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अगर बंगाल में ऐसे ही हालात रहे तो केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है, और धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। अब देखना है कि आगे राज्य के सियासी हाल क्या रहते हैं और ऊंट किस करवट बैठता है।

अब पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आधी रात के पहले कैब से घर जा रही पूर्व मिस इंडिया उशोशी सेनगुप्ता के साथ कुछ मनचलों ने बदतमीजी की, ड्राइवर के साथ मारपीट की; दूसरी ओर रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के चार विभागाध्यक्षों और तीन डीन ने इसलिए इस्तीफा दे दिया कि तृणमूल कांग्रेस के छात्रसंघ समर्थित छात्रों ने चार प्रोफेसरों के लिए कथित रूप से जातिसूचक अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। इस घटना को लेकर पूरे कैंपस में विरोध प्रदर्शन हुए। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कौन कहे, आम आदमी तक सुरक्षित नहीं है। राज्य में पहले वकीलों की, फिर डॉक्टरों की हड़ताल और अब शिक्षकों के प्रदर्शन के बाद ममता सरकार पूरी तरह बैकफुट पर है, ऐसे में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के कयास जारी हैं। भाजपा लगातार ममता सरकार को लेकर हमलावर है तो केंद्र सरकार पिछले दिनों बंगाल को लेकर दो एडवाइजरी भी जारी कर चुकी है। राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मिल चुके हैं।

सवाल ये है कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था को इस हाल में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार कौन है, सत्ता की नकेल किसके हाथ में है? तृणमूल कार्यकर्ता और पुलिस-प्रशासन किसकी शह पर बिगड़ैल हो चुके हैं? क्या सत्ता की चाभी हाथ से फिसलती देख तृणमूल कांग्रेस राज्य में ऐसे हालात पैदा करा देना चाहती हैं कि राष्ट्रपति शासन लग जाए और उसे आगामी विधान सभा चुनाव में सहानुभूति लहर का कोई सहारा मिल जाए या वास्तव में ममता दीदी राज्य की शासन व्यवस्था को संभाल नहीं पा रही हैं? ज्यादा दिन नहीं हुए जब उच्चतम न्यायालय ने कस्टम विभाग की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बंगाल में कुछ बेहद गंभीर चल रहा है, जिसकी तह में जाना जरूरी है। हुआ ये था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी की पत्नी कोलकाता एयरपोर्ट पर दो किलो सोने के साथ पकड़ी गई थी। इस दौरान जब कस्टम अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की कोशिश की तो कोलकाता पुलिस ने न सिर्फ दखल देकर अभिषेक बैनर्जी की पत्नी को छुड़ाया बल्कि कस्टम अधिकारियों को धमकी भी दी गई। इसी तरह, ममता ने इसी बंगाल पुलिस से सीबीआई अफसरों को गिरफ्तार करवा लिया था, जब वे भ्रष्टाचार के आरोपी एक आला पुलिस अफसर से पूछताछ करने पहुंचे थे। ममता बैनर्जी चुनाव के दौरान यह बयान देने से भी नहीं झिझकीं कि पीएम मोदी उनके प्रधानमंत्री नहीं हैं। क्या बंगाल देश से बाहर है? क्या ये सब घटनाएं सीधे-सीधे संघीय ढांचे पर प्रहार नहीं थीं?

इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक अजय वी नायक ने मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में हालात पर कुछ इस तरह प्रकाश डाला था। बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रह चुके नायक ने कहा कि ‘पश्चिम बंगाल की हालत 15 साल पुराने बिहार की तरह है। वहां चुनाव कैसे होते थे? बूथों पर आग लगा दी जाती थी, एक आदमी पूरे गांव का वोट डाल देता था, मतपेटी में स्याही डाल दी जाती थी, किसी खास वर्ग के मतदाता को बूथ के आसपास फटकने भी नहीं दिया जाता था। वोटिंग के दिन अगर 100-200 लोगों की जानें नहीं गईं तो पता ही नहीं चलता था कि चुनाव भी हो रहा है। बिहार में उस समय सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती की जरूरत पड़ती थी। अब ऐसी जरूरत पश्चिम बंगाल में पड़ती है, क्योंकि राज्य के लोगों को पश्चिम बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं रहा और वे सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग कर रहे हैं।’ नायक ने पश्चिम बंगाल के सीईओ की मौजूदगी में कहा, ‘मैं यह नहीं समझ पा रहा कि जब बिहार के लोग माहौल और हालात में बदलाव लाने में कामयाब हो गए तो पश्चिम बंगाल में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है।’

