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२०१४ और २०१९ में बहुत फर्क है। भाजपा कार्यकर्ताओं को इसे समझना होगा। केवल पार्टी कार्यालय में बैठ कर यहां-वहां की बातें करना और चाय की प्यालियों पर प्यालियां समाप्त करना, इस सब से कुछ नहीं होने वाला। जनता के दर पर जाकर उनके प्रेम की चाय पीना ज्यादा आवश्यक है। इस दिवास्वप्न में न रहें कि हमारे सभी विरोधी कमजोर हैं और हमें कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा है।
 
भारतीय जनता पार्टी को २०१९ का चुनाव जीतने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह बताने का साहस मैं नहीं करूंगा। न वह मेरा अधिकार है, न ही मैं उसका विशेषज्ञ हूं। करोड़ों मतदाताओं की तरह, मैं केवल एक मतदाता हूं। मेरी तरह करोड़ों मतदाता यदि अपना वोट भारतीय जनता पार्टी को दें तो वह सत्ता में आ सकती है, वर्ना नहीं। बस…मैं इतना ही जानता हू।
तो अब सवाल यह पैदा होता है कि मतदाता किसी भी पार्टी को इतने वोट कब और क्यों देता है कि वह सत्ता में आ जाए? इसी प्रकार वह किसी पार्टी को सत्ता से हटाने के लिए कब और क्यों उसके विरोध में मतदान करता है? यह सारा अध्ययन करने वाले कई लोग हमारे देश में भी हैं और बाहर भी। कभी-कभी उनके अनुमान सही सिद्ध होते हैं और अधिकतर बार गलत। नरेंद्र मोदीजी को सत्ता में आए हुए अब साढ़े तीन साल हो चुके हैं। कई विशेषज्ञों का कहना है कि २०१४ का चुनाव भाजपा ने केवल मोदी लहर के कारण जीता है। कुछ हद तक यह सही भी है। क्या यह मोदी लहर २०१९ तक रहेगी?
कहा जाता है कि एक ही तरह की लहर बार-बार नहीं पैदा की जा सकती। २०१४ में पूरे देशभर में नरेंद्र मोदी की हवा पैदा हो गई थी। उसका सब से बड़ा कारण यह था कि कांग्रेस समेत सभी ने मोदीजी को महाखलनायक घोषित कर दिया था। गुजरात दंगों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया। दंगों में मारे गए मुसलमानों के लिए सभी आंसू बहा रहे थे। लेकिन साबरमती एक्सप्रेस में जिंदा जलाए गए कार सेवकों के लिए किसी की आंखों में आंसू नहीं थे। यह बात हिंदू जनमानस के लिए सहन होने जैसी नहीं थी, इसलिए इतिहास में पहली बार हिंदू, राजनैतिक रूप से जागरूक हुआ और उसने एक हिंदू की तरह वोट दिया। सोनिया गांधी इतालवी हैं और हमें विदेशी सरकार नहीं चाहिए इस प्रकार का एक विचार बनता गया और हिंदू जनता ने देशभक्ति का परिचय देते हुए वोट दिया। इस प्रकार का विश्लेषण सेक्युलर पंडित नहीं करते क्योंकि उनके लिए वास्तव को स्वीकार करना मुश्किल होता है।
क्या आगामी लोकसभा चुनाव में २०१४ की ही तरह, हिंदू मतदाता राजनैतिक रूप से जागरूक रहेगा? क्या राजनैतिक परिस्थिति हिंदू मतदाता के जागरूक रहने के लिए अनुकूल है? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने होंगे। २०१४ के चुनाव में इतालवी सरकार और गुजरात के दंगों की पार्श्वभूमि में लड़े गए थे। फिलहाल तो ऐसी कोई पार्श्वभूमि नज़र नहीं आती। सोनिया गांधी, और उनके पुत्र राहुल गांधी दोनों ही मोदीजी के विरोध में लगभग रोज ही कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। अगर वे ऐसा न करें तो शायद मीडिया उन पर ध्यान भी न दे। वे प्रधान मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। उन्हें लगता है कि प्रधान मंत्री बनने की क्षमता अनुवांशिकता से ही उनमें आ जाती है। राहुल गांधी हिंदू समाज के लिए कोई चुनौती नहीं हैं। आजकल वे भी सावधानी बरत रहे हैं। दिल से हो या न हो, लेकिन मंदिर जाते हैं, देवी-देवताओं के आशीर्वाद लेते हैं। लेकिन आम आदमी अब इतना मूर्ख नहीं रह गया है कि वह इस प्रकार की नाटकबाजियों को न समझ सके।
जहां तक हिंदू समाज के भावनात्मक मुद्दों का प्रश्न है, मोदीजी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि हिंदू समाज उनसे दूर हो जाए। उल्टा आज हर हिंदू चाहता है कि पाकिस्तान की कमर तोड़ दी जाए। कश्मीर में भारतीय सेना को आतंकवादियों का सफाया करने के आदेश दे दिए गए हैं। ये काम भारतीय सेना पूरी ताकत से कर रही है। रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार देश से आया हुआ कचरा है। आज हिंदू समाज नहीं चाहता कि उन्हें हमारे देश में आश्रय देना चाहिए। मोदी शासन ने भी यही नीति अपनाई हुई है। सीमा पर चीन सदा से ही दादागिरी करता रहा है। इस वर्ष भी डोकलाम में उसने दादागिरी और घुसपैठ करने का प्रयास किया। लेकिन मोदी शासन चीन के आगे झुका नहीं। हार कर चीन को हाथ मलते रह जाना पड़ा। दो टूक शब्दों में चीन से कहा गया कि यह १९६२ का भारत नहीं है!!
