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“मोदी ने पांच साल में क्या किया यह प्रश्न पूछा जाता है। उसका एक वाक्य में उत्तर है डरपोक हिंदू को मोदी ने निडर हिंदू के रूप में खड़ा किया। उनका यह ऐतिहासिक कार्य है। …इसलिए मतदान करते समय विचार करें और सबके हित का ध्यान रखें।”

नरेन्द्र मोदी के 56 इंच सीने का डर राहुल गांधी, शरद पवार, उमर अब्दुल्ला और अन्य नेताओं में बहुत समा गया है। कोई भी घटना हो वे नरेन्द्र मोदी के 56 इंच सीने की बात अवश्य करेंगे। पुलवामा में आतंकियों ने हमारे सुरक्षा बलों के जवानों पर हमला किया एवं उनकी हत्या की। पवार ने कहा, “56 इंच के सीने वाला प्रधानमंत्री देश की रक्षा में विफल रहा है।” लोकसभा के चुनाव घोषित हो गए परंतु साथ में जम्मू-कश्मीर विधान सभा के चुनाव घोषित नहीं हुए। उमर अब्दुल्ला कहते हैं, ”बहुत अच्छा काम किया, मोदी साहब! 56 इंच का सीना फेल हो गया।” राहुल बाबा तो रोज ही नरेन्द्र मोदी के विषय में बच्चों जैसी बाते करते हैं। वे कहते हैं, “जब नरेन्द्र मोदी ने सत्ता सम्हाली तब उन्होंने कहा था, “मेरा सीना 56 इंच का है। मैं चौकीदार हूं। पर अब यह साबित हो गया है कि 56 इंच का सीना पोला है।”

ऊपर जिन तीनों के नाम लिए हैं, उनके बारे में ज्यादा बात करना ठीक नहीं है। वे कौन हैं यह हम जानते हैं। व्यक्तिश: मुझे इन तीनों में उमर अब्दुल्ला का चेहरा बिलकुल पसंद नहीं है। फोटो देखते ही मन में घृणा उत्पन्न होती है। यह ऐसा चेहरा है जिसे देश की कोई चिंता नहीं है। कश्मीर के लिए कुर्बानी देने वाले जवानों के लिए उसके पास आंसू नहीं हैं, यह भूल कर भी किसी जवान के घर सांत्वना देने नहीं जाता। उसके दिमाग में भी आजादी का भूत सवार है। आज नहीं तो कल कोई जालिम उपाय कर उसके दिमाग से यह भूत उतारना होगा। शेष बचे दो राष्ट्रीय नेता हैं। उन्हें मोदी एवं मोदी के सीने का इतना डर क्यों?
ऐसा विचार करते समय मुझे मुस्लिम आक्रामक औरंगजेब से लड़ने वाले धनाजी एवं संताजी की याद आती है। महाराष्ट्र की कोख से जन्मे ये दो महान सेनापति हैं। मुसलमानों की सेना में उनकी इतनी दहशत थी कि यदि पानी के पास जाकर घोड़ा पानी नहीं पी रहा होता तो घोड़ा सवार उससे पूछता कि क्यों रे पानी में भी तुझे संताजी-धनाजी दिख रहे हैं क्या? राहुल, पवार, ममता, मायावती कंपनी पब्लिक अनलिमिटेड इन्हें जागृतावस्था में तो मोदी दिखते ही हैं, परंतु नींद में भी वे मोदी के नाम से जाग जाते होंगे, ऐसा डर मोदी ने इन सबके मन में निर्माण कर दिया है।

हमारी परंपरा इस्लामी आक्रमण सहन करने की, मार खाने की, तलवार से कटने की एवं अपना जीवन बचाने हेतु सुन्नत करने की थी। नरेन्द्र मोदी ने यह परंपरा तो तोड़ दी। मार खाने वाले हिंदू को मार देने वाले हिंदू के रूप में खड़ा किया। हमेशा रोने वाले हिंदू को आक्रामकों को रूलाने वाले हिंदू के रूप में खड़ा किया। आक्रामकों को उन्हीं की भाषा में उत्तर देने वाला, जुझारू, पराक्रमी, स्वाभिमानी एवं आग्रही हिंदू खड़ा किया।

मोदी ने पांच साल में क्या किया यह प्रश्न पूछा जाता है। उसका एक वाक्य में उत्तर है डरपोक हिंदू को मोदीजी ने निडर हिंदू के रूप में खड़ा किया। उनका यह ऐतिहासिक कार्य है। मोदीजी ने कितना विकास किया, कितनी नौकरियां दीं, कितना विदेशी निवेश लाया, खेती का कितना विकास किया, ये सब महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। परंतु ये सारे प्रश्न हमारे अस्तित्व से संबधित नहीं हैं। हमारे अस्तित्व का प्रश्न हमसे दुश्मनी रखने वाले शत्रु के साथ हम कैसे व्यवहार करते हैं, हम उसका आलिंगन करने वाले हैं या उसका पेट चीरने वाले हैं? हम उसे बिरयानी खिलाने वाले हैं या बिरयानी खाने वाले दांत तोड़ने वाले हैं? इसके उत्तर में हमारे अस्तित्व का उत्तर निहित है।

