पत्राचार और सहकारी गोंद

लाला मनसुखदास ने आज आते ही ते से वक्तव्य झाड़ दिया। बोले- ‘सर’! आजकल पत्र लिख्खा बेवकूफी है। मैं उनसे सहगत होते हुए बोला ‘अब पत्र लिखता ही कौन है!’ टेलीफोन की सुविधा घर घर उपलब्ध है। हर एक के हाथ में मोबाइल है चट नम्बर लगाया, यह राह चलते बात कर ली या एम. एम. एस. भेज दिया। रास्ता चलते हुए मोबाइल पर बात करना आज का फैशन है। जिनके पास कम्प्यूटर है, वो पत्र नहीं ई-मेल भेजते हैं। पत्र लिखने की आवश्यकता ही कहां है?’

लाला जी उन लोगों में से हैं जो यदि बहस के मूड़ में हों तो अपनी बात के समर्थन से भी सहमत नहीं होते। यदि सहमत हो जाएं तो बहस की गुंजाइश ही कहां रहे? मेरे कथन को नकारते हुए बोले ‘‘नहीं सर! ऐसा नहीं है। जरुरत है। पत्र लेखन की कला और परंपरा बचाए रखने के लिए जरुरत है कि पत्राचार किया जाए। वह होना चाहिए वर्ना अगली पीढ़ी लिखना ही भूल जाएगी।’’
मैं ‘‘अगली पीढ़ी तो न जाने क्या-क्या भूलने वाली है और क्या क्या भूल चुकी है। यदि पुरानी बातें भूलेगी नहीं तो नई नई कैसी सीखेगी? अब पत्र लिखने का समय किसे है? लोग दिन भर टी.वी. पर क्रिकेट मैच या दूसरे सीरियल देखने में व्यस्त रहते हैं। यदि कभी दो तीन लोग मिल जाएं तो टी.वी. पर जो कुछ देखा उसकी जुगली करते हैं। जैसे वे ही ‘बोर्ड अम्पायर’ हों। इससे समय मिला तो इंटरनेट पर सर्फिंग, चैटिंग करते हैं, ब्लॉग और टर्राट लिखते हैं, फेसबुक अपडेट करते हैं, डाटा अपलोड, डाउन लोड करते हैं या आई-पॉड पर गाने सुनते हैं। देखिए कितनी नई-नई बातें सीख रहे हैं। जब बतयाने का मन होता है तो मोबाइल पर दोस्तों से घंटों वार्तलाप होता है। अब बताइए इतनी व्यस्तताओं के बीच पत्र लिखने की किसे सूझती है और क्यों सुझे?’’
वह : ‘‘यह सब तो फुरसत के काम हैं।’’

मैं : ‘‘चलो मान लेते हैं। मुझे फुरसत के बारे में एक मित्र का कथन याद आ रहा है। वह अक्सर कहते खे ‘‘मारे फुरसत के किसी काम के लिए समय नहीं मिलताय बस यही समझ लिजीए।’’

वैसे सच तो यह है कि आज के जमाने में यह सब काम फुरसत के नहीं, बल्कि अति आवश्य हैं। और हां! पत्र लेखन अवश्य फुरसत का काम बन गया है, जिसके लिए किसी को फुरसत नहीं है। यह तो आप और हम पुरानी पाढ़ी के लोग हैं जिनके हाथ कभी-कभार पत्र लिखने को सुरसुराते हैं और आंकें पोस्टमेन का इंतजार करती हैं। पुरानी आदतें आसानी से नहीं मरतीं।’’
इस बार लाला जी शायद मुझसे सहमत हुए ऐसा मुझे उनके चुप रहने से लगा। तो मैंने उन्हें छेड़ा कहा ‘‘आप कह रहे थे कि पत्र लिखना आजकल बेवकूफी है और फिर पत्र लिखने की हिमायत भी कर रहे हैं, यह कैसी उल्टी बात है?’’

लाला जी – ‘‘वह इसलिए कि पत्र लिखकर कल मैं बेवकूफ बना। अब पहले वाला जमाना तो रहा नहीं जब घर में थोक में पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय और लिफाफे खरीद कर रख लिये जाते थे। इसलिए मैं घर से पत्र लिखकर डाकखाने गया। सोचा वहीं लिफाफा खरीद कर पता लिख का पत्र पोस्ट कर दूंगा. लिफाफा बंद करने के लिए मैंने उसके किनारे पर लगी गोंद पर जीम फिराकर चिपकाने की कोशिश की तो वह नहीं चिपका। पास में एक प्याले में कुछ गोंद जैसी चीज दिखायी दी। उसे लगाने पर भी नहीं चिपका। प्याले में गोंद के रंग का पानी भर था। तभी मुझे पीछे से आवाज सुनाई दी ‘‘भाई साहब! यह सरकारी गोंद है, दिखती है मगर चिपकाती नहीं।’’ एक बुजूर्ग सज्जन कह रहगे थे। फिर उन्होंने जेब से निकालकर ‘फेबीस्टिक’ मुझे दी, बोले’’ ‘‘मैं तो जन भी यहां आता हूं, इसे साथ ले आता हूं। इसकी जरुरत टिकट चिपकाने पर अन्तर्देशीय बंद करने में भी पड़ती है। आप सरकारी गोंद पर निर्भर रहेंगे, तो बेवकूफी ही करेंगे। ‘‘लाला जी ने बताया कि इस पर उन्होंने बुजुर्ग को धन्यवाद दिया और सोचने लगे सरकारी गोंद चिपकाती क्यों नहीं?’’

मैं – ‘‘सरकार के तमाम काम ऐसे ही होते हैं, गोंद की तरह कागज पर दिखायी तो देते हैं, कारगर नहीं होते। क्यों नहीं होते इसका कारण आप जानते ही है। दोष सरकार का नहीं, भ्रष्टाचार का है। जहां सौ पैसे की गोंद लगना चाहिए वहां सिर्फ पन्द्रह पैसे की लगती है। बाकी के पचासी पैसे गोंद लगाने की प्रक्रिया में खर्च हो जाते हैं।’’

अचानक लाला जी की मुखमुद्रा बदली। लगा जैसे उन्हें एकाएक नये ज्ञान का बोध हुआ है। चहक कर बोले ‘‘अब मेरी समझ में आया, जब कोई अफसर या नेता किसी मंत्री या प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की हिमाकत करा है, तो ठिकाने पर पहुंचने से पहले उसका मजबूत प्रेस को कैसे ‘लीक’ हो जाता है। मैंने पूछा ‘कैसे’? उत्तर मिला ‘‘सीधी सी बात है। पत्र सरकारी गोंद से चिपकाया जाता है। ङ्खीक से न चिपकने के कारण रास्ते में खुल जाता होगा, तब दफ्तर का कोई भ्रष्टाचारी उसकी फोटो कापी कराकर प्रेस को बेचकर पैसे खड़े कर लेता होगा और लिफाफे को अपनी गोंद से अच्छी तरह से चिपका कर आगे बढ़ा देता होगा।’’
मैंने हंसकर कहा ‘‘तो कसूर उस आदमी का नहीं, सरकारी गोंद का है।’’ इस पर लाला जी भी हंसने लगे।

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