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इजराइल। जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। रेगिस्तान में खेती से लेकर तकनीकी, फौजी और भाषा के मामले में इजराइल ने जो मिसाल कायम की है उसका विश्व में दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। दुनिया का छोटा तथा नवीन देश होने के बावजूद इजराईल ने हर क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है।
 
इस दुनिया में मात्र दो ही देश धर्म के नाम पर अलग हुए हैं। या यूं कहे, धर्म के नाम पर नए बने हैं। वे हैं, पाकिस्तान और इजराइल। दोनों के बीच महज कुछ ही महीनों का अंतर हैं। पाकिस्तान बना १४ अगस्त, १९४७ के दिन। और इसके ठीक नौ महीने के बाद, अर्थात १४ मई, १९४८को इजराइल की राष्ट्र के रूप में घोषणा हुई।
पाकिस्तान मुस्लिम धर्म के नाम पर बना, तो इजराइल यहूदियों (ज्यू धर्मियों) के लिए था। किन्तु दोनों देशों में जमीन आसमान का अंतर है। पाकिस्तान ने विगत सत्तर वर्षों में धर्म के नाम पर राजनीति की। अमेरिका जैसी महाशक्ति से मदद लेना जारी रखा। आतंकवाद को प्रश्रय दिया। और इन सब के बीच अपने देश के विकास का डिब्बा गुल किया। ‘कटोरी लेकर खड़ा हुआ देश’ ऐसा पाकिस्तान का यथार्थ वर्णन किया जाता है। इसके ठीक विपरीत, एक करोड़ से भी कम जनसंख्या के इजराइल ने इतने ही समय में ऐसा दमखम दिखाया कि विश्व की राजनीति इजराइल के बगैर पूरी हो ही नहीं सकती।
इजराइल अपने आप में आश्चर्य है। और ज्यू समुदाय विश्व में एक अनूठा उदाहरण है।
ज्यू धर्म प्राचीन हैं। ईसाइयत के पहले भी इसका अस्तित्व था। ईसा के पहले हजार डेढ़ हजार वर्षों तक यहूदियों के उल्लेख इतिहास में मिलते हैं। यहूदी (ज्यू समुदाय) इतिहास में सबसे ज्यादा सताया गया समाज हैं। दो सवा दो हजार वर्ष पहले उन्हें अपनी भूमि से भगाया गया था। चूंकि स्वभावतः ज्यू मेहनती एवम् होशियार होते हैं, वे जहां भी गए, वहां तरक्की कर गए। स्वाभाविकतः अन्य लोगों की ईर्ष्या की बलि चढ़े। दुनिया भर के सताए हुए (भारत अपवाद रहा) यहूदियों के मन में अपने मातृभूमि को लौटने की इच्छा प्रबल थी। इसे ‘जायोनिस्ट’ विचारधारा कहा गया। इसी विचारधारा के चलते, बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, प्रथम विश्व युध्द के पहले, लगभग चालीस हजार यहूदी, इजराइल में जा बसे।
बाद में दूसरे विश्व युध्द में जर्मन नाजियों ने इन यहूदियों का अभूतपूर्व नरसंहार किया। साठ लाख से ज्यादा ज्यू धर्मियों को गैस चैम्बर में ठूंस कर या अन्य यातनाएं देकर मारा गया। इसके कारण पूरी दुनिया में ज्यू समुदाय के प्रति सहानुभूति उमड़ पड़ी। वैश्विक समुदाय ने इन यहूदियों को बसने के लिए दो स्थान प्रस्तावित किए। एक था युगांडा देश का एक हिस्सा और दूसरा वह, जो उनकी मातृभूमि था इजराइल। स्वाभाविकतः ज्यू समुदाय ने उनकी मातृभूमि का विकल्प स्वीकार किया, और १४ मई, १९४८ को इजराइल अस्तित्व में आया। इसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिली, पूरे एक साल बाद, अर्थात ११ मई, १९४९ को।
इजराइल का भाग्य कुछ ऐसा रहा कि अपने निर्माण काल से ही उसे शत्रुओं से जूझना पड़ा। चूंकि मूल इजराइल की भूमि पर मुस्लिम आक्रांताओं ने सैकड़ों वर्षों से कब्जा कर रखा था, अतः उस भूमि पर इजराइल का बनना, यह पड़ोसी मिश्र, सीरिया, जॉर्डन आदि देशों को नागवार गुजरा। और जन्म लेते ही इजराइल को मिश्र, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इराक से युध्द लड़ना पड़ा। यह युध्द, ‘१९४८ का अरब इजराइल युध्द’ नाम से इतिहास में जाना जाता है। इस युध्द में नई नवेली इजराइली सेना ने अरब देशों को अपनी ताकत दिखा दी और इस युध्द के बाद इजराइल की भूमि में २६% की बढ़ोतरी हुई…!
