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रामनाथ कोविंद के भारत के चौदहवें राष्ट्रपति बनने के साथ ही बरसों से कांग्रेस के एकाधिकार वाला राष्ट्रपति भवन भी कांगे्रस मुक्त हो गया। उनके दलित होने की चर्चा भाले ही जोरशोर से हुई हो परंतु उनके राजनैतिक सफर को भी कम नहीं आंका जाना चाहिए।

भारत के चौदहवें राष्ट्रपति बनने के लिए दो उम्मीदवार मैदान में थे। उत्तर प्रदेश के रामनाथ कोविंद और बिहार से मीरा कुमार। रामनाथ अभी हाल ही तक बिहार के राज्यपाल थे। राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए ही उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। दूसरी प्रत्याशी मीरा कुमार, स्व. जगजीवनराम की पुत्री हैं। जगजीवनराम कांग्रेस से ताल्लुक़ रखते थे और वे लम्बे अरसे तक केन्द्र सरकार में मंत्री रहे। लेकिन उन्होंने १९७७ में अपने कुछ साथियों सहित कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फ़ार डैमोक्रेटिक की स्थापना की। उसके बाद उन्होंने मुड़ कर कांग्रेस की ओर नहीं देखा। मीरा कुमार उन्हीं जगजीवनराम की विरासत को संभाले हुए हैं। दोनों प्रत्याशी देश भर में जाकर विधान सभाओं के सदस्यों से वोट देने का अनुरोध कर रहे थे। रामनाथ कोविंद का समर्थन भाजपा व उसके सहयोगी दल कर रहे थे। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे राजनैतिक दल भी उनको समर्थन कर रहे थे, जिनकी गणना भाजपा के सहयोगी दलों में नहीं की जा सकती। नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू का इस लिहाज़ से विशेष उल्लेख किया जा सकता है। मीरा कुमार कांग्रेस की प्रत्याशी थी। लेकिन सीपीएम ने अपना प्रत्याशी न खड़ा कर कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन करने का ही निर्णय किया। धीरे-धीरे कांग्रेस के नजदीक खिसकते जाने का कारण शायद सीपीएम में हो रहे वैचारिक परिवर्तन का परिणाम हो। जैसा की उपर संकेत दिया गया है मीरा कुमार के पास लम्बा राजनैतिक अनुभव है। वे पॉंच बार लोकसभा की सदस्य रहीं। लोकसभा की स्पीकर भी रहीं हैं। वकील हैं और भारतीय विदेश सेवा में काम करने का लम्बा अनुभव रखती हैं।

इसी प्रकार रामनाथ कोविन्द के पास उच्चतम न्यायालय में वकालत करने का लम्बा अनुभव है। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए थे लेकिन सामाजिक कार्यों में रुचि होने के कारण उन्होंने नौकरी करने की बजाए वकालत को अधिमान दिया। वकालत के पेशे में भी वे गरीबों के लिए बिना फीस लिए लड़ते थे। बारह साल तक वे राज्य सभा के सदस्य रहे। गॉंव में अपनी पैतृक सम्पत्ति उन्होंने सामाजिक जन कल्याण के लिए भेंट कर दी। उनके पास कोई पैतृक राजनैतिक विरासत नहीं है लेकिन वे अपने परिश्रम और योग्यता के बलबूते इस मुक़ाम तक पहुँचे हैं।

लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि राष्ट्रपति पद के इन होनों उम्मीदवारों के विश्लेषण में देश का मीडिया उनके दलित होने को ही अधिमान दे रहा था। राजनैतिक गलियारों में भी यही चर्चा हो रही थी। मानों उनका दलित समाज से होना ही उनका सबसे बड़ा गुण था। अंग्रेजों के चले जाने के सत्तर साल बाद भी हम जाति की इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन करने के लिए गुण प्रमुख होगा या जाति? कबीर ने अरसा पहले कहा था – मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान। लेकिन आज भी म्यान पर ही चर्चा हो रही है, तलवार की ओर कोई झांक कर भी नहीं देखता। बीसवीं शताब्दी में सामाजिक क्रान्ति की शुरुआत हुई थी ताकि जाति गौण हो जाए और व्यक्ति प्रमुख हो जाए। जाति की छाया में छिपा हुआ व्यक्ति बाहर निकल आए ताकि भारतीय अथवा हिन्दू समाज समरस हो सके। इस सामाजिक क्रान्ति के चार स्तम्भ माने जाते हैं। महात्मा गान्धी, डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार, राम मनोहर लोहिया और भीमराव रामजी आम्बेडकर। इनके प्रयासों से भारतीय अथवा हिन्दू समाज में निरन्तर सागर मंथन हुआ और यह प्रक्रिया किसी सीमा तक अभी भी चली हुई है। यह इसी सागर मंथन का परिणाम था कि दलित समाज के लोग सत्ता शिखरों तक पहुंचे। इतना ही नहीं हिन्दू समाज में व्यापक स्तर पर उनके इस आरोहण को एक सामान्य प्रक्रिया के तौर पर ही देखा गया। जहां समाज में शताब्दियों से जाति के आधार पर इतनी विषमता रही हो कि एक बड़ा वर्ग अस्पृश्य ही मान लिया गया हो, वहां दलित आरोहण की ये घटनाएं सामान्य मान ली गईं, यह भारतीय समाज की आन्तरिक एकता का परिचायक है जिसे विदेशी विद्वान कभी समझ नहीं पाएंगे। यह बात भीमराव आम्बेडकर ने १९१२ में अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपना जाति विषयक निबन्ध प्रस्तुत करते हुए कही थी। उन्होंने भारतीय जाति व्यवस्था को लेकर विदेशी विद्वानों के तमाम विश्लेषणों को नकारा था और जातियों के बावजूद भारत की सांस्कृतिक एकता के आन्तरिक सूत्रों की चर्चा की थी। लगता है १९१२ में भीमराव आम्बेडकर के अकाट्य तर्कों को सुन कर विदेशी विद्वानों ने तो भारतीय मन को न समझ पाने की अपनी असमर्थता को स्वीकार कर लिया था परन्तु भारत का अंग्रेज़ी भाषा का मीडिया अपनी इस असमर्थता को अभी भी स्वीकार कर लेने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविन्द और मीरा कुमार का नाम आते ही यह मीडिया उनके दलित होने को ही महिमामंडित करने के काम में जुट गया। भारतीय समाज केवल जाति के खॉंचों में ही नहीं बंटा हुआ। वह जाति से ऊपर उठ कर भी कार्य करता है। जाति उसके सामाजिक जीवन का एक अंश हो सकती है, वह सम्पूर्ण अंश नहीं है। यदि ऐसा न होता तो भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के चुनाव इतने प्रचण्ड बहुमत से न जीत पाती। हिन्दू समाज ने अपनी इस भीतरी सांस्कृतिक सामाजिक एकता का प्रदर्शन एक बार नहीं बल्कि अनेक बार किया है। लेकिन लगता है अंग्रेज़ी मीडिया राजा जनक के उन दरबारियों की तरह काम कर रहा है जो अष्टावक्र को देखते ही अट्टहास करने लगे थे। लेकिन अन्त में उन्हें स्वयं अपमानित होना पड़ा था। हद तो यह है कि इस बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में दोनों उम्मीदवारों के दलित समाज में से होने के कारण पूर्व राष्ट्रपतियों मसलन ज्ञानी ज़ैल सिंह और के आर नारायणन की जातियों को खोज कर उनका जाति के आधार पर पुनर्विषलेषण होने लगा था।

