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इतिहास आपको माफ नहीं करेगा

शिवाजी महाराज के नाम से कोई न कोई विवाद पैदा करते रहना शायद महाराष्ट्र का स्वभाव बन गया है। एक समय इस प्रकार के विवाद इतिहासकारों के बीच होते थे। जब कुछ इतिहासकारों ने लिखा कि शिवाजी महाराज को लिखना नहीं आता था, उस समय भी बहुत बड़ा विवाद छिड गया था। इस विवाद का मजाक उड़ाने वाली सुंदर कहानी द. मा.मिरासदार ने लिखी थी। नाम था ‘शिवाजी के हस्ताक्षर’। विवाद का विषय इसलिए बना क्योंकि शिवाजी महाराज द्वारा स्वलिखित एक भी पत्र उस समय तक प्राप्त नहीं हुआ था। राजा अपने हाथ से कोई पत्र लिखता है, यही अपने आप मेंं बड़ा मजाक था।

शिवाजी महाराज हिन्दुत्ववादी न होकर सर्वधर्मसमभावी थे, यह भी अपने आप में एक बहुत बड़े विवाद का विषय बना। महाराज के काल मेंं हिन्दुत्व एवं सर्वधर्मसमभाव ये शब्द ही नहीं थे। महाराज हिन्दु थे इसलिये सभी उपासना पंथों का आदर करना उनके रक्त में ही था। औरंगजेब एवं शिवाजी के बीच का यह अंतर सीधे शब्दों में बताने से इस प्रकार के विवाद पैदा नहीं होते। परंतु विवाद पैदा किये बिना न प्रसिद्धि मिलती है न ही पेट भरता है इसलिये प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिये एवं पेट भरने के लिये जिसे जैसा चाहिए वैसे वह महाराज के नाम का उपयोग करने लगता है।

शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मिलने हेतु बुलाया और उसकी आंतें बाहर निकाल दी। कुछ लोगों ने यह खोज की कि यह साजिश के तहत की गई हत्या है। इस तथाकथित खोज से विवाद हेतु एक नया विषय मिल गया। बल्कि वास्तविकता यह है कि अफजलखान शिवाजी महाराज को जान से मारने हेतु ही आया था। महाराज को भी यह पता था। अफजलखान का वध अपने कर्मों से हुआ। वध हमेंशा दुष्टों का होता है इसलिये उसके बारे में किसी को कुछ नहीं लगता। परंतु महाराष्ट्र में अपने आप को अति प्रगतिशील कहलवाने वाले कई लोग हैं। वे इंडियन पीनल कोड के चश्में से महाराज की कृति पर अपना न्याय देते रहते है। परंतु इन महामूर्खों की बातों पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ताजा विवाद जयभगवान गोयल लिखित पुस्तक “आज के शिवाजी: नरेन्द्र मोदी” पुस्तक से शुरू हुआ है। संजय राउत कहते हैं, “राज्य में इस पुस्तक का वितरण नहीं करने दिया जायेगा”। (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जयजयकार) मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष एकनाथ गायकवाड कहते हैं, ” यह पुस्तक महाराष्ट्र में नहीं आने देंगे”। (विचारों की स्वतंत्रता जयजयकार) बालासाहब थोरात, महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, कहते हैं, “छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के आराध्य देवता एवं प्रेरणा स्थान हैं। छत्रपति के नाम से वोट मांगकर भाजपा ने सत्ता प्राप्त की और अब नरेन्द्र मोदी की तुलना शिवाजी महाराज से की जा रही है, इसको सहन नहीं किया जायेगा एवं संपूर्ण महाराष्ट्र में आंदोलन किया जायेगा”। (अलग मत प्रकट करने की स्वतंत्रता का जयजयकार)

इसमें और भी नाम जोड़े जा सकते है परंतु वर्तमान में इतने ही काफी है। राउत, गायकवाड, थोरात इन्हें केवल राजनिती करनी है। इस राजनीति का केवल एक ही समय सूत्र है- नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा का तीव्र विरोध। पुस्तक तो एक निमित्त मात्र है। नरेन्द्र मोदी ने कभी नहीं कहा कि वे “प्रतिशिवाजी“ है। वे संघ स्वयंसेवक है। संघ स्वयंसेवक शिवाजी महाराज को अपना आदर्श मानता है। संघसंस्थापक डॉ. हेडगेवार ने कभी किसी व्यक्ति को संघ का गुरु नहीं बनाया। वे कहते थे कि कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण आदर्श नहीं हो सकता। फिर भी व्यक्तिरुप में किसी को अपना आदर्श मानना हो तो हमारे आदर्श छत्रपति शिवाजी महाराज हैं। उनके द्वारा दिया गया यह संस्कार प्रत्येक स्वयंसेवक के मन पर गहराई तक प्रतिबिम्बित है।

