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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में साल 2019-20 का बही-खाता पेश करते हुए ‘स्टडी इन इंडिया‘ यानी ‘भारत में शिक्षा‘  योजना शुरू करने का अहम् निर्णय लिया है। इस योजना का उद्देश्य भारत में उच्च विज्ञान व तकनीकि शिक्षा का ऐसा अंतरराष्ट्रीय माहौल बनाना है, जिससे विदेशी छात्र भारत में पढ़ने के लिए लालायित हों। इस गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए 400 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यदि वाकई हम अपने विश्व-विद्यालयों को वैश्विक स्तर का बनाने में सफल हो जाते हैं, तो देश की प्रतिभाएं तो देश में रहेंगी ही, विदेशी छात्रों के भारत में पढ़ने से विदेशी मुद्रा की भी आमदनी होगी। इसके लिए विवि में नवाचारी सोच के साथ मौलिक शोध को बढ़ावा देना होगा। किंतु उच्च शिक्षा संस्थानों को वैश्विक स्तर का बनाने के तमाम दावों के बावजूद शोध के क्षेत्र में हालात चिंताजनक हैं। हाल ही में चिकित्सकों की महत्वपूर्ण संस्था ‘एसोसिएशन ऑफ डिप्लोमैट नेशनल बोर्ड‘ ने खुलासा किया है कि देश के कुल 576 चिकित्सा संस्थानों में से 332 ने एक भी शोध-पत्र प्रकाशित नहीं किया है। नए शोध-अनुसंधान, नवाचार एवं अध्ययन-प्रशिक्षण का आधार होते हैं। यदि आधे से ज्यादा चिकित्सा संस्थानों में अनुसंधान नहीं हो रहे हैं, तो क्या इनसे पढ़कर निकलने वाले चिकित्सकों की योग्यता व क्षमता विश्वसनीय होगी ? दुनिया भर में चिकित्सा एवं विज्ञान से जुड़े एक तिहाही शोध अमेरिका में होते हैं। इसके बाद चीन और जापान का नंबर है। भारत में केवल तीन फीसदी ही शोध-पत्र बमुश्किल प्रकाशित हो पाते है। तमाम कोशिशों के बावजूद अब जाकर हमारे महज तीन उच्च संस्थान दुनिया के 200 प्रमुख शिक्षा-संस्थानों में शामिल हो पाए हैं।

भारत में शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा का माहौल अंतरराष्ट्रीय बनाने की द़ृष्टि से राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान और शिक्षकों के लिए ज्ञान योजना का भी प्रावधान इस बही-खाते में किया गया है। दरअसल नरेंद्र मोदी सरकार का लक्ष्य है कि देश के ज्यादा से ज्यादा शिक्षा संस्थान दुनिया के 200 प्रमुख संस्थानों में अपनी जगए बनाएं। हालांकि इन कोशिशों की शुरूआत मनमोहन सिंह सरकार के समय से ही हो गई थी। तब से लेकर अब तक शिक्षा संस्थानों में संसाधन व सुविधाएं बड़ी संख्या में बढ़े है, लेकिन न तो विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या घटी और न ही विदेशी छात्रों की भारत में आमद बढ़ी। राष्ट्रसंघ के मुताबिक 2013 तक विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 1 लाख 42 हजार थी। जबकि अकेले अमेरिका में पढ़ने जाने वाले छात्रों की संख्या में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया और रूस में भी बड़ी संख्या में छात्र पढ़ने जा रहे हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने लोकसभा में दी एक जानकारी में बताया है कि 2016 में 36,887 और 2017 में 37,947 छात्र वीजा जारी किए गए हैं। साफ है, स्थिति में बदलाव नहीं आया है। हालांकि इन छात्रों के विदेश में पढ़ने के कारण में केवल इनकी योग्यता से कहीं ज्यादा इनके अभिभावकों के पास अकूत धन का होना है। जब ये छात्र भारत के चिकित्सा व प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश पाने में सफल नहीं हो पाते हैं तो शिक्षा के लिए विदेशी उड़ान भर लेते हैं। रूस में तो केवल धन के बूते ही डॉक्टर बनने के लिए छात्र जाते हैं। जबकि यहां की चिकित्सा शिक्षा भारत से पिछड़ी मानी जाती है। लिहाजा ‘स्टडी इन इंडिया‘ के तहत इस चुनौती को बदलना एक कठिन काम है।

     आज वैश्वीकरण के दौर में विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उदारवादी अर्थव्यवस्था का दूसरा दुखद पहलू है कि हमारे उच्च दर्जे के विज्ञान शिक्षा संस्थान प्रतिभाओं को आकर्षित ही नहीं कर पा रहे हैं। हमारी ज्यादातर प्रतिभाएं या तो विदेश पलायन कर जाती हैं अथवा इंजीनियरिंग के साथ एमबीए करके निजी बैंकों, बीमा कंपनियों अथवा अन्य प्रबंधन संस्थानों से जुड़ जाते हैं। यहां ये प्रतिभाएं जो बुनियादी शिक्षा हासिल की होती है, उसके विपरीत कार्य-संस्कृति में काम करने को विवश होते हैं। देशी-विदेशी तमाम सलाहकार सेवा संस्थान इंजिनियरों से बैंकिंग बही-खातों के संधारण का काम करा रहे हैं। यही काम हमारे राष्टीयकृत बैंकों में इंटर पास कर्मचारी करते हैं। क्या यह विरोधाभासी कार्य-संस्कृति प्रतिभा के साथ छल नहीं है ? क्या इंजीनियर बहुराष्टीय कंपनियों के उत्पादों के लिए ग्राहक तलाशने के लिए हैं ? विज्ञान संस्थानों में जब प्रतिभाओं को अनुकूल काम करने का माहौल नहीं मिलता है, तो वे इतर उपभोक्ता संस्थानों में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।

