बहाना

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पियक्कडों को देश की अर्थव्यवस्था ने आज उन्हें पुकारा है। देश ने पुकारा है तो जाना ही पड़ेगा।...राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए खुद का खजाना खाली करना पड़े तो क्या गम है? उनकी पत्नियों की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। वे अपने पतियों की कल्पना सैनिकों की वर्दी में करने लगे।

साधो ये जग बौराना

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अचानक मां दहाड़ मार कर रो दी, क्योंकि उसके कुछ और बच्चों ने मौत को गले लगा लिया था। हमारी जेब में तीन फोन थे, एक लैफ्ट का, एक राइट का, एक लैफ्टाइट का। तीनों बज रहे थे। उस मां की आंखों के आंसू न जाने कैसे हमारी आंखों तक पहुंच गए। ‘साधो ये जग बौराना” कहकर रोते हुए हम उस मां के चरणों में झुक गए...

अति से विकृति

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फैशन अगर व्यक्त्वि को आकर्षक बनाती है, आत्म-विश्वास देती है, तो उसकी अति अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक विकृतियों को भी जन्म देती हैं। फैशन के प्रति स्वीकृती तो हो, लेकिन वह विकृति की सीमा तक नहीं पहुंचनी चाहिए।

जिंदगी को गाते शायर ‘हस्ती’

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हस्तीमल ‘हस्ती’ के रचनात्मक योगदान के जिक्र के बगैर पिछले चार दशक के हिन्दी गज़ल के विकास को पूरी तरह रेखांकित नहीं किया जा सकता। हस्तीजी ऐसे शायर हैं, जो सच्चाई को गुनगुनाते हैं, समय को पहचानते हैं, वर्तमान, भूत और भविष्य के आर-पार खड़े हैं। खुद चिराग बन के जल वक्त के अंधेरे में, भीख के उजालों से रोशनी नहीं होती।  उपरोक्त पंक्तियां ही बयां कर देती हैं, गज़लकार के इरादे। इरादे इतने बुलंद हैं, तभी तो हरे राम समीप अपने आलेख ‘परम्परा और आधुनिकता के सेतु गज़लकार’ में लिखते हैं कि हस्तीम

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