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आज हिंदी विश्व के सब से सक्षम मानव संसाधन की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई है। वह विश्व भर में फैल रहे पेशेवर भारतीयों के द्वारा सभी महाद्वीपों तथा लगभग सभी देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। भारतवर्ष की निरंतर विकासमान राजनीतिक और आर्थिक हैसियत उसे वैश्विक व्याप्ति प्रदान कर रही है। फलतः वैश्विक शक्तियां और बहुराष्ट्रीय निगम उसके प्रति रुझान महसूस कर रहे हैं। यहां तक कि स्वयं गूगल का सर्वेक्षण सिद्ध कर रहा है कि विगत दो वर्षों में सोशल मीडिया पर हिंदी में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में ९४ प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है जबकि अंग्रेजी में मात्र १९ प्रतिशत सामग्री का ही इजाफा हुआ है। हिंदी ने डिजिटल दुनिया में अंग्रेजी के एकाधिकार को जिस तरह चुनौती दी है, वह आश्चर्यजनक है।

२१वीं सदी प्रौद्योगिकीय क्रांति के रथ पर सवार होकर आई है जिसने भाषाओं के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती पेश की है। तकनीक लगातार सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अर्थात micro से nano हो रही है। कुछ वर्ष पूर्व तक जो कार्य कंप्यूटर अथवा लैपटॉप द्वारा सम्पन्न होता था वह संपूर्ण कार्य अब स्मार्ट फोन द्वारा विधिवत संचालित हो रहा है। अब तकनीक और अभिव्यक्ति के सभी क्षेत्रों में हिंदी प्रभावी ढंग से मुखरित हो रही है। यूनिकोड के कारण फांट की समस्या काफी हद तक सीमित हो गई है। साथ ही, यांत्रिक अनुवाद और लिप्यांतरण की सुविधा ने हिंदी को अन्य भारतीय और वैश्विक भाषाओं से जोड़ दिया है। अब हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण का व्यावहारिक निदान उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी भी हिंदी के वैश्विक राजदूत और सुपर ब्रांड बन गए हैं। वे संपूर्ण विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हिंदी में जिस प्रभावी तरीके से भाषण देते हैं और उन्हें सुनने के लिए जिस तरह भारी भीड़ जमा होती है, वह प्रकारांतर से ‘हिंद और हिंदी’ की बढ़ती शक्ति का भी उद्घोष है। प्रधान मंत्री जी ने भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि डिजिटल दुनिया में तीन भाषाओं का ही दबदबा रहने वाला है। अंग्रेजी, हिंदी और चीनी। तकनीकी विशेषज्ञ नए सॉफ्टवेयर और ऐप तैयार करें। भाषा आज बदली हुई तकनीक के कारण बड़ा बाजार बनने वाली है। हिंदी को भी एक बाजार के रूप में बदला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे हर राज्य की अपनी मातृभाषा है। ये ज्ञान का विशाल भंडार हैं। चिंतकों को इन भाषाओं के बेहतर तत्वों से हिंदी को समृद्ध बनाना चाहिए और हिंदी को अन्य भाषाओं को जोड़ने में सूत्रधार बनना चाहिए ।

कहना न होगा कि प्रधान मंत्री जी स्वयं देश- विदेश में हिंदी का प्रयोग जिस कौशल के साथ करते हैं उससे न केवल हिंदी की गरिमा बढ़ी है अपितु हिंदी जगत का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। वर्तमान केंद्र सरकार ने हिंदी के व्यवहार में आधिकारिक तौर पर बढ़ावा देने के लिए भी कतिपय प्रयास किए हैं। इस दृष्टि से केन्द्रीय विभागों में हिंदी के व्यवहार को बढ़ाने के साथ- साथ तमिलनाडु के राजमार्गों पर हिंदी में भी दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं। दूसरा कार्य संसदीय समिति द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार ने यह व्यवस्था की है कि यदि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और तमाम केन्द्रीय मंत्री हिंदी बोलने, पढ़ने अथवा लिखने में सक्षम हैं तो वे अपने वक्तव्य हिंदी में ही देंगे। इस निर्णय का देश भर में स्वागत किया गया है। हमारे नए उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू ने कुछ समय पहले कहा था कि हमें अंग्रेजी के पीछे भागने की जरूरत नहीं है। देश का विकास तो हिंदी द्वारा ही होगा। यदि सरकार इस मंतव्य पर आगे बढ़ती है तो हिंदी के पक्ष में सकारात्मक माहौल बन सकता है। भारत सरकार के तमाम प्रयासों के अलावा हिंदी के प्रचार-प्रसार में उपग्रह-चैनलों, विज्ञापन एजेंसियों, बहुराष्ट्रीय निगमों तथा यांत्रिक सुविधाओं का विशेष योगदान है। आज हिंदी वैश्विक मीडिया की चहेती भाषाओं में से एक है। वह जन संचार माध्यमों की सब से प्रिय और अनुकूल भाषा बन कर निखरी है। इस समय विश्व में दस सब से ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में आधे से अधिक हिंदी के अखबार हैं। इसका मतलब यह है कि पढा- लिखा वर्ग भी हिंदी के महत्व को समझ रहा है। आज भारत विश्व की सब से तीव्र गति से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। यहां के पेशेवर दुनिया के सभी देशों में पहुंच रहे हैं और विश्व भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश के लिए आ रही हैं। इसलिए एक तरफ हिंदी भाषी दुनिया भर में फैल रहे हैं तो दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखानी पड़ रही है। तेजी से हिंदी सीखने वालों में चीन और अमेरिका सब से आगे हैं। वस्तुस्थिति यह है कि आज भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया, मारिशस, चीन, जापान, कोरिया, मध्य एशिया, खाड़ी देशों, अफ्रीका, यूरोप, कनाडा तथा अमेरिका तक हिंदी लगातार विस्तार पा रही है। उपग्रह प्रसारित कार्यक्रम, इंटरनेट पर उपलब्ध हिंदी पत्र- पत्रिकाएं, बी.बी.सी .हिंदी के कार्यक्रम और एफ एम रेडियो के द्वारा हिंदी को सीमाहीन विस्तार मिल रहा है। बावजूद इसके वर्तमान सरकार के समक्ष हिंदी को टूटने से बचाने का बड़ा दायित्व है। आज हिंदी की अनेक बोलियां संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए प्रयासरत हैं। यदि हिंदी का संयुक्त परिवार विभक्त होता है तो देश की भाषिक व्यवस्था के समक्ष गहरा संकट उपस्थित हो जाएगा। हिंदी के संख्याबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ऐसी स्थिति में हिंदी की अखंडता की रक्षा के लिए सरकार को प्रतिबद्ध रहना जरूरी है। दूसरी चुनौती हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाना है। यदि हिंदी विश्व की सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली और सब से बड़े लोकतंत्र की भाषा है और वह संयुक्त राष्ट्रसंघ में प्रतिष्ठा सहित आसीन नहीं है तो यह विश्व के हर छठे व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन है। अतः भारत सरकार से यह निवेदन करना चाहता हूं कि वह हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए १२८ देशों का समर्थन जुटाए। हमारी सरकार यदि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए १७० देशों का समर्थन प्राप्त कर सकती है तो उसके लिए यह मुश्किल नहीं है।

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