अभूतपूर्व


सुना है भारत सरकार फिल्म वालों से नाराज है। नाराजगी का कारण यह बताया जाता है कि गत वर्ष एक फिल्म में भारत की गरीबी को व्यापक रूप से दिखाया गया। सरकार को लगता है कि इससेे विदेशों में भारत की छवि खराब होती है। लेकिन मेरी समझ में यह असली कारण नहीं है- वजह दूसरी है। क्योंकि भारत की गरीबी, तो पहले से ही जग-जाहिर है। पूर्व में भी कई फिल्मों में इसका चित्रण हुआ है। उन फिल्मों को खूब शोहरत मिली और ढेर सारे अवार्ड भी उन्होंने बटोरे। वैसे भी विदेशी पर्यटक जब हमारे देश आते हैं, तो उनका सबसे पहले साबका यहां के भिखारियों से ही पड़ता है- यह बात दीगर है कि कई भिखारियों के पास अपना अच्छा-खासा बैंक-बैलेंस भी होता है, यही नहीं कई भिखारी तो वास्तविक जीवन में भिखारी होते ही नहीं होते – यह उनका कारोबार होता है। जैसे कि कुछ दिन पहले अखबार में एक खबर छपी थी कि व्यक्ति ठाट से टैक्सी से निकलता है, बीच में भिखारी का चोला धारण करता है, फिर अपने धंधे यानी भीख मांगने के काम में लग जाता है। इस धंधें से उसने अपना एक अच्छा बैंक बैलेंस खड़ा कर लिया। वह एक अच्छे से मकान में भी रहता है। कहने का मतलब ये कि गरीबी का नाटक करने की कला में हमारे यहां के कुछ लोग पारंगत होते हैं। सिनेमा भी तो नाटक का ही एक दूसरा रूप है न। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर इस तरह गरीबी का नाटक दिखाया गया तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा है।

वास्तव में बात कुछ और है, जो अभूतपूर्व है। पहली बार हुई है। इसके कारण ही सरकार की भृकुटि टेढ़ी हुई। असल बात यह है कि इसी फिल्म में पहली बार महंगाई को डायन कहा गया। जिस महंगाई को बड़े जतन से पाल पोस कर बड़ा किया गया, उसे डायन कहने की हिम्मत कैसे हुई? अरे भाई! हमारी प्रगति का सूचकांक है – विकास का इंडेक्स है। वह तो मानो साक्षात लक्ष्मी का रूप है। इसके कारण खरीद-फरोख्त में अधिक धन का हस्तांतरण होता है। देते-लेते समय हथेली ज्यादा मुद्रा का स्पर्श करती है, हम लक्ष्मी के ज्यादा संपर्क में होते हैं। महंगाई को डायन कहना मानो देवी लक्ष्मी का सरासर अपमान है, अक्षम अपराध है, राजद्रोह है, बल्कि कहना चाहिए कि राष्ट्रद्रोह है। वह तो खैर मनाइए कि हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है; इसलिए बात केवल नाराजगी तक ही सीमित है। यदि यही गुनाह किसी तानाशाही हुकूमत में किया जाता, तो अपराधी को उम्र-कैद बामशक्कत की सजा सुना दी गई होती। यह भी हो सकता था कि वहां के कुछ कुछ महंगाईपरस्त, तरक्कीपसंद उसूलों के झंडाबरदार अपराधी का सिर कलम करने का फरमान जारी कर देते ।

सच बात ये है कि यदि हमें उन्नति करना है, तो महंगाई को बढ़ना ही होगा। गणित की भाषा में कहें तो महंगाई और विकास सीधे समानुपाती हैं। जब हमारे यहां के लोग विकसित देशो में जाते हैं, तो उन्हें भारत की तुलना में ज्यादा महंगे लगते हैं। यदि भारत को उन जैसा विकसित देश बनना है, तो महंगाई को आवश्यक रूप से बढ़ाना होगा। हम इससे जी-जान से प्रयत्नशील हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि महंगाई जिस अभूतपूर्व ढंग से बढ़ी है, तो हमारी विकास दर भी अभूतपूर्व ढंग से बढ़ी है। ऐसी विकासोन्मुखी चीज को डायन कहना यकीनन नागवार लगनेवाली बात है- हद दर्जे की हिमाकत है। लेकिन सरकार न तो इससे विचलित है और न ही अपनी नीति से हटनेवाली है।

दरअसल महंगाई वह शै है, जिसका स्वभाव ही बढ़ना है, ठीक वैसे जैसे आयु स्वभावत: बढ़ती है। आज के समय की तुलना उस समय से कीजिए, जब देश आजाद हुआ था। आज के मुकाबले तब कितनी सस्ताई थी, भी लोग महंगाई का रोना रोते थे, क्योंकि उस समय के हिसाब से सचमुच महंगाई थी। तब कहा जाता था, सबसे बड़ा रुपैया। आज रुपया सबसे छोटा सिक्का है। महंगाई बढ़ती है, तो मुद्रा की कीमत घटती है। उस समय भिखारी ‘बाबू एक पैसा दे दे’ कहता था, आज रुपया मांगता है। रुपये से कम आप दे भी नहीं सकते। क्योंकि इससे छोटा सिक्का आजकल आपकी जेब में होता ही नहीं है और अगर हो भी तो वह चलता नहीं।

हां, तो मैं कह रहा था कि महंगाई की प्रवृत्ति बढ़ने की है। कभी-कभार अस्थायी तौर पर वह भले ही कम हो जाये, किंतु उसका स्थायी भाव बढ़ने का है। इस दृष्टि से वह विज्ञान के ताप गति के द्वितीय नियम (सेकेंड लॉ आफ थर्मोडायनामिक्स) जैसी है, जो कहता है कि प्रत्येक अप्रत्यावर्तनीय प्रक्रिया (इर्रिवर्सिविल प्रोसेस)) में एक भौतिक राशि होती है जिसे ‘एंट्रोपी’ कहते हैं। तो भाई, जो चीज स्वभावत: वर्द्धमान है, उसके अभूतपूर्व ढंग से बढ़ने पर उसे ‘डायन’ कहना सचमुच अभूतपूर्व है। हमें तो महंगाई का स्वागत करना चाहिए। क्योंकि जैसा पहले कहा गया है, महंगाई लक्ष्मी का रूप है। मेरी राय में फिल्म का गीत कुछ इस प्रकार से होना चाहिए था :

सैंचा तौ भौतइ कमात है, महंगाई लक्ष्मी पुसात है।
वैसे गीत का फिल्मांकन इस प्रकार से हुआ है कि महंगाई किसी भी कोण से ‘डायन’ नहीं लगती। गानेवाले जितनी मस्ती से तन्मय होकर यह गीत गाते हैं, उससे लगता है कि वे महंगाई से न तो डरे हुए हैं, न घबराये। वे इतने प्रसन्न दिखते हैं जैसे महंगाई डायन न होकर कोई परीजादी हो, जिसे देख देख कर वे आनंदित होते हैं। क्यों न हों, उनके लिए तो महंगाई लक्ष्मी बनकर आयी है। फिल्म ने करोड़ो का बिज़नेस किया है। यह फिल्म उस बहुरुपिया टैक्सीवाले भिखारी जैसी है, जो अपनी गरीबी दिखा-दिखा कर लाखों रुपये जमा करा लेता है। हां, इस फिल्म से कुछ ग्रामीणों की गरीबी जरूर दूर हुई है। इसलिए वे प्रसन्न होकर गाते हैं। अत: फिल्म निर्माता नाराजगी की नहीं, बधाई के पात्र हैं।

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