चुनकर आने वाली प्रत्येक सरकार का काम देश का विकास करना ही है। इसलिए मोदी सरकार ने विकास के काम किए इसमें तीर मारने वाली कोई बात नहीं है। उनका यह काम है, जो उन्होंने किया यह अच्छी बात है। जैसे माता-पिता का काम बच्चों का पालन-पोषण कर, अच्छी शिक्षा देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़े करने का होता है और यह काम प्रत्येक माता-पिता को करना ही होता है। यह उनका प्राथमिक कर्तव्य है। बच्चों को पढ़ाया, लिखाया एवं उन्हें उनका जीवन जीने लायक बनाया इसमें माता-पिता ने कोई बड़ा तीर मार दिया है ऐसा नहीं है। उन्होंने उनका कर्तव्य निर्वहन किया है।

परंतु इससे आगे जाकर देश का नेतृत्व करने वालों को और भी कुछ काम करने होते हैं। हमारा देश हिंदू बहुसंख्यक है। यह हिंदू एक हजार वर्ष तक गुलामी में रहा। मुस्लिम आक्रामकों ने तो उसकी कमर तोड़ दी। मुसलमानों से डर यह हिंदुओं के स्वभाव का एक भाग बन गया। दो मुसलमान यदि हाथ मे छुरे लेकर आ गए तो सौ हिंदू भागने लगते हैं यह चित्र खड़ा हो गया था। हम मुसलमानों से लड़ नहीं सकते, हम हमारा राज्य निर्माण नहीं कर सकते हैं, ऐसी पराजय की भावना निर्माण हो गई। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा पद्धति से हमारी बुद्धि भ्रष्ट कर दी। हमारी संस्कृति अच्छी नहीं हैं, हमारा जन्म गुलामी में जीने के लिए ही हुआ है, यह भावना हिंदुओं के मन में निर्माण हुई।

इस भावना के विरूद्ध सबसे पहली आवाज स्वामी विवेकानंद ने उठाई। उन्होंने ही मंत्र दिया कि हे हिंदुओं आप शक्तिमान हैं। आप अपने हिंदू होने पर गर्व करें। लोकमान्य तिलक ने भी तेज जगाने का प्रयत्न किया। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने वीरवृत्ति निर्माण की। महात्मा गांधी ने गांवों-गांवों में रहने वालों को निर्भय रहने का आवाहन किया। वे कहते थे कि सामान्य हिंदू डरपोक है और सामान्य मुसलमान आक्रामक है। इस डरपोक हिंदू को महात्मा गांधी ने गोलीबारी के समय भी सीना फूलाकर चलना सिखाया। इस यात्रा में नरेन्द्र मोदी ने इसी हिंदू को, किसी के द्वारा वार किए जाने पर उतना ही जबरदस्त प्रतिवार करना सिखाया। अब हिंदुओं की जलती हुई लाशों को देखते हुए रोने क दिन लद गए। अब हम तुम्हें रूलाएंगे और बदला लेंगे, यह भावना हिंदू मन में जागृत की।

पुलवामा हमले के बारह दिनों के अंदर बालाकोट के आतंकवादी ठिकानों पर हमारी वायुसेना ने हमला किया और जितना ध्वंस आवश्यक था उतना किया। नरेन्द्र मोदी ने देश को बताया कि अब “नई रीति-नई नीति” का जमाना आ गया है। वे कहते हैं कि उरी हमले का बदला सर्जिकल स्ट्राइक कर लिया गया। मोदीजी कहते हैं आतंकवादियों को उनकी ही भाषा में उत्तर दिया गया है। मोदीजी का प्रश्न है कि कुछ न करने वाली सरकार आपको चाहिए या उत्तर देने वाली सरकार?
आतंकवादी हमले भारतवर्ष पर हमेशा होते आ रहे हैं। 26/11 का मुंबई पर हमला सबकी नींद उडाने वाला था। केवल उस समय की केन्द्र सरकार की नींद नहीं उड़ी। उस समय सोनिया गांधी रिमोट कंट्रोल से सरकार चला रही थी। मुंबई में मरे हिंदू, जिससे सोनिया गांधी का कोई सरोकार नहीं था। उन्हें किसी अन्य स्थान पर गिरे चर्च की अधिक चिंता थी। अब वह स्थिति नहीं रही। जितना खून गिरेगा उसके बूंद बूंद का बदला लिया जाएगा। मोदीजी ने केवल भाषण नहीं दिया; अपितु करके दिखाया।

