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 कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष सेना के पराक्रम पर अनुचित सवाल खड़े करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने लग गया है। इससे उसे कोई राजनीतिक फायदा होने वाला नहीं है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, आरपीएन सिंह एवं नवजोत सिंह सिद्दू ने वायु सैनिकों द्वारा आतंकी शिविरों पर किए हमले में कितनी संख्या में आतंकी मारे गए, यह सवाल उठाया है। कमोबेश इसी सवाल पर शरद पवार, ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार को घेरा है। आखिरकार मारे गए आतंकियों की लाशों के सबूत पर वायुसेना अध्यक्ष बीएस धनोआ को मीडिया से कहना पड़ा है कि ‘लाशों को गिनना सेना का काम नहीं है। संख्या की जानकारी सरकार देगी।‘ उन्होंने यह भी कहा कि ‘हमने केवल पेड़ों पर बम गिराए होते तो पाकिस्तान बौखलाकर भारत पर हमला क्यों करता ? जबकि इस पलटवार में उसे अपना एफ-16 विमान गंवाना पड़ा। हमारे वायुवीर अभिनंदन ने इस विमान को मार गिराने का दुस्साहसिक काम किया है। हमने एयर स्ट्राइक के जरिए लक्ष्य पर निशाना साधा है और आगे भी इस तरह के हमले जारी रह सकते हैं।‘ दरअसल अमित शाह द्वारा 250 आतंकी मारे जाने की संख्या बताने के बाद इस मुद्दे का राजनीतिकरण शुरू हो गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ सेना का मनोबल गिराने का काम भी कर सकता है। विपक्षी नेताओं द्वारा उठाए सवालों से पाकिस्तान को बल मिलता है और वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन सवालों को सबूत के रूप में लेकर भारत के पक्ष को कमजोर करने का काम करता है।

सेना की शौर्यगाथा गाने की बजाय विपक्ष बेवजह हमलावर हो रहा है। भाजपा भी चुनाव की आहट के चलते इस मुद्दे को भुनाने में लग गई है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जुगल जोड़ी अपना अब 56 इंची सीना दिखाने पर उतर आई है। मोदी ने तो नहीं, लेकिन अमित शाह ने जरूर 250 आतंकियों के मारे जाने की बात कही है। इधर मोदी ने अहमदाबाद और जामनगर की सभाओं में एक बार फिर यह हुंकार भरी है कि ‘चुन-चुन कर आतंकियों को जवाब देना मेरी फितरत में शुमार है। जबकि विपक्ष सेना की कार्यवाही को चुनावी खेल बता रहा है।‘ दरअसल मोदी का यह कहना इसलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि कपिल सिब्बल ने यहां तक कह दिया कि ‘विदेशी समाचार माध्यमों में बालाकोट में आतंकियों को कोई नुकसान नहीं होने की खबर आई है। सरकार बताए कि जब यही खबर विदेशी अखबार लिखते हैं कि पाकिस्तान आतंकियों की शरणस्थली बना हुआ है, तो हम स्वीकार लेते हैं और जब वह लिखते हैं कि कोई आतंकी नहीं मारा गया, तब विश्वास क्यों नहीं किया जाता।‘ क्या इससे यह आशय निकाला जाए कि विदेशी मीडिया जो भी लिखता है, वहीं सही है ?

इसी तरह पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि ‘मैं अपनी सरकार पर भरोसा करने के लिए तैयार हूं, लेकिन अगर हमें चाहते  कि दुनिया को भी भरोसा हो तो सरकार को विपक्ष को कोसने की जगह सबूत देना चाहिए। चूंकि वायुसेना प्रमुख ने कोई आंकड़ा देने से इंकार कर दिया और विदेश मंत्रालय कहता है कि कोई नागरिक या सैनिक हताहत नहीं हुआ तो इनकी संख्या 300 से 350 तक कैसे बताई जा रही है ? क्या चिदंबरम भूल गए कि मुंबई हमले के सबूत उन्हीं की मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली सरकार ने दिए थे, लेकिन वे पाकिस्तान की पैंतरेबाजी के आगे कहीं ठहर नहीं पाए थे ? शरद पवार ने तो मोदी को देश के लिए राष्ट्रीय आपदा तक कह दिया। वहीं तृणमूल कांग्रेस मोदी और शाह की जोड़ी को जुमला जोड़ी कहकर उनका उपहास उड़ा रही है। कांग्रेस ने भाजपा व मोदी सरकार पर खून की दलाली करने तक का आरोप लगा दिया है। अन्य विपक्षी नेता भी कुछ ऐसे ही सवालों को दोहरा रहे हैं।

दरअसल 2016 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद विपक्षी नेताओं का राष्ट्र के सुरक्षा संबंधी मसलों पर सवाल खड़े करना एक लीक सी बन गई है। इसी लीक के फकीर बने नेता इन हमलों के प्रमाण मांग रहे हैं। जबकि यही नेता महबूबा मुती की पाकिस्तानपरस्ती और कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर मौन रहते हैं। सेना पर पत्थरबाजी करने वाले लोगों के विरोध में ये कुछ नहीं बोल पाते। साफ है, मोदी के बढ़ते प्रभाव के चलते ये नेता खिसियानी बिल्ली, खंबा नोचे कहावत को चरितार्थ करने में लग गए हैं।

