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सत्ता विरोधी लहरों पर सवार होकर चुनावी रण में उतरी कांग्रेस अंतत: भाजपा की ‘पहाड़‘ सरीखी चुनौती के आगे धराशायी होकर रह गई. इस तरह लंबे समय से सत्ता के लिए चला संघर्ष अब देवभूमि में भारतीय जनता पार्टी की ताजपोशी के साथ थम गया. बेशक पहाड़ की जनता की बदलाव प्रिय सियासी प्रवृत्ति के कारण शुरुआत से ही सत्ता विरोधी लहरें बहना शुरू हो गई थीं, लेकिन कांग्रेसी रणनीति और तेवरों से कांग्रेस भी चुनावी परिप्रेक्ष्य में कहीं कमजोर नहीं दिखी. कांग्रेस की दावेदारी इसलिए भी मजबूत मानी जा रही थी, क्योंकि कांग्रेस के कद्दावर नेता और प्रदेश में छह बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह का अघोषित रूप से यह अंतिम चुनाव था. इसलिए प्रदेश में मोदी लहर और राहुल गांधी के साथ-साथ वीरभद्र की सियासी हस्ती की भी परीक्षा थी. और अब चुनावी परिणाम हमारे समक्ष हैं. ६८ सदस्यीय विधान सभा में भाजपा अपने ४४ विधायकों के साथ सूबे की डोर संभालने जा रही है.
 
हालांकि चुनावी परिणाम कई मायनों में हैरान करने वाले रहे. हिमाचली राजनीति के कई सियासी धुरंधर चुनावों में बुरी तरह पिट गए. भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही इस तरह के अप्रिय अनुभवों के दौर से गुजरना पड़ा. सबसे अप्रत्याशित यही कि भाजपा के मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार प्रो. प्रेम कुमार धूमल और भाजपा के ही प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती को कड़े मुकाबलों में हार का मुंह देखना पड़ा. इसके अलावा भाजपा के ही रविंद्र रवि और इंदु गोस्वामी सरीखे उम्मीदवारों को सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्रों से हार झेलनी पड़ी. कांग्रेस में नगरोटा से जी.एस. बाली, धर्मशाला से सुधीर शर्मा, भरमौर से ठाकुर सिंह भरमौरी, बल्ह से प्रकाश चौधरी सरीखे दिग्गज औंधे मुंह गिरे. हैरानी इसलिए भी कि कांग्रेस के ये सभी बड़े चेहरे निवर्तमान सरकार में मंत्रिमंडल में भी शामिल थे. इससे यह भी साबित होता है कि हिमाचली जनता ने चुनाव में चेहरों के बजाय काम को तरजीह दी है. पहाड़ की जनता की इसी खूबी का परिणाम है कि हिमाचली राजनीति को कभी स्थिर या निष्क्रिय पड़ने का मौका नहीं मिला.
 
नतीजों से यह बात भी साबित हो गई कि देवभूमि में चुनावों को मोदी लहर ने भी प्रभावित किया. यह महज हमारी व्यक्तिगत कल्पना नहीं है, बल्कि इस नतीजे तक पहुंचने के लिए कुछ पुख्ता कारण गिनाए जा सकते हैं. नरेंद्र मोदी ने प्रदेश के दो जिलों-कांगड़ा और मंडी में सात रैलियां की थीं. दोनों जिलों की कुल पच्चीस में से २० यानी प्रदेश भर में जीती कुल सीटों की करीब आधी सीटें भाजपा की झोली में आईं. इसके अलावा माना जा रहा था कि प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल और सतपाल सिंह सत्ती का खासा दबदबा है. लेकिन भाजपा के ये दोनों बड़े चेहरे यदि अपनी सीट भी न बचा पाए, तो यहां से हकीकत का अंदाजा लगाने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए. करीब तीन साल पहले जब भाजपा मोदी के नाम पर चुनावी मैदान में उतरी थी, तो उस वक्त भी प्रदेश की जनता ने चारों लोकसभा सीटें मोदी को सौंप दी थीं. संघ के प्रचारक के नाते नरेंद्र मोदी ने हिमाचल में काफी समय बिताया था और कमोबेश तभी से हिमाचली जनता और नरेंद्र मोदी के बीच काफी आत्मीय संबंध रहे हैं. नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बनने के बाद गाहे-बगाहे इन रिश्तों का जिक्र करते भी रहे हैं. ऐसे में नरेंद्र मोदी ने इस मर्तबा पहाड़ी जनता से जो अपील की थी, जनता ने उसका पूरा सम्मान किया है. हिमाचल प्रदेश की जनता ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के जीएसटी और विमुद्रीकरण सरीखे कड़े फैसलों पर भी अपनी मुहर लगा दी है.
 
