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 भारतीय जनता पार्टी के विजय को ऐतिहासिक विजय कहा जा रहा है। ऐसे क्यों है? इसका उत्तर यह है कि यह एक विचारधारा  की विजय है।
इस देश में स्वतंत्रता के पूर्व से दो मुख्य विचारधाराएं चल रही थीं। पहली विचारधारा राष्ट्रीय विचारधारा की थी, जिसके विचारक बंकिमचंद्र, विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर इत्यादि लोग थे। दूसरी विचारधारा समाजवादी विचारधारा थी। इसके विचारक  जवाहरलाल नेहरू, एम एन रॉय, श्रीपाद डांगे आदि लोग थे। जब तक लोकमान्य तिलक  जीवित रहे राष्ट्रीय विचारधारा प्रबल थी। महात्मा गांधी जब तक जीवित रहे, उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद को दूर रखने का प्रयत्न किया।
 पंडित नेहरू के हाथ में देश की सत्ता आने के बाद समाजवादी विचारों को देश का प्रमुख विचार बनाने का प्रयत्न किया गया। कांग्रेस में बड़े पैमाने पर कम्युनिस्ट लोग शामिल हो गए। उन्होंने अपनी पहचान वामपंथी विचारधारा के रूप में बनाई। वे स्वयं को प्रोग्रेसिव, रेशनलिस्ट, आधुनिक आदि बताने लगे।
 राष्ट्रीय विचारों को पुराणपंथी, पिछड़ा हुआ और देश को मध्य युग में ले जाने वाला बताया जाने लगा। इन विचारों पर चलने वाली संस्थाएं सार्वजनिक रूप से अस्पृश्य होने लगी। इन विचारों पर चलने वाले बौद्धिक व्यासपीठ भी बंद हो गए। यह सभी लोग समाज के लिए धोकादायक हैं, ये प्रभावशाली हुए तो देश के टुकड़े हो जाएंगे, विविधता को इन लोगों से धोखा है, ऐसा प्रचार किया जाने लगा।
 लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी की राष्ट्रीय कांग्रेस नेहरू घराने और विचारों की कांग्रेस बन गई। लगभग 60 वर्षों तक इस कांग्रेस का देश पर प्रभाव रहा। सन 2014 में इस प्रभाव को बहुत बड़ा झटका लगा। सन 2019 में नेहरू घराने की विचारधारा शव पेटी में बंद हो गई है इसलिए यह विजय ऐतिहासिक है।
इसके आगे देश राष्ट्रीय विचारधारा पर चलेगा। इस राष्ट्रीय विचारधारा की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
*वह सर्वसमावेशक है।
*विविधता में एकता को संजोने वाली है।
*यह विचारधारा  मानती है कि सत्य एक है,  और *उस तक पहुंचने के मार्ग अलग अलग है।
*यह विचारधारा उपासना भेद को नहीं स्वीकारती।
 *यह विचारधारा जातिभेद स्वीकार नहीं करती।
 *यह विचारधारा अस्पृश्यता स्वीकार नहीं करती।
 *यह विचारधारा मानती है कि अध्यात्म ही भारत की आत्मा है।
 *यह विचारधारा मानती है कि केवल भौतिक विकास ही राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं हो सकता। आध्यात्मिक विकास ही अपना सबसे बड़ा राष्ट्रीय लक्ष्य है।
 *यह विचारधारा चरित्र निर्माण  तथा मूल्यों के आधार पर जीने का निर्देश देती है।
 *जैसा विचार वैसा व्यवहार यही उसका मंत्र है।
 इसके पूर्व सन् 2014 में  इस विचारधारा का राजनैतिक विजय हुआ। अब सन 2019 में इस विचारधारा की विजय पर जनता ने अपनी मुहर लगाई है। इसका अर्थ यह है कि जनता ने अपने इसी सनातन विचार को स्वीकार किया है। इस विचार को लोगों की मान्यता प्राप्त हुई है। जनमान्यता ही इस ऐतिहासिक विजय का महत्वपूर्ण पहलू है।
जनता परंपरागत रूप से इस राष्ट्रीय विचारधारा को ही जी रही थी। उनके जीने को भारतीय जनता पार्टी नाम के राजनैतिक दल ने स्वीकृति दी तथा उनकी जीवनशैली के अनुसार ही हम जिएंगे यह 5 वर्षों में साबित किया। ऐसा करके उन्होंने भारतीय जनता का विश्वास संपादन किया। लोगों को भी यह लगने लगा कि यह लोग हमारा विश्वासघात नहीं करेंगे। इसलिए लोगों ने  तीव्र विपरीत प्रचार होने के बावजूद अपनी ही प्रतिबिंब वाली पार्टी को फिर से सत्ता दे दी। यह एक ऐतिहासिक घटना है।
इसके आगे  देश की राजनीति राष्ट्रीय विचारधारा के आधार पर चलेगी। राष्ट्रीय विचारधारा की राजनीति की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं-
 *देशभक्ति की  भावना अंतर्मन में होनी चाहिए  होनी चाहिए उसे सिखाने की आवश्यकता न पड़े।
 *देश के मूल्यों और परंपराओं को बलवान करने  वाली राजनीति करनी होगी।
 *देश की संस्कृति का सांस्कृतिक मूल्यों का तथा श्रद्धा स्थानों का आदर करना होगा।
 *राजनीति का मुख्य आधार सभी को केवल और केवल न्याय ही रखना होगा।
 *राष्ट्रीय भावनाओं को आगे बढ़ाने वाले उत्सव त्योहार यात्राएं मेले  आदि पर बल देना होगा।
 *राष्ट्रीय दृष्टि से इतिहास की पुनर्रचना करनी होगी।
 *आक्रामक को आक्रामक और  हत्यारों को हत्यारा ही कहना होगा।
 *उपासना पंथों  की विविधता को कायम रखते हुए हम सर्वप्रथम भारतीय हैं, भारत हमारी माता है, भारतीय संस्कृति हमारी है, भारतीय जीवन मूल्य हमारे हैं, भारतीय अध्यात्म हमारा है, यह भाव सभी लोगों के मन में निर्माण करना होगा।
 वह काम कठिन अवश्य है परंतु करना आवश्यक है। विपरीत विचारधारा के लोग औंधे मुंह गिरे जरूर है परंतु सोए नहीं है। यह इस विचारधारा का विरोध जरूर करेंगे। उनकी आवाज उनकी शक्ति से अधिक होती है, परंतु उनकी आवाज  से डरने की आवश्यकता नहीं।
 हम सत्य के मार्ग पर चलने वाले लोग हैं। ‘सत्यमेव जयते’ हमारा बोधवाक्य है। आज तक असत्य का बोलबाला रहा। ‘सत्यमेव जयते’ केवल राजमुद्रा तक ही सीमित था। आज से आगे राज मुद्रा को जीना होगा। यह जीने का कालखंड ही इस ऐतिहासिक विजय का कालखंड होगा।
 इतिहास बनानेवाली इस विजय ने नया इतिहास लिखने की जिम्मेदारी सभी के कंधों पर डाली है। इसके आगे संविधान जीने का कालखंड निर्माण करना होगा। सर्वसमवेशकता, सभी पंथों का आदर, व्यक्ति की प्रतिष्ठा, राष्ट्र की एकता, राष्ट्र की एकात्मता,  सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय तथा  सार्वत्रिक बंधुभाव हमारे संविधान के मूल्य हैं। इन मूल्यों को अब हमें जीना है। मूल्य जीने का अर्थ संविधान को जीना और उस पर अमल करना ही है।

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