आगे भी यही सिलसिला चलता रहा। इजराइल ने जितने भी युध्द ल़ड़े, लगभग सभी युध्दों के बाद उसके क्षेत्रफल में वृध्दि होती गई।
इजराइल की इस ताकत और प्रगति को देख कर पड़ोसी अरब राष्ट्रों को काफी तकलीफ हो रही थी। जून १९६७ में मिश्र ने कुछ ऐसे हालात निर्माण किए कि इजराइल को युध्द के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा। ५ जून, १९६७ को प्रारंभ हुआ यह युध्द, मात्र छह दिनों में समाप्त हुआ। इसे ‘सिक्स-डे-वॉर’ नाम से इतिहास में जाना जाता है। मिश्र, जॉर्डन और सीरिया ने मिल कर लड़े इस युध्द में छोटे से इजराइल ने निर्णायक जीत हासिल की थी। इस युध्द में इजराइल ने मिश्र से गाजा पट्टी और सिनाई पेनिन्सुला प्रदेश जीता, तो जॉर्डन से वेस्ट बैंक का क्षेत्र हथिया लिया। सीरिया को भी अपना गोलन हाइट्स का क्षेत्र इजराइल के हाथों गवाना पड़ा। कुल मिलाकर इजराइल इस युध्द से भारी फायदे में रहा। उसके लगभग ८०० सैनिक मारे गए। लेकिन मिश्र के पंद्रह हजार, जॉर्डन के छह हजार और सीरिया के लगभग ढाई हजार सैनिक मारे गए। इस युध्द के बाद अरब देशों ने इजराइल की इतनी दहशत ली कि तब से आज तक, कुछ छुटपुट घटनाएं छोड़ दें तो एक भी बड़ा युध्द उन्होंने इजराइल के विरुध्द नहीं लड़ा है।
जब युध्द में इजराइल को नहीं हरा सकते यह ध्यान में आया तो अरब राष्ट्रों ने और इस्लामी आतंकवादियों ने इजराइली नागरिकों पर हमले आरंभ किए। १९७४ में जर्मनी के म्यूनिख में संपन्न हुए ओलंपिक में इस्लामी आतंकवादियों ने इजराइली खिलाडियों को अगवा कर लिया और एक-एक करके सब को समाप्त कर दिया। इस हमले से सारी दुनिया दहल गई। किन्तु आतंकवाद की इस धमकी के आगे न झुकते हुए इजराइली गुप्तचर संस्था ‘मोसाद’ ने इस हत्याकांड में शामिल सभी आतंकियों को एक-एक करके मौत के घाट उतारा।
‘मोसाद’ ने ऐसे और भी अनेक ‘चमत्कारिक ऑपरेशन्स’ किए हैं। दूसरे विश्व युध्द में जर्मनी के जिस नाजी सैनिक अधिकारी ने ज्यू समुदाय को बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतारा था, वह युध्द के बाद फरार हो गया था। ‘मोसाद’ ने उसे सन १९६१ में, अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में ढूंढ़ निकाला। एडोल्फ़ आईशमन नाम का यह हिटलर का साथी, वहां नाम और वेष बदल कर रह रहा था। ‘मोसाद’ के लोगों ने उसे वहां से उठाया। इजराइल पहुंचाया। और उस पर क़ानूनी कार्रवाई की। इजराइल के न्यायालय ने उसे मृत्युदंड की सज़ा सुनाई।
ऐसा ही एक अद्भुत वाकया हैं, ‘ऑपरेशन एंटेबी’। २७ जून, १९७६ को मुस्लिम आतंकियों ने एयर फ्रांस का एक हवाई जहाज हाईजैक किया, जिसमें लगभग आधे यात्री ज्यू समुदाय के थे। आतंकी इस विमान को युगांडा के एंटेबी में ले गए। उनकी मांग थी, इजराइल की जेलों में बंद चालीस इस्लामी आतंकियों को रिहा किया जाए।