पाकिस्तान पर हमला होने के बाद अब उसने रोना शुरू कर दिया है। उसे अब समझ में आ गया है कि अब वह कहीं भी, कभी भी उसके मनचाहे अनुसार भारत पर आक्रमण नहीं कर सकता है। पिछली सरकार के समय जब उसने हमला किया था तब उसे निश्चित पता था कि सोनिया, राहुल, मनमोहन सहित कांग्रेस की पूरी पलटन पलट कर वार नहीं करेंगे। अब परिस्थिति बदल गई है। अब पत्थर मारा तो पत्थर से ही नहीं वरन गोली या बम से भी उसका उत्तर मिल सकता है यह पाकिस्तान समझ चुका है। पाकिस्तान-पाकिस्तान याने है क्या? सातवीं शताब्दी से प्रारंभ इस्लामी आक्रमण की पाकिस्तान एक अवस्था है। उसका संघर्ष भारत से है, भारत से है अर्थात हिंदुओं से है। इतनी स्पष्ट भाषा में बोलना सेक्युलर पाप है। इसलिए कोई बोलता नहीं। परंतु न बोलने से सत्य छिपता नहीं है। इस सत्य को इसी सत्य के रूप में देखना-समझना चाहिए।

जो कोई भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पाकिस्तान का पक्ष लेता है वह हमारा मित्र नहीं है। किसी को बीच में ही हमदर्दी होती है कि बम की जरूरत नहीं, बातचीत की आवश्यकता है। कोई कहता है संवाद करना चाहिए। कुछ और लोग कहते हैं पाकिस्तान की आर्थिक हालत खराब है उसे मदद करनी चाहिए। भारत में पाकिस्तान के भरपूर मित्र हैं। वे हमारे मित्र नहीं। हमें उनसे कैसे व्यवहार रखना है यह प्रत्येक को तय करना होगा। सिनेमा का नायक अच्छा है, बहुत अच्छा अभिनय करता है परंतु पाकिस्तान का मित्र है तो उसे हमें शत्रु ही समझना चाहिए। उसके साथ शत्रुवत व्यवहार ही करना चाहिए। जिस प्रकार आतंकवादियों को उनकी भाषा में ही उत्तर दिया जाना चाहिए वैसे ही पाकिस्तान का समर्थन करने वालों को भी उनकी ही भाषा में उत्तर दिया जाना चाहिए। मोदीजी ने अब वह राह दिखा दी है।

जिन्हें आदत नहीं है, गोरे गुलाबी होने के बावजूद डरपोक 30 इंची सीने वाले एवं मुर्गी के समान हृदय वाले यदि थरथर कांपने लगे तो उसके लिए मोदी क्या करेंगे? आप में हिम्मत नहीं, आक्रामक वृत्ति नहीं, निर्णय लेने की क्षमता नहीं, आप मध्ययुगीन हिंदू जो मार खाते थे उनका प्रतिनिधित्व करते हैं तो वह हिंदू अब हमें नहीं चाहिए। आज का हिंदू पराक्रम का भूखा है। उसकी इस भूख को शांत करने के लिए इन सब लोगों को लगता है कि उन्हे सब्सिडी दी जाए, कई चीजें मुफ्त मे दें परंतु इन सबसे पराक्रम की भूख नहीं मिटती। मुफ्त खाने वाले एवं देने वाले पराक्रम नहीं कर सकते। जो स्वयं में लाचार है वह दूसरों को भी लाचारी ही सिखाता है।

नरेंद्र मोदी इस परंपरा में नहीं पले बढ़े। उनकी परंपरा लाचारी की नहीं है। परिश्रम से कमाई रोटी खाने की है। इसके कारण उनमें स्वाभिमान है और जहां स्वाभिमान होता है वहीं पराक्रम होता है। लाचार परंपरा वाले लोग ही बालाकोट के हमले के प्रमाण मांग रहे हैं। मरे हुए आतंकवादियों के फोटो मांग रहे हैं। पाकिस्तान भी यही कहता है कि उस पर हमला हुआ ही नहीं, हमारे कोई लोग मरे ही नहीं। पाकिस्तान की वकालत करने वाले इन सब लोगों को हमें भूलना नहीं है। ये लोग आज जिस स्थिति में है उससे यदि ज्यादा सशक्त हो गए तो हमारे अस्तित्व पर नए-नए प्रश्नचिह्न खडे होंगे। इसलिए सावधान रहिए, विचार करें और सबके हित का निर्णय लें।

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