शेर को ब्राह्मण की कहानी

विंध्याटवी चारों और से हरे-भरे वृक्षों से घिरी हुई थी। निर्मल पानी के झरने सुमधुर संगीत उतपन्न कर रहे थे। इस वन के राजा शेर ने अपना वजीर एक नीतिवान हंस को बनाया हुआ था। हंस, शेर को आसपास की सारी गतिविधियों से अवगत करता रहता था।

उसी वन के पास एक गांव था। गांव में एक ब्राह्मण परिवार गरीबी में कठिनाई से जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके मन में आया कि शहर में जाकर कुछ ऐसा काम किया जाए, जिससे घर की दशा में कुछ सुधार हो। ऐसा निश्चय कर वह घर से निकल गया। ब्राह्मण उसी वन के पास पहुंचा, जहां वह शेर रहता था। उसी वन को पार करने के बाद शहर में पहुंचा जा सकता था।

वन के प्रवेशद्वार में प्रवेश करते ही ब्राह्मण ने अपनी व्यथा शेर के वजीर हंस को बताई। हंस ने शेर को उसकी सारी व्यथा बता दी। शेर को ब्राह्मण की कहानी सुनते ही दया आ गई और उन्होंने हंस को कुछ स्वर्ण आभूषण देकर ब्राह्मण के पास भेजा। हंस ने सोने के गहने उसको दिए। ब्राह्मण गहनों को लेकर खुशी-खुशी घर चला गया, लेकिन कुछ दिनों के बाद वह धन खत्म हो गया।

ब्राह्मण फिर से वन के प्रवेशद्वार पर पहुंच गया, लेकिन इस समय वन का परिदृश्य बदल चुका था। हंस मर गया था और उसकी जगह कौए ने ले ली थी। ब्राह्मण के वहां पहुंचते ही उसने अपनी कांव-कांव से ब्राह्मण के आने की सूचना जंगल के राजा को दी।

वह दहाड़ मारता हुआ तुरंत वहां पहुंचा और उसने देखते ही ब्राह्मण को पहचान लिया और कहा, ‘यह तो वही ब्राह्मण है जिसको मैने कभी सोने के आभूषण दिए थे।’ शेर ने उससे कहा, ‘महाराज अब आप यहां से लौट जाइए, क्योंकि हंस मर चुका है और कौआ वजीर बन गया है। अब कुछ भी हो सकता है। शेर बोला,

हंस भए सो मगर गए, कागा भए सुजान।

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