इजराइल ने इसका जबरदस्त जवाब दिया। दुनिया के इतिहास में पहली बार हवाई अपहरण की घटना में आतंकी पूर्णतः परास्त हुए। इजराइल डिफेन्स फोर्सेज (आई डी एफ) ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ४ जुलाई, १९७६ को अपने १०६ यात्रियों में से १०२ यात्री सकुशल इजराइल में वापस लाए। इस ऑपरेशन में सभी ७ आतंकी मारे गए। उनको प्रश्रय देने वाले ४५ युगांडन सैनिक भी मारे गए। युगांडा के एयर फोर्स के लगभग ३० फाइटर जहाज नष्ट किए। इजराइल का एकमात्र सैनिक मारा गया, वह था उनका कैप्टेन योहन नेतान्याहू। आज के इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू उसके सगे भाई हैं।
युध्द का अद्भुत कौशल, सुरक्षा में चुस्त, जासूसी में दुनिया में अव्वल ये सब तो इजराइल की विशेषताएं हैं ही, किन्तु इजराइल इनके परे भी हैं। यह इजराइल तकनीकी में अग्रसर राष्ट्र है। यह अत्याधुनिक तकनीक का न सिर्फ प्रयोग करता है, वरन् निर्माण भी करता हैं। इजराइल को ठीक से समझने के लिए इजराइल को पास से देखना जरूरी है।
मैं तीन बार इजराइल गया हूं। तीनों बार अलग-अलग रास्तों से। पहली बार लंदन से गया था। दूसरी बार पेरिस से। लेकिन तीसरी बार मुझे जाने का अवसर मिला, पड़ोसी राष्ट्र जॉर्डन से। राजधानी अम्मान से, रॉयल जॉर्डन एयरलाइन्स के छोटे से एयरक्राफ्ट से तेल अवीव की दूरी मात्र चालीस मिनट की है। मुझे खिड़की की सीट मिली और हवाई जहाज छोटा होने से, तुलना में काफी नीचे से उड़ रहा था। आसमान साफ़ था। मैं नीचे देख रहा था। मटमैले, कत्थई और भूरे रंग का अथाह फैला रेगिस्तान दिख रहा था। पायलट ने घोषणा की, कि ‘थोड़ी ही देर में हम नीचे उतरने लगेंगे’। और अचानक नीचे का दृश्य बदलने लगा। मटमैले, कत्थई और भूरे रंग का स्थान हरे रंग ने लिया। अपनी अनेक छटाओं को समेटा हरा रंग।
रेगिस्तान तो वही था। मिट्टी भी वही थी। लेकिन जॉर्डन की सीमा का इजराइल को स्पर्श होते ही मिटटी ने रंग बदलना प्रारंभ किया। यह कमाल इजरायल का है। उनकी मेहनत का है। उनके जज्बे का है। रेगिस्तान में खेती करने वाला इजराइल आज दुनिया को उन्नत कृषि तकनीकी निर्यात कर रहा है। रोज टनों से फूल और सब्जियां यूरोप को भेज रहा है। आज सारी दुनिया जिसे अपना रही है, वह ‘ड्रिप इरिगेशन सिस्टम’, इजराइल की ही देन है।
इजराइल प्रतीक है स्वाभिमान का, आत्मसम्मान का और आत्मविश्वास का।
मात्र अस्सी लाख जनसंख्या का यह देश। तीन से चार घंटे में देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा संपन्न होती है। मात्र दो प्रतिशत पानी के भण्डार वाला देश। प्राकृतिक संसाधन नहीं के बराबर। ईश्वर ने भी थोड़ा अन्याय ही किया है। आजूबाजू के अरब देशों में तेल निकला है, लेकिन इजराइल में वह भी नहीं।