अक्सर  भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए धन की कमी का रोना, रोया जाता है। हालांकि आविष्कार की प्रतिस्पर्धा में केवल अर्थाभाव को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता ? गोया, हमारे यहां वैज्ञानिक कार्य-संस्कृति ही ऐसी है कि जो शोध हो रहे हैं, उनमें पूर्व में ही हो चुके कार्यों को अदल-बदलकर दोहराया जा रहा है। विश्वविद्यालय स्तर पर विज्ञान व कला विषयों पर कराए जा रहे शोधों में तो दोहराव की प्रवृत्ति ने स्थायी भाव धारण कर लिया है। अनेक कुलपतियों और प्राध्यापकों पर पीएचडी व डिलिट की शोध पत्रों पर नकल के आरोप अदालतों में विचाराधीन हैं। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। इसकी आपूर्ति केवल धन से नहीं की जा सकती ? यह प्रवृत्ति तब से और पनपी है, जब राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने कालाबाजारी करने वाली चिटफंड कंपनियों तक को डीम्ड विश्वविद्यालय और महाविद्यालय खोलने की सौगातें दे दीं। उच्च शिक्षा को चौपट करने का यह बड़ा कारण बना है। निजीकरण की खुली छूट देने के बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी देश में उच्च शिक्षा क्षेत्र का भौतिक ढांचा पर्याप्त नहीं है। आज भी राजनेताओं को विज्ञान के क्षेत्र में भारत के स्वर्णिम इतिहास को याद करते हुए, वैश्विक परिद़ृश्य में उच्च शिक्षा के उत्कृष्ठ केंद्रों के रुप में तक्षशिला और नालंदा याद आते हैं।

     यहां गौरतलब है कि 1930 में जब देश में फिरंगी हुकूमत थी, तब देश में वैज्ञानिक शोध का बुनियादी ढांचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने में साहित्य भी अपर्याप्त था। अंगे्रजी शिक्षा शुरुआती दौर में थी। बावजूद सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल प्राप्त किया। सत्येंद्रनाथ बसु ने आइंस्टीन के साथ काम किया। मेघनाद साहा, रामानुजम, पीसी रे और होमी जहांगीर भाभा अनेक उपलब्धियां पाईं। रामानुजम के एक-एक सवाल पर पी-एचडी की उपाधि मिल रही हैं। लेकिन क्या कारण हैं कि उच्च शिक्षा में तमाम गुणवत्तापूर्ण सुधार होने और अनेक प्रयोगशालाओं के खुल जाने के बावजूद गंभीर अनुशीलन का काम थमा सा है। उपलब्धियों को दोहराना मुमकिन नहीं हो रहा। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हम पश्चिम के प्रभुत्व से छुटकारा नहीं पा रहे ? हालांकि इसरो ने मंगल और चंद्र अभियानों स्वदेशी तकनीक से नई दिशा देकर देश और दुनिया को हैरानी में डाला हुआ है।

दरअसल बीते 70-80 सालों में हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी अवधारणाओं का शिकार हो गई है, जिसमें समझने-बुझने के तर्क को नकारा जानकर रटने की पद्धति विकसित हुई है। दूसरे संपूर्ण शिक्षा को विचार व ज्ञानोन्मुखी बनाने की बजाय, नौकरी अथवा कैरियर-उन्मुखी बना दिया गया है। मसलन शैक्षिक उपलब्धियों को व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया, जो संकीर्ण सोच और निजी विशेषज्ञता को बढ़ावा देती हैं। नए आविष्कार या अनुसंधानों की शुरुआत अक्सर समस्या के समाधान से होती है, जिसमें उपलब्ध संसाधनों को परिकल्पना के अनुरुप ढालकर क्रियात्मक अथवा रचनात्मक रुप दिया जाता है। यही वैचारिक स्त्रोत आविष्कार के आधार बनते हैं। किंतु हमारी शिक्षा पद्धति से इन कल्पनाशील वैचारिक स्त्रोतों को तराशने का अध्यापकीय कौशल कमोबेश नदारद है, लिहाजा कल्पनाशीलता कुंठित हो रही है।

हमें याद करने की जरूरत है कि जिस सरकारी शिक्षा ने आठवें दशक के अवसान तक गांवों-कस्बों से कनस्तर में उदरपूर्ति और कंधे पर बिस्तरबंद में ओढ़ने-बिछाने का सामान लेकर घर से निकले छात्रों में ही वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर आर्थिक लाचारियों के बावजूद गढ़े थे, वहीं शिक्षा जब निजी संस्थानों के हवाले और अंग्रेजी की अनिवार्यता से जोड़ दी गई तो डाँक्टर,इंजीनियर बनने के लिए प्रतिस्पर्धा योग्यता की बजाए, पच्चीस-पचास लाख रूपये धनराशी की अनिवार्य शर्त हो गई। विश्व विद्यालयों ने डिग्री बेचने के गोरखधंधे को उच्च शिक्षा मान लिया। यही मुख्य वजह है कि आज शत-प्रतिशत शिक्षा ज्ञानोन्मुखी होने की बजाए केवल नौकरी पाकर अर्थोन्मुखी होकर रह गई हैं। ऐसे विश्वविद्यालयों से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे ‘भारत में शिक्षा‘ को प्रोत्साहित कर विदेशी छात्रों को आकर्षित कर पाएंगी ?

 

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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