कांग्रेस के कार्यकाल में, केवल विरोध के पत्र भेज देना एक पसंदीदा शगल बन चुका था। पाकिस्तान और चीन इन पत्रों को कचरे के डिब्बे में डाल देता था। गुंडे-मवाली केवल लातों की ही भाषा समझते हैं। उन्हें ज़ोरदार तमाचा लगाना पड़ता है। तभी वे सही रस्ते पर आते हैं। सीमा पर गोलीबारी को मुंहतोड़ जवाब देकर और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम उठा कर भारत ने पाकिस्तान की गुंडई काफी हद तक कम कर दी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान को अलग-थलग करने में भारत ने सफलता प्राप्त की है। अमेरिका भी आज पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकवादियों को कड़े शब्दों में चेतावनी दे रहा है। यह भारतीय विदेश नीति की विजय है।
भारत का योग दर्शन आज विश्व भर में पहुंच चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व योग दिवस मनाया जाने लगा है। आज विश्व के कई देश योग से जुड़ चुके हैं। गंगा, सभी भारतीयों के लिए श्रद्धा का विषय है। वाराणसी का भारतीय जीवन में अनन्य साधारण महत्व है। स्वयं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी के विकास की ओर ध्यान दे रहे हैं। शासन की हर नीति में आज हिंदू आस्था के विषय प्रकट होते हुए दिख रहे हैं।
गुरदासपुर की हार के मायने
भारत जैसे विशाल, लोकतांत्रिक और बहुदलीय देश में बहुत कम ही ऐसा हो पाता है कि सभी चुनाव एक साथ हों। इसलिए अपने यहां वर्षभर कहीं न कहीं चुनावी त्यौहार चलते रहते हैं। साथ ही बीच-बीच में सांसदों या विधायकों द्वारा इस्तीफा दिए जाने अथवा मृत्यु हो जाने की दशा में होने वाले उपचुनाव भी होते रहते हैं। उसी कड़ी में भाजपा के कद्दावर नेता और सांसद विनोद खन्ना के असमय निधन से रिक्त हुई गुरुदासपुर संसदीय सीट पर ग्यारह अक्टूबर को चुनाव तथा पंद्रह को वोटों की गिनती की गई जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी सुनील जाखड़ ने बीजेपी के उम्मीदवार स्वर्ण सिंह सलारिया को एक लाख तिरानबे हजार मतों से पराजित कर कब्जा जमा लिया। जबकि आप उम्मीदवार की बहुत बुरी गत हुई।
गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले हुए इस चुनाव को लोग लिटमस टेस्ट के तौर पर ले रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है। उस सीट पर भाजपा से एकमात्र और बड़ी भूल हुई, वह है प्रत्याशी का चयन। आमतौर पर ऐसी सीटों पर राजनीतिक दल उस सांसद या विधायक के परिवार से कोई सदस्य लाते हैं पर भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने राज्य इकाई की इच्छा को दरकिनार कर स्व. खन्ना की पत्नी कविता खन्ना की बजाय स्वर्ण सिंह सलारिया पर दांव लगा दिया जिनका जन्म भले ही गुरुदासपुर में भले हुआ था पर मुम्बई में सिक्योरिटी एजेंसी चलाने की वजह से उनका वहां के लोगों से जुड़ाव कम रहा था तथा पूर्व में उनपर लगे एक बलात्कार के मामले को भी कांग्रेस प्रत्याशी ने खूब भुनाया। यह अलग बात है कि मामले कुछ दिन बाद ही उस महिला ने अपना केस वापस ले लिया था।
