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अद्भुत व्यक्तित्व के धनी अटलजी

by हिंदी विवेक
in गौरवान्वित उत्तर प्रदेश विशेषांक - सितम्बर २०१७, राजनीति
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१२ नवम्बर १९९५, मुंबई में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। १९८९ की रथयात्रा तथा ढांचा गिराए जाने के बाद से ही मुख्य हीरो के तौर पर उभर रहे आर्गेनाइजर के पूर्व उप संपादक लालकृष्ण आडवाणी दूसरी बार पार्टी के अध्यक्ष थे। उस समय भारतीय राजनीति अपने संक्रमण काल से गुजर रही थी। १९८९ से ही ताश के पत्तों की तरह प्रधान मंत्री (नरसिंह राव का कार्यकाल छोड़ दें तो) फेंट रहे दशक के उत्तरार्ध में सब की निगाहें इस बैठक पर लगी हुई थीं। यहां भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा होनी थी। नाम सब को पता था, बस भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मुहर लगनी बाकी थी। पार्टी के सारे बड़े नेता अघोषित नेपथ्य की राह पर थे। देशभर में केवल आडवाणी के नाम की धूम थी।

घोषणा से पूर्व आडवाणी अपने वक्तव्य के लिए उठे और उन्होंने बिना किसी की राय लिए एक ऐसा वाक्य बोला, जो भारत की राजनीति का रुख बदलने के साथ ही एक नए इतिहास की पटकथा लिखने वाला था। उन्होंने उच्च स्वर में कहा, ‘ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ‘अटलबिहारी वाजपेयीजी’ होंगे।’ पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही साथ पत्रकार दीर्घा में भी सन्नाटा छा गया। आडवाणी के साथ मंच पर बैठे वाजपेयी भी उनकी ओर भकुआए से देख रहे थे। पर बुद्धिजीवी भाजपाई और पत्रकार समझ गए थे कि भाजपा अब सर्वस्वीकार्य पार्टी बनने की राह पर है। ऐसे समय में जबकि पूर्ण बहुमत की सरकार बहुत दूर की कौड़ी है, भाजपा के पास एक सर्वस्वीकार्य नेता होना ही चाहिए जो तमाम गैर विचारधारा वाले दलों को एक ध्वज तले एकत्रित कर सके। भाजपा से लेकर धुर विरोधी कांग्रेसी तक जानते थे कि पूरे देश में अटलजी ही एकमात्र सर्वस्वीकार्य राष्ट्रीय राजनेता थे जो किसी गठबंधन की सरकार को सुचारु रूप से चला सकते थे।

इंदिरा गांधी के बाद देश को अटलजी के रूप में पहला सार्वभौमिक नेता मिला था। एक ऐसा राजनेता जिसकी बात को विपक्षी भी ध्यान से सुनते थे। १९९७ में एक वोट से भाजपा गठबंधन की सरकार गिरने पर उन्होंने एक ऐतिहासिक भाषण दिया था जिसमें उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि, एक दिन भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी। गठबंधन के दौर में कुछ लोगों को यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण लगा था। पर आगे चल कर उनकी भविष्यवाणी पूर्णतः सत्य साबित हुई और उनके समय में गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

अटलजी के चमत्कारिक व्यक्तित्व के बहुत सारे किस्से मशहूर रहे। उनका उदार, विवेकशील, सरल-सहज और निडर व्यक्तित्व वाला मन एक ओजस्वी वक्ता एवं भावुक कवि को भी संजोए हुए है। उनकी विलक्षण ओजस्विता को देख कर जहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने, ‘‘इनके कंठ में सरस्वती का वास है।’’ कहा था, वहीं देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘अद्भुत वक्ता की विश्वविख्यात छवि’ से नवाजा। वे पहले भारतीय राजनेता थे जिसने संयुक्त राष्ट्रसंघ के सम्मेलन में हिंदी में भाषण दिया। उस सम्मेलन में उन्होंने अपने अभिभाषण का अंत संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक से किया था-

सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत॥

यह श्लोक भारतीय संस्कृति ही नहीं अपितु अटलबिहारी वाजपेयी के जीवन दर्शन को भी बखूबी बयां करता है। मिलनसार वाजपेयी के प्रशंसक हर पार्टी में रहे हैं। सहस्राब्दि की शुरुआत में एक तरफ कांग्रेसी नेता नवीन जिंदल सोनिया गांधी के मंच से अटलबिहारी वाजपेयी का गुणगान कर रहे थे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका, रूस, जापान और जर्मनी जैसे देशों के राष्ट्र नियंता उनमें भारत का उज्ज्वल भविष्य देख रहे थे। २४ दलों के गठजोड़ और ८१ मंत्रियों वाले भानुमती के कुनबे का मुखिया बन बिना किसी चूं-चां के पांच वर्ष पूरे करने का अजूबा करने वाले अटलजी जीवन के परम सत्य और उसकी प्रासंगिकता को बखूबी समझते हैं।

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