हालांकि अब राष्ट्रीय तकनीकि शोध संगठन (एनटीआरओ) ने नया प्रमाण देते हुए कहा है कि जब बालाकोट में सेना एयर स्ट्राइक कर रही थीं, तब वहां लगभग 300 मोबाइल सक्रिय थे। इस खुलासे के बाद अब विपक्ष को भी बताना चाहिए कि स्ट्राइक के समय मौके पर कितने आतंकी होने चाहिए ? इस हमले में मारे गए कुछ आतंकियों की तस्वीरें सहित जानकारी समाचार चैनलों पर आई है। इसमें जैशे-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के साले का तो पूरा कुनबा ही तबाह होना बताया गया है। इनमें से एक भी आतंकी का अब तक जीवित रहने का वीडियो जारी नहीं हुआ ? इससे पता चलता है कि मारे गए आतंकियों की निश्चित संख्या जो भी हो, बड़ी संख्या में प्रमुख आतंकी एयर स्ट्राइक में हताहत हुए हैं। जैशे-मोहम्मद के इसी शिविर में 300 के आसपास आतंकियों के मौजूद होने की जानकारी रॉ और अन्य खुफिया एजेंसिंयों ने भी उपग्रह के जरिए बड़ी संख्या में आतंकियों के मौजूद होने की जानकारी दी थी। कुछ सूत्रों से तो यह भी जानकारी मिली थी कि यहां आतंकी 300 से 700 तक हो सकते हैं। ऐसा इसलिए संभव है, क्योंकि शिविर में भर्ती होने वाले नए आतंकियों के प्रशिक्षण के बाद मोबाइल फोन वापिस ले लिए जाते हैं। शिविरों में केवल पुराने और विश्वसनीय आतंकियों को ही मोबाइल रखने की इजाजत है। दरअसल एनटीआरओ के सार्विलांस में जिन आतंकी ठिकानों पर मोबाइल सक्रिय बताए गए थे, उन्हीं पर वायुसेना ने हमला बोलने का लक्ष्य साधा था। संयोग से यह निशाना सटीक बैठा और आतंकियों समेत ठिकाने जमींदोज हो गए। यह हमला इसलिए सत्य की कसौटी पर खरा है, क्योंकि पाकिस्तान सरकार ने मौके का मुआयना देशी-विदेशी पत्रकारों के समूह को नहीं कराया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि बर्बादी के वहां जो निशान मिलते, उससे तय होता कि पाक सरकार, सेना और पाक खुफिया एजेंसियों के सरंक्षण में ये आतंकी शिविर चल रहे थे। इन शिविरों को मदरसों के नाम पर चलाया जा रहा था। इस हमले के बाद मार्गों पर इन मदरसों के दिशा सूचक जो बोर्ड लगे थे, उन्हें भी पाकिस्तान सरकार ने हमले के बाद तुरंत हटा दिया था। दरअसल जो अपुष्ट खबरें वीडियो फुटेज के जरिए आई हैं, उनसे तो यह भी शिनाख्त होती है कि पाक सेना ने हमला स्थल के सबूत मिटाने के साथ मारे गए आतंकियों की लाशें भी ठिकाने लगाने का काम किया है। गोया प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जो एयर स्ट्राइक की गई है, उसे शक के दायरे में लेकर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं।

दरअसल विपक्षी दल इसलिए भी घबराहट में हैं, क्योंकि पुलवामा हमले में 40 जवानों के शहीद होने के बाद मोदी और भाजपा की छवि जिस तरह से धूमिल हुई थी, उसकी भरपाई इस एयर स्ट्राइक ने कर दी है। इसलिए मोदी और भाजपा इस कोशिश में लग गए हैं कि इस मसले को असरकारी मुद्दा बनाकर लोकसभा चुनाव की बाजी जीत ली जाए। भाजपा की इस कोशिश का अनुभव विपक्ष के सभी 21 दलों ने कर लिया है। इसीलिए वे अनर्गल बयानबाजी करके माहौल बदलने की कोशिश में लगे हैं। जबकि उन्हें इस कोशिश से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। जो राहुल गांधी लोकसभा में बार-बार राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सवाल उठाकर चौकीदार को चोर कह रहे थे, वे अब राफेल आने में देरी के लिए नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हालांकि पलटवार में मोदी ने कहा है कि ‘राफेल होता तो आज हमारा एक भी विमान नष्ट नहीं होता, वहीं पाकिस्तान का एक भी विमान नहीं बचता नहीं।‘ दरअसल संकट के समय ही मारक हथियारों की जरूरत अनुभव होती है। बहरहाल विपक्ष यदि स्ट्राइक पर संदेह करने की बजाय आतंकी शिविरों और उसके सरंक्षकों पर कठोर सैन्य कार्यवाही करने की और मांग करता तो सैन्य बलों का मनोबल भी बना रहता और जनता में भी विपक्ष की छवि धूमिल नहीं होती। विपक्ष को एकजुट होकर बेतुके बयान देने की बजाय आतंकवाद को समाप्त करने की पहल करनी चाहिए। इसी में नेता, दल और देश का भला है।

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