नरेन्द्र मोदी इतना ही कहेंगे कि मैं महाराज का “मर्द मावला(सैनिक)” हूं। वे मेरे आदर्श हैं। स्वयंसेवक के मन में इसके अलावा अन्य कोई विचार आ भी नहीं सकता। जिन्होंने “आज के शिवाजी: नरेन्द्र मोदी” यह पुस्तक लिखी उनका पुस्तक लिखने का क्या उद्देश्य रहा होगा? सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर बैठे व्यक्ति की बेहिसाब स्तुति करना कुछ राजनितिज्ञों का शगल होता है। देवकांत बरुआ जब कांग्रेस के अध्यक्ष थे तब उन्होंने कहा था, “इंदिरा इज इंडिया”। परंतु इंदिराजी ने कभी नहीं कहा कि ‘मैं याने भारत हूं।’ फ्रांन्स में चौदहवें लुई कहते थे “आई एम द स्टेट” अर्थात “मैं याने ही राज्य अर्थात फ्रांस”।

शरद पवार के भक्तों ने शरद पवार को “जाणता राजा” यह उपाधि दी। शरद पवार ने कभी भी स्वत: के लिये ऐसा नहीं कहा। संजय राउत ने शिवसेनाप्रमुख बालासाहब ठाकरे को प्रतिशिवाजी कहा था। उनके इस प्रकार के लेख वर्तमान में सोशल मिडिया पर वायरल हैं। परंतु बालासाहेब ने कभी भी यह नहीं कहा कि मैं वर्तमानकाल का शिवाजी हूं। शिवाजी महाराज के विषय में जाज्वल्य अभिमान उन्होंने लोगों के मन में जागृत किया। शिवाजी महाराज की राजनिती जैसे उन्हें संभव हुई वैसे अमल में लाने की कोशिश उन्होंने की। परंतु भक्तगण कई बार राजा से भी अधिक राजनिष्ठ होने का दिखावा करते है। राउत हो या गोयल इसी माला के दो मोती हैं।

शरद पवार ने एक और नया विवाद पैदा कर दिया है। उनका कहना है कि रामदास स्वामी शिवाजी के गुरु नहीं थे। रामदास स्वामी ने कभी नहीं कहा कि मैं शिवाजी का गुरू हूं, न ही शिवाजी ने कभी यह कहा की रामदास स्वामी मेरे राजनीतिक गुरु हैं। परंतु इससे राजनितियों को कोई लेना देना नहीं है। उनका मतलब तो केवल विवाद पैदा करने से है।

ऐसे भक्तों पर लगाम लगाना आवश्यक है। कई बार इस प्रकार के उत्साही भक्त स्वामी के लिये संकट पैदा कर देते हैं। भाजपा मुख्यालय में इस प्रकार की पुस्तक का विमोचन करने का कोई अर्थ नहीं था। विवाद पैदा करने हेतु मिडिया के लोग तैयार ही रहते है। कोई छोटा कारण भी उनके लिये पर्याप्त होता है। यह विवाद पैदा करनेवाली गैंग बहुत संगठित है। उनका नेटवर्क जबरदस्त है। देश के किसी भी कोने से एक शब्द भी मिला तो उनके नेटवर्क से वह तुरंत वायरल होता है और विवाद प्रारंभ हो जाता है। इसका अनुभव हमें रोज ही हो रहा है। “आज का शिवाजी” यह पुस्तक इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसके लिये नित्य सावधानी रखना अत्यंत आवश्यक है।

हिन्दी विवेक की ओर से दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में 7 जनवरी को ‘कर्मयोद्धा नरेन्द्र मोदी’ इस 300 पृष्ठों के ग्रंथ का विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ। गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि थे। इस पुस्तक की खबरें देश के विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक पर कोई भी चर्चा किसी ने भी नहीं की, क्यों? इसका कारण याने विवाद पैदा करनेवाला कोई मालमसाला इस पुस्तक में नहीं है। नरेन्द्र मोदी का कर्मयोग कैसा है, उनकी अर्थनीति किस प्रकार की है, विदेश नीति कैसी है, देश की विविध समस्याओं पर उनका चिंतन कैसा है, उपाययोजना क्