हिमाचल में महिला प्रतिनिधित्व इन चुनावों में भी कोई खास उम्मीद नहीं जगाता. केवल चार महिलाएं ही प्रदेश विधान सभा तक पहुंचने में कामयाब रही हैं. प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों ने कुल नौ महिला उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था. इनमें भाजपा ने छह तो कांग्रेस ने तीन महिलाओं को पार्टी टिकट दिया था. हिमाचल प्रदेश के कुल ५० लाख २६ वोटरों में महिला वोटरों की संख्या २४ लाख ५७ हजार है. इस लिहाज से देखा जाए, तो प्रदेश विधान सभा में अभी महिला प्रतिनिधित्व बेहद मामूली ही माना जाएगा. यद्यपि प्रदेश के पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी ५० फीसदी की जा चुकी है तथापि आने वाले समय में महिला प्रतिनिधित्व की मांग जोर पकड़ेगी. यह इस लिहाज से भी जरूरी है, क्योंकि महिला सशक्तिकरण के लिए जरूरी है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़े.
 
हिमाचल प्रदेश को अब नई सरकार तो मिल ही गई है, लेकिन इसके समक्ष भविष्य की चुनौतियां भी कम नहीं हैं. जैसे ही नई सरकार सत्ता संभालेगी, तो उसके कंधों पर करीब ४५ हजार करोड़ रुपए के कर्ज का बोझ होगा. इस आर्थिक भार के साथ प्रदेश को प्रगति पथ पर बढ़ाना आसान नहीं होगा. हालांकि प्रदेश में इतने संसाधन और संभावनाएं हैं कि प्रदेश सरकार यदि उनका विवेकपूर्ण ढंग से इस्तेमाल कर पाई, तो विकास का यह सफर आसान हो सकता है. देवभूमि हिमाचल को कुदरत ने हर नेमत से नवाजा है. देव आशीर्वाद के साथ यहां पर्यटन की इतनी संभावनाएं हैं कि इस अकेले क्षेत्र में प्रदेश का खजाना हरा-भरा करने की बेशुमार संभावनाएं हैं. ऐसे में नई सरकार को कार्यभार संभालते ही एक स्पष्ट एवं दूरगामी पर्यटन नीति विकसित करनी होगी. इस एक कार्य से प्रदेश की आर्थिक हालत में सुधार के साथ-साथ बेरोजगारी की समस्या से निपटने में भी मदद मिल सकती है. इसके अलावा प्रदेश में चरमराती कानून-व्यवस्था में सुधार करना भाजपा सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में होना चाहिए. कोटखाई के गुड़िया प्रकरण में उजागर हुई प्रशासनिक विफलता के बाद यह और भी जरूरी हो जाता है कि नई सरकार इस चुनौती को गंभीरता से लें.
 
विधान सभा में जनता यदि दो-तिहाई सीटों के साथ किसी दल को सत्ता में आसीन करती है, तो स्वाभाविक है कि जनापेक्षाएं भी बहुत ज्यादा रही होंगी. ऐसे में भाजपा सरकार को भी इन अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी एक स्पष्ट कार्य नीति निर्धारित करके कार्य करना शुरू कर देना चाहिए. जीत और हार तो चुनाव के अपरिहार्य अंग हैं. जो लोग चुन कर सत्ता में आ रहे हैं, अब उन्हें किसी भी तरह के अहंकार से बचते हुए जनसेवा की भावना को अंगीकार करना चाहिए. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी जीत-हार से भी बढ़ कर यह जरूरी होता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का पूरी ईमानदारी, गंभीरता और निष्पक्षता के साथ निर्वहन करें. देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा सरकार जनापेक्षाओं पर कितना खरा उतर पाती है.

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