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आम चुनाव के नतीजों के बाद भारतीय राजनीति में इस समय खलबली है। एक तरफ कांग्रेस में इतनी बुरी हार से हाहाकार मचा हुआ है तो दूसरी ओर ऐतिहासिक जीत से बम-बम भाजपा में शामिल होने के लिए पश्चिम बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लाइन लगी हुई है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की कथित पेशकश का मसला कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में खारिज कर दिये जाने के बाद क्या पार्टी टूटने की कगार पर है ? देश में वंशवाद की राजनीति क्या सफाए की ओर है। नरेन्द्र मोदी के नए मंत्रिमंडल में किनका पत्ता साफ होगा और कौन नया चेहरा शामिल होगा। ऐसे अनेक प्रश्न हवा में तैर रहे हैं।

कार्यसमिति ने कहा कि कांग्रेस को राहुल की जरूरत है। राहुल गांधी ने कहा कि वे कांग्रेस के पुनर्गठन के लिए काम करेंगे। चर्चा है कि बैठक में एक धड़े द्वारा राहुल की जगह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाने की मांग भी उठी। कोई इस मांग की पुष्टि करे या नहीं यह तो स्पष्ट है कि राहुल से पार्टी का भरोसा टूटा है। हालांकि अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों ने पहले ही इस कवायद को केवल इस्तीफे का राजनीतिक ड्रामा बता दिया था। राहुल गांधी के समर्थन में संजय निरूपम ने कहा कि राहुल के नेतृत्व में हम बहादुरी से लड़े। चर्चा के दौरान यह भी आरोप लगा कि राहुल गांधी के कार्यालय के लोग लेफ्ट की तरह काम कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं के अनुसार राहुल से मुलाकात नहीं हो पाती है। उधर, इस खबर पर भी तरह-तरह की चर्चाएं सरगर्म थीं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ कार्य समिति की बैठक में नहीं मौजूद थे। शायद, इसका प्रमुख कारण कर्नाटक की तरह प्रदेश सरकार के अस्तित्व पर छाया संकट है। भाजपा ने संकेत दिया ही था कि कमलनाथ सरकार चुनाव बाद गिर जाएगी। कांग्रेस ने भी इसके बाद आरोप लगाया कि उसके विधायकों को खरीदने के ऑफर मिले हैं। उधर, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने पार्टी हाईकमान को अपना इस्तीफा भेज दिया है। वहीं अमेठी संसदीय सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए जिला अध्यक्ष योगेश मिश्रा ने इस पद से अपना इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने वालों में ओडिशा के प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पटनायक और कर्नाटक के प्रचार प्रबंधक एच के पाटिल भी शामिल हैं। इस्तीफों का यह दौर अभी जारी रहने की संभावना है। दूसरी ओर, गठबंधन के नेता एक दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। बिहार विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह ने तो गठबंधन से अलग हटकर कांग्रेस को चुनाव में उतरने की सलाह देते हुए कहा, ‘पार्टी को बैसाखी से उतरना होगा। अपनी धरातल, अपनी जमीन को तो मजबूत करना ही होगा।’ सिंह के इस बयान पर आरजेडी उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि किसी पर सवाल उठाने के पहले उन्हें विचार करना चाहिए कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश में वह गठबंधन क्यों नहीं कर सके। तिवारी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अमेठी से चुनाव हारने पर निशाना साधते हुए कहा, ‘कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी में भी चुनाव हार गए। उन्हें हार पर पहले मंथन करना चाहिए।’ हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन के बाद पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू के बीच मतभेद पैदा हो गए। वीरभद्र सिंह ने मीडियाकर्मियों से कहा कि बेहतर परिणाम के लिए सुक्खू को पहले ही हटा देना चाहिए था। दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक आठ महीने पहले सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को भी बड़ा झटका लगा है। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर आप का कोई भी नेता ‘भगवा लहर’ का सामना नहीं कर पाया। यही नहीं आप 18.1 प्रतिशत वोट शेयर के साथ दिल्ली लोकसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर ही अपनी पकड़ बना पाई। निवर्तमान केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ला कहते हैं कि यह सब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के चाणक्य नेतृत्व का नतीजा है कि विपक्ष की नकारात्मकता की राजनीति को जनता ने जबर्दस्त तरीके से नकार दिया। उनमें भगदड़ मचना स्वाभाविक है।