ध्यान रखा जाना चाहिए कि भारत का राष्ट्रपति देश के १२५ करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करता है न कि किसी जाति विशेष का। ताज्जुब तो इस बात का है कि देश की आम जनता में तो बहस राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को लेकर हो रही है लेकिन देश के विदेशी भाषाओं मसलन अंग्रेजी, फ्रेंच और पुर्तगाली के मीडिया में बहस उम्मीदवारों की जाति को लेकर हो रही है।

अब इस चुनाव में उभर रहे कुछ प्रमुख मुद्दों की बात कर ली जाए। रामनाथ कोविन्द के पक्ष में देश के लगभग अधिकांश राजनैतिक दल एकत्रित हो गए थे। इसका एक प्रमुख कारण उनका अब तक का बेदाग़ व्यक्तित्व रहा। शुरु में यह भी लगता था कि कांग्रेस शायद अपना उम्मीदवार ही न खड़ा करे। लेकिन बाद में शायद कांग्रेस ने अपनी राजनैतिक विवशता के चलते मीरा कुमार को मैदान में उतारा। इसी से हैरान होकर शायद बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने दुख प्रकट किया कि जब हारने की बारी आई तो कांग्रेस ने उसके लिए बिहार की बेटी का चयन क्यों किया। जिन दिनों कांग्रेस राष्ट्रपति का चुनाव जीतने की स्थिति में थी तब उन्हें मीरा कुमार का ध्यान क्यों नहीं आया? लगता है कि मीरा कुमार भी इसको अच्छी तरह जानती थी कि वे अपनी पार्टी की राजनीति की शतरंज पर मोहरा बन गईं हैं। शायद इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के मतदाताओं से अपील की कि वे वोट अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ सुन कर दें। राष्ट्रपति चुनाव के दंगल में यह अपील सबसे पहले इन्दिरा गांधी ने की थी। वे कांग्रेस पार्टी से ताल्लुक रखती थीं। पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए नीलम संजीवा रेड्डी को खड़ा किया था। एक अन्य निर्दलीय प्रत्याशी वी वी गिरी भी चुनाव मैदान में उतर आए थे। इन्दिरा गांधी कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव अभियान में उतरीं तो उन्होंने मतदाताओं से अपील कि वे अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ सुन कर वोट दें। उस समय इसका यह अर्थ निकाला गया था कि कांग्रेस पार्टी से ताल्लुक़ रखने वाले मतदाता, इस बात की चिन्ता मत करें कि कांग्रेस पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी कौन है बल्कि वे वोट देते समय अपनी आत्मा की आवाज़ सुनें और उसी के अनुसार वोट दें। सचमुच ही कांग्रेस के मतदाताओं ने अपनी आत्मा की आवाज सुनी और अपनी पार्टी के प्रत्याशी को हरा दिया।

राजनैतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि मीरा कुमार अच्छी तरह जानती थी कि सोनिया गान्धी ने उन्हें ‘बलि का बकरा‘ बनाया है। नीतिश कुमार ने खुल कर यह कह दिया है लेकिन मीरा कुमार ऐसा कह नहीं पाई। परन्तु उन्होंने सोनिया गान्धी की इस चाल का उत्तर अन्तरात्मा की आबाज वाली अपील से दे दिया। ध्यान रहे मीरा कुमार के पिता जनजीवन राम ने भी १९७६ में अपनी आत्मा की आवाज सुनी थी और ऐन चुनावों के वक़्त इन्दिरा गांधी का साथ छोड़ कर ‘कांग्रेस फार डैमोक्रेसी‘ बना ली थी। जनजीवन राम के आत्मा की आवाज़ सुनने के इस क़दम से चुनावों में इन्दिरा गांधी कि तो कमर ही टूट गई थी। अब देखना है कि उनकी बेटी की आत्मा की आवाज के क्या दूरगामी परिणाम होते हैं!

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