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वर्षों पहले घने जंगलों में एक बलिष्ठ शेर रहा करता था. वो रोज़ शिकार करके अपना पेट भरता था. एक दिन वह एक भैंसे का शिकार और भक्षण कर अपनी गुफा को लौट रहा था कि तभी रास्ते में उसे एक मरियल-सा सियार मिला. सियार ने उसे लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया.

शेर बड़ा हैरान हुआ. जब शेर ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा, “आप राजा हैं और बहुत ही बलशाली हैं. मैं आपका सेवक बनना चाहता हूं, कुपया मुझे आप अपनी शरण में ले लें. मैं आपकी सेवा करूंगा और आपके द्वारा छोड़े गये शिकार से अपना गुजर-बसर कर लूंगा.’

शेर उसकी बातों से खुश हुआ और उसने सियार की बातों पर भरोसा करके उसकी बात मान ली और उससे दोस्ती करके उसे मित्रवत अपनी शरण में रखा. कुछ ही दिनों में शेर द्वारा छोड़े गये शिकार को खा-खा कर वह सियार बहुत ही तगड़ा और मोटा हो गया.

सियार रोज़ शेर की शक्ति को देखता और प्रतिदिन सिंह के पराक्रम को देख-देख वो खुद को भी शक्तिशाली समझने लगा. उसने भी स्वयं को सिंह का प्रतिरुप मान लिया.

एक दिन उसने सिंह से कहा, ‘दोस्त मैं भी अब तुम्हारी तरह शक्तिशाली हो गया हूं और आज मैं एक हाथी का शिकार करुंगा और उसका भक्षण करुंगा और उसके बचे-खुचे मांस को तुम्हारे लिए छोड़ दूंगा.’

शेर उस सियार को अपना दोस्त समझता था, इसलिए उसने उसकी बातों का बुरा नहीं माना, लेकिन सियार को समझाया ज़रूर कि वो ऐसी गलती न करे. उसे हाथी के शिकार से रोका. पर वो सियार बहुत ही घमंडी बन चुका था. वो अपने ही भ्रम में जी रहा था.

वह दम्भी सियार सिंह के परामर्श को अस्वीकार करता हुआ पहाड़ की चोटी पर जा खड़ा हुआ.  वहां से उसने नज़रें दौड़ाई तो पहाड़ के नीचे हाथियों के एक समूह को देखा.

उनको देखते ही वो तीन बार आवाजें लगा कर एक बड़े हाथी के ऊपर कूद पड़ा, किन्तु हाथी के सिर के ऊपर न गिर वह उसके पैरों पर जा गिरा और हाथी अपनी मस्तानी चाल से अपना अगला पैर उसके सिर के ऊपर रख आगे बढ़ गया. क्षण भर में सियार का सिर चकनाचूर हो गया. सियार उसी वक़्त मर गया.

पहाड़ के ऊपर से शेर सब कुछ देख रहा था. सियार की सारी हरकतें देखकर उसने मन ही मन सोचा कि ‘होते हैं जो मूर्ख औरघमंडी, होती है उनकी ऐसी ही गति.’

सीख: कभी भी ज़िंदगी में घमण्ड नहीं करना चाहिए, क्यूंकि घमंड और मूर्खता का साथ बहुत गहरा होता है. इतिहास गवाह है कि बलशाली और शक्तिशाली लोगों के भी पतन का कारण उनका घमंड बना था.

 

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