तो क्या पश्चिम बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? भाजपा का आरोप है कि अब तक उसके सौ के लगभग कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। भाजपा नेता भास्कर घोष के अनुसार राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद बिगड़ चुकी है। राज्य सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में पूरी तरह अक्षम साबित हुई है। दार्जिलिंग सहित अनेक स्थानीय निकायों के लोग पूरी-पूरी यूनिट के साथ भाजपा में शामिल हो रहे हैं। अपनी खिसकती जमीन देख ममता बैनर्जी घबरा गई हैं, इसलिए वे हिंसा के जरिये लोगों को डराकर भाजपा में आने से रोकना चाहती हैं। हालांकि, बंगाल भाजपा के एक धड़े का मानना है कि उनकी पार्टी राज्य में कभी भी राष्ट्रपति शासन लगवाने की कोशिश नहीं करेगी, क्योंकि इससे ममता बनर्जी को ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने यानी सहानुभूति हासिल करने का मौका मिलेगा। अन्य विपक्षी दल भी लोकतंत्र पर चोट की बात कहते हुए इसे मुद्दा बनाएंगे। उत्तराखंड या अरुणाचल प्रदेश की तरह अगर पश्चिम बंगाल के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार के फैसले को खारिज किया तो भाजपा के लिए झटका होगा।

इस धड़े के मुताबिक़, जनता यह बहुत अच्छी तरह से जानती है कि ये हिंसाएं कौन करवा रहा है? यही कारण है कि ममता बैनर्जी लगातार अलोकप्रिय हो रही हैं और इसका दुष्परिणाम उन्हें विधान सभा चुनाव में उठाना पड़ेगा। ऐसे में भाजपा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की ‘राजनीतिक गलती’ नहीं करेगी, हालांकि यह सब राज्य के हालात पर निर्भर करेगा। एक अन्य धारणा है कि इस वक्त पश्चिम बंगाल में भाजपा का माहौल बना हुआ है। यहां 2014 में जहां सिर्फ दो सीटें मिलीं थीं, वहीं इस बार 18 सीटें मिलीं। दूसरी ओर, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस में लगातार सेंधमारी कर बीजेपी नेताओं को तोड़ने में लगी है। ऐसे में माना जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद जल्द चुनाव होने पर भाजपा को फायदा मिल सकता है। नहीं तो 2021 तक मामला खिंचने पर पार्टी को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। कारण कि इस दौरान ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल में डैमेज कंट्रोल कर सकती हैं।

वैसे बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ और लोकसभा में संसदीय दल नेता अधीर रंजन चौधरी भले ही बोल चुके हों कि पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी के मुख्यमंत्री रहते हुए निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन होगा तभी निष्पक्ष (विधान सभा) चुनाव होंगे लेकिन भाजपा और मोदी विरोध की विपक्ष की नकारात्मक राजनीति को देखते यह नहीं लगता कि कांग्रेस का आलाकमान या वामपंथी दल पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने का समर्थन करेंगे। एनडीए का घटक जद यू राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध पहले से ही है। उधर, भाजपा के महासचिव और पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने दो टूक कहा है कि अगर बंगाल में ऐसे ही हालात रहे तो केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है, इसलिए हम धारा 356 की मांग करते हैं। अब देखना है कि आगे राज्य के सियासी हाल क्या रहते हैं और ऊंट किस करवट बैठता है।

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