मामला विनोद खन्ना जैसे बड़े नेता की विरासत का था। भाजपा नेताओं को उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए था। साथ ही कुछ समय पूर्व वहां के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी। वैसे भी वहां भाजपा की स्थिति छोटे भाई सी है इसलिए अकालियों के प्रति होने वाली नाराजगी को भी झेलना पड़ता है। वहां की कांग्रेस सरकार का यह पहला चुनाव था इसलिए स्थानीय सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी थी तथा चुनाव से ठीक पहले किसानों को गन्ना भुगतान कर वहां के गन्ना उद्योग को अपनी ओर खींचने की सफल कोशिश भी की।
सांकेतिक तौर पर भले ही विपक्ष को चुनावी माहौल में रंग भरने का अवसर मिल गया हो पर ऐसा नहीं है। गुजरात भाजपा का मजबूत गढ़ है तथा तमाम समाचार चैनल और राजनीतिक विश्लेषक भी वहां भाजपा द्वारा एक बार फिर बड़ी जीत के प्रति आश्वस्त हैं। अगर हिमाचल प्रदेश की बात करें तो वीरभद्र सिंह से जनता ऊब चुकी है तथा राजनीतिक विश्लेषक वहां भी भाजपा को एक बड़े विजेता के तौर पर देख रहे हैं।
वैसे अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो तमाम बार ऐसा हुआ है जब उपचुनावों में सत्ताधारी दल की हार हुई है। ज्यादातर बार उनके कारण स्थानीय होते हैं। कभी-कभी कार्यकर्ताओं में संवादहीनता की स्थिति आ जाती है या गलत उम्मीदवार चुन लिए जाते हैं। कुछ ऐसा ही इस उपचुनाव में भी हुआ। पूर्व कांग्रेसी तथा २०१४ में पार्टी से बगावत कर विनोद खन्ना के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ चुके सलारिया का उम्मीदवार बनना जनता को पसंद नहीं आया इसलिए उसने उसे नकार दिया। इस हार को नोटबंदी अथवा जीएसटी से जोड़ने वालों को उत्तर प्रदेश के चुनाव को याद रखना चाहिए जो नोटबंदी के साए में ही हुआ था। यदि हम इनके प्रभाव की ही बात करें तो इसके लिए हमें गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनावों के परिणामों पर ध्यान देना चाहिए तथा जो कि जीएसटी के बाद बड़े चुनाव हैं तथा जनता के रुख का सार्थक अनुमोदन करेंगे।
ये सब सकारात्मक बातें होने के बावजूद, २०१४ के परिणाम फिर एक बार आ सकेंगे, यह कहना एक भ्रम होगा। चुनाव, एक प्रकार का युद्ध है। उसमें जो थोड़ा भी लापरवाह हुआ, उसकी हार निश्चित है। कई राज्यों में हमारी सत्ता है, केंद्र में हमारी सत्ता है, इसका यह मतलब नहीं कि अब हमें कोई हरा नहीं सकता। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें बेशक जनहित के कई कार्य कर रही हैं। लेकिन मीडिया और विपक्ष के लोग इसका प्रचार नहीं होने देते। मुख्य धारा के मीडिया को हमेशा से ही स्थापितों के खिलाफ ही लिखना पड़ता है। इसके बिना उनके समाचार पत्र चलेंगे नहीं। अगर समाचार-पत्र सरकार के काम की तारीफ करने लगे तो वे सरकारी समाचार-पत्र बन जाएंगे। और विपक्ष अगर विरोध न करे तो, उनका कोई अस्तित्त्व नहीं रह जाएगा।
कई बातें हैं जिनका नकारात्मक परिणाम होता है। नोटबंदी का निर्णय दूरगामी है, लेकिन आज भी आम आदमी को इसकी तकलीफें झेलनी पड़ रही हैं। आम आदमी की तकलीफ बढ़ाने वाले दो निर्णय और हुए हैं। एक तो सभी जगह आधार-कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है। इसके कारण अपना काम-धंधा छोड़-छोड़ कर कभी मोबाइल गैलरी में जाओ, कभी बैंक में जाओ, कभी पीपी ऑफिस में जाओ, आदि करना पड़ रहा है। यह सब भागदौड़ करने में मैं बहुत बुरी तरह परेशान हो गया था। दूसरा निर्णय जीएसटी लागू करने का। कोई गृहिणी जब जीएसटी के बारे में बात करती है तो साफ नज़र आता है कि वह कितनी परेशान है। अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी