अनादिकाल से लेकर आज श्रद्धा एवं प्रशंसा के पात्र रहे हैं। चरक संहिता से लेकर अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणाली का जन्म भी गंगा के तट पर बड़ी मात्रा में शोध और प्रयोगों के कारण होता रहा है। इस कारण गंगा के जल में औषधीय शब्द की कल्पना सर्वप्रथम धर्म सम्राट स्वामी हरिहरानंद सरस्वती करपात्री जी महाराज ने औषधि ‘जाह्नवी तोयमं वैद्यों नारायण हरि’ इस वाक्य के प्रयोग से किया। आज विज्ञान जगत गंगा में बैटीरियो पेफ्ज (टी फोर बैटीरियो फॉज) नाम के तत्व का पता लगाकर एंटी बायटिक चिकित्सा प्रणाली से आगे का रास्ता खोजने में मां गंगा के सिवा कोई रास्ता मिलता नजर नहीं आ रहा है और हमें विश्वास है कि इस सदी की अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणाली बैटिरियो फॉज पर आधारित होगी।

मां गंगा की मिट्टी और पानी में कुछ बात तो ऐसी है कि जिस कारण भारतीय संस्कृति का नेतृत्व गंगा तट से उत्पन्न हुए युवक-युवती बड़ी मात्रा में करते रहे हैं। हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है, और गंगा तेरा पानी अमृत जैसे अमर गीतों से मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री की पहचान खड़ी होती है। इस कारण मां गंगा इतिहास से लेकर पुराणों के रास्ते शास्त्र, उपनिषद में चर्चा की विषय रही हैं। विशिष्ट, आध्यात्मिक और औषधीय गुणों के कारण भारत की संस्कृति की दिव्यता और ऐतिहासिक सभ्यता को अपने में समेटकर भारतीय विकास के सम्यक स्वरूप को जीडीपी के आधार पर नहीं अध्यात्म के आधार पर इस राष्ट्र के नवनिर्माण में अपना असीमित सहयोग प्रदान किया है।

वर्तमान प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जी जब २०१४ में वाराणसी लोकसभा चुनाव लड़ने आए तो उनका प्रसिद्ध वाक्य कि ‘ना तो मैं खुद आया हूं, ना किसी ने भेजा है, मुझे मेरी मां गंगा ने बुलाया है’, इस कारण पूरे विश्व में गंगा जी का विषय चर्चा में आ गया और प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व काशी में गंगा स्नान, भगवान विश्वनाथ का रुद्राभिषेक और सायंकाल मां गंगा की दिव्य आरती गंगा के प्रति भारतीय जनमन की दिव्य आस्था को प्रदर्शित करने में प्रधानमंत्री जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी और पुन: जापान के प्रधानमंत्री को लेकर मां गंगा की आरती देखने हेतु काशी आगमन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद भारतीय संस्कृति के लक्षण के अर्थ ही बदले हैं। पहले ताजमहल के आगोश में दो राष्ट्रों की बैठकें हुआ करती थीं। अब ऐसी बैठकें मां गंगा की गोदी में हुआ करती हैं। यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हमारी संस्कृति और हमारा अध्यात्म कितना परिपुष्ट व भारत मां को जगद्गुरु के आसन पर आसीन कराने की तरफ हमारा शासन तंत्र गंभीरता से ब़ढ़ चला है और यही हमारी इस सदी की सबसे बड़ी सफलता है।

– लेखक गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं।

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