नाविक गुरु

प्राचीन मगध के किसी गांव में एक ज्ञानी पंडित रहते थे। वे भागवत कथा सुनाते थे। गांव में उनका बड़ा सम्मान था। लोग महत्वपूर्ण विषयों पर उनसे ही विचार-विमर्श कर मार्गदर्शन लेते थे।

एक बार पं‍डितजी को राजधानी से राज्य के मंत्री का बुलावा आया। पंडितजी गांव की नदी नाव से पार कर राजधानी पहुंचे। मंत्री ने उनका अति‍थि सत्कार कर कहा- मैंने आपके ज्ञान की काफी प्रशंसा सुनी है। मैं चाहता हूं‍ कि आप प्रतिदिन यहां आएं और मुझे तथा मेरे परिजनों को कुछ दिन भागवत कथा सुनाएं।

पंडितजी ने खुशी-खुशी स्वीकृति दे दी। अब पंडितजी प्रतिदिन नदी पार कर मंत्री को भागवत कथा सुनाने जाने लगे। एक दिन जब पंडितजी नदी पार कर रहे थे तो एक घड़ियाल ने पानी से सिर बाहर निकालकर कहा- पंडितजी, आते-जाते मुझे भी भागवत कथा सुना दिया कीजिए, मैं आपको मोटी दक्षिणा दूंगा, यह कहकर उसने अपने मुंह से एक हीरों का हार निकालकर पंडित को दिया।

पंडितजी हार देखकर भूल ही गए‍ कि उनको मंत्री के यहां कथा सुनाने जाना है तथा तब से वह घड़ियाल रोज उन्हें हीरे-मोती देता।

एक दिन नाव चलाने वाला नाविक उन्हें देखकर हंस पड़ा। पंडितजी ने हंसने का कारण पूछा तो वह बोला- मैं इसलिए हंस रहा हूं कि क्या आपने इतने शास्त्रों का ज्ञान सिर्फ एक घड़ियाल को उपदेश देने के लिए लिया है? आपके ऐसे ज्ञान की परिणति देख मुझे हंसी आ गई।

पंडितजी को अपने लोभी स्वभाव पर शर्म आ गई और फिर वे कभी घड़ियाल को कथा सुनाने नहीं गए।

सीख : लोभवृत्ति ज्ञान की गरिमा को खंडित कर ज्ञानी की प्रतिष्ठा समाप्त कर देती है।

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