के कारण लेन-देन कम हो गया है। हर साल त्योहार के समय सारी दुकानें भरी हुई रहती हैं। दादर के रानडे रोड पर तो चलने के लिए जगह नहीं होती। लेकिन अब वहां से भीड़ नदारद है। जीएसटी के कारण जो सरकारी खजाने में पैसा आया है, उसे अर्थव्यवस्था में क्यों नहीं लगाया जाता? पैसों का लेन-देन बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ाने के लिए कोई योजना क्यों नहीं तैयार की जाती? इन सब बातों का यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो उसके परिणाम बहुत खराब हो सकते हैं।
आम तौर से देखा जाता है कि किसी राजनैतिक पार्टी का कार्यकर्ता, उसकी पार्टी सत्ता में आते ही, बदल जाता है। सत्ता की हवा उसके दिमाग में घुस जाती है। वह खुद को बड़ा आदमी समझने लगता है। २४ घंटे मोबाइल पर बात करते हुए घूमना उसका एकमात्र काम रह जाता है। उसके पास कोई काम लेकर जाओ, सिवाय आश्वासन के आपको कुछ नहीं मिलता। छोटे से छोटा काम होने में भी महीनों लग जाते हैं। मंत्री चाहे भ्रष्ट न भी हो, लेकिन प्रशासनिक भ्रष्टाचार तो वैसा ही है। एक आदिवासी परियोजना के लिए भूमि का प्रश्न आज तीन साल से अटका पड़ा है। प्रशासनिक अधिकारी फाइल दबा कर रखते हैं। ऐसा वे क्यों करते हैं, यह सभी जानते हैं।
सरकार जो भी विकास और जनहित के काम ईमानदारी से, पारदर्शिता से कर रही है, उन्हें जनता तक पहुंचाना अनिवार्य है। इसके लिए पार्टी को अभी से सक्रिय होना होगा। मैं जिस इलाके में रहता हूं, उसमें अधिकतर भाजपा के मतदाता हैं। बीते साढ़े तीन वर्षों में भाजपा का एक भी कार्यकर्ता हमारे इलाके में नहीं आया। हमारी सरकार क्या कर रही है, कौन से विकास कार्य कर रही है, आज भी यह बताने वाला कोई नहीं है। मैंने विधायक और पार्षद को सुझाया कि कई सड़कों की स्थिति दयनीय है, कृपया उसे ठीक करवाएं। लेकिन नतीजा शून्य। इसके बारे में अधिक न लिखें तो ही बेहतर है। अगर यही स्थिति सभी जगह हो, तो उदासीनता बढ़ जाएगी। २०१४ में जो हवा थी, २०१९ में वह उदासीनता में बदल जाएगी और उसके परिणाम घातक होंगे। लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि भगवान करे ऐसा कुछ न हो और भाजपा की ही सरकार बने। अगर हमें विदेशी विचारों के प्रभाव से देश को बचाना है और विदेशी घरानों से बचाना है तो भाजपा का कोई विकल्प नहीं है। मेरा देश, मेरी संस्कृति और धर्म के आधार पर ही विकसित होना चाहिए। मैं सच्चे स्व-राज्य का अनुभव लेना चाहता हूं। ऐसा राज देने की क्षमता केवल भाजपा में है।
लेकिन केवल मेरे अकेले के सोचने से कुछ नहीं होने वाला। अधिक से अधिक मतदाताओं को यह महसूस होना चाहिए। इसके लिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना होगा। कार्यकर्ताओं को हर बस्ती, हर इलाके में घूम-घूम कर लोगों से मिलना होगा। जीवंत जनसंपर्क बनाए रखना होगा। केवल पार्टी कार्यालय में बैठकर यहां-वहां की बातें करना और चाय की प्यालियों पर प्यालियां समाप्त करना, इस सब से कुछ नहीं होने वाला। जनता के दर पर जाकर उनके प्रेम की चाय पीना ज्यादा आवश्यक है। इस दिवास्वप्न में न रहें कि हमारे सभी विरोधी कमजोर हैं और हमें कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा है। निरंतर जागरूकता ही सफलता की कुंजी है।

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