इजराइल यह राजनीतिक जीवंतता और समझ की पराकाष्ठा का देश है। इस छोटे से देश में कुल १२ दल हैं। आजतक कोई भी दल अपने बलबूते पर सरकार नहीं बना पाया हैं। पर एक बात है देश की सुरक्षा, देश का सम्मान, देश का स्वाभिमान और देश हित इन मुद्दों पर पूर्ण एकमत है। इन मुद्दों पर कोई भी दल न समझौता करता है, और न ही सरकार गिराने की धमकी देता है। इजराइल का अपना ‘नेशनल एजेंडा’ है, जिसका सम्मान सभी दल करते हैं।
१४ मई, १९४८ को जब इजराइल बना, तब दुनिया के सभी देशों से यहूदी (ज्यू) वहां आए थे। अपने भारत से भी ‘बेने इजराइल’ समुदाय के हजारों लोग वहां स्थलांतरित हुए थे। अनेक देशों से आने वाले लोगों की बोली-भाषाएं भी अलग-अलग थीं। अब प्रश्न उठा कि देश की भाषा क्या होनी चाहिए? उनकी अपनी हिब्रू भाषा तो पिछले दो हजार वर्षों से मृतवत पड़ी थी। बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे। इस भाषा में साहित्य बहुत कम था। नया तो था ही नहीं। अतः किसी ने सुझाव दिया कि अंग्रेजी को देश की संपर्क भाषा बनाया जाए। पर स्वाभिमानी ज्यू इसे कैसे बर्दाश्त करते? उन्होंने कहा, ‘हमारी अपनी हिब्रू भाषा ही इस देश के बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनेगी।’
निर्णय तो लिया। लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयां सामने थीं। बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे। इसलिए इजराइल सरकार ने मात्र दो महीने में हिब्रू सिखाने का पाठ्यक्रम बनाया। और फिर शुरू हुआ, दुनिया का एक बड़ा भाषाई अभियान, पांच वर्ष का।
इस अभियान के अंतर्गत पूरे इजराइल में जो भी व्यक्ति हिब्रू जानता था, वह दिन में ११ बजे से १ बजे तक अपने निकट के शाला में जाकर हिब्रू पढ़ाएगा। अब इससे बच्चे तो पांच वर्षों में हिब्रू सीख जाएंगे। लेकिन, बड़ों का क्या?
इसका उत्तर भी था। शाला में पढने वाले बच्चे प्रति दिन शाम ७ से ८ बजे तक अपने माता-पिता और आसपड़ोस के बुजुर्गों को हिब्रू पढ़ाते थे। अब बच्चों ने पढ़ाने में गलती की तो? यह सहज स्वाभाविक भी था। इसका उत्तर भी उनके पास था। अगस्त १९४८ से मई १९५३ तक प्रति दिन हिब्रू का मानक (स्टैण्डर्ड) पाठ, इजराइल के रेडियो से प्रसारित होता था। अर्थात जहां बच्चे गलती करेंगे, वहां पर बुजुर्ग रेडियो के माध्यम से ठीक से समझ सकेंगे।
और मात्र पांच वर्षों में, सन १९५३ में, इस अभियान के बंद होने के समय, सारा इजराइल हिब्रू के मामले में शतप्रतिशत साक्षर हो चुका था!
आज हिब्रू में अनेक शोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं। इतने छोटे से राष्ट्र में इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा हिब्रू में होती है। इजराइल को समझने के लिए बाहर के छात्र हिब्रू पढ़ने लगे हैं।
यह है इजराइल। जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक!

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