इस चुनाव में वंशवाद की राजनीति को भी धक्का लगा है। एक राजनीतिक विश्लेषक का यह कहना सही है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के वर्चस्व के अतिरिक्त क्षेत्रीय स्तर पर बिहार में लालू यादव अथवा रामविलास पासवान का परिवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव या अजित सिंह का परिवार, कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा का परिवार, आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव-चंद्रबाबू नायडू खानदान, तेलंगाना में के. चंद्रशेखर परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, पंजाब में बादल परिवार आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो लोकतंत्र में भी राजतंत्र की याद कराते हैं। इनके यहां पार्टियां एक परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनी हुई हैं। परिवारवाद की इस दलदली राह पर अब मायावती की बसपा और ममता बनर्जी की टीएमसी भी चल पड़ी है। राहुल गांधी, लालू की बेटी मीसा, मुफ्ती की बेटी महबूबा, मुलायम की बहू डिंपल, लोकदल के अजीत और जयंत, झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन, केसीआर की बेटी कविता और चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश की चुनावों में हार अथवा अकाली दल का दो सीटों पर सिमट जाना बदलते हुए नए भारत का संकेत है।

मोदी मंत्रिमंडल में कौन – कौन होगा शामिल

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की वापसी के बाद नए मंत्रिमंडल के संभावित चेहरों को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। मोदी स्पष्ट कर चुके हैं कि उनके मंत्रिमंडल में 50 फीसदी चेहरे नए होंगे। अर्थात वर्तमान मंत्रियों में से कई की छुट्‍टी होना तय है। स्वास्थ्य कारणों से निवर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली शायद इस बार कोई जिम्मेदारी न लें। अमित शाह को भी मंत्रिमंडल में बड़ा पद दिया जा सकता है। उन्हें रक्षा या वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। फिलहाल शाह को अध्यक्ष के रूप में एक साल का एक्सटेंशन मिला हुआ है। उनका कार्यकाल जनवरी 2020 में खत्म होगा। सुषमा स्वराज इस बार चुनाव नहीं लड़ी हैं, इसलिए उनका मंत्रिमंडल में शामिल होना भी मुश्किल है। ऐसे में उनके सहयोगी मंत्री वीके सिंह को प्रमोट करके कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। स्मृति इरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी से पराजित किया है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि पार्टी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है। वहीं, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, रविशंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रकाश जावड़ेकर, राज्यवर्धनसिंह राठौड़ को नए मंत्रिमंडल में बनाए रखे जाने की संभावना है।

मध्यप्रदेश से ही वरिष्ठ सांसद प्रह्लाद पटेल और राकेश सिंह को भी मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। बिहार से ही गिरिराज सिंह की वापसी हो सकती है, जबकि राधामोहन सिंह को फिर से मौका मिलना ‍मुश्किल है। पासवान के स्थान पर उनके युवा बेटे चिराग को मंत्री बनाया जा सकता है। जदयू कोटे से भी मंत्री बनाए जा सकते हैं। मथुरा से सांसद हेमा मालिनी घोषणा कर चुकी हैं कि उनका यह आखिरी चुनाव है, अत: उन्हें विदाई पुरस्कार के रूप में मंत्री बनाया जा सकता है।

उप्र से ही मेनका गांधी और वरुण में से किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है। हरियाणा से राव इंद्रजीत सिंह को कृषि मंत्रालय दिया जा सकता है। पंजाब से हरसिमरत कौर और सुखबीर सिंह बादल में से किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है। प्रोटेम स्पीकर के लिए तो मेनका  का नाम तेजी से चल रहा है। आगामी चुनाव के मद्देनजर महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से ज्यादा चेहरों को मंत्रिमंडल में स्थान मिलने की संभावना है। बाबुल सुप्रीयो को फिर से मंत्री बनाया जा सकता है। गडकरी की मंत्रिमंडल में वापसी के साथ ही शिवसेना कोटे से भी सांसदों को मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। राजस्थान से दलित चेहरे अर्जुनराम मेघवाल की वापसी हो सकती है। जोधपुर की सरदारपुरा सीट पर मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव को हराने वाले केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को फिर मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। दिल्ली से मनोज तिवारी और हिमाचल से अनुराग ठाकुर मंत्रिमंडल में शामिल हो सकते हैं। किरण रिजिजू अपनी लोकप्रियता की बदौलत फिर से मंत्रिमंडल में जगह पा सकते हैं। कर्नाटक से युवा चेहरे और तेजतर्रार 28 वर्षीय तेजस्वी सूर्या को भी मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। कर्नाटक में ही पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा (तुमकुर) को हराने वाले जीएस बासवराज और गुलबर्गा से कांग्रेस के दिग्गज मल्लिकार्जुन खड़गे को शिकस्त देने वाले डॉ. उमेश जाधव को भी मंत्री पद से नवाजा जा सकता है। जम्मू कश्मीर से डॉ. जितेन्द्र सिंह का भी मंत्री बनना तय माना जा रहा है। तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने का दबाव रहेगा, ऐसे में तेलंगाना के 4 सांसदों में से किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है।

This Post Has 2 Comments

  1. सर, बड़ा ही समीक्षात्मक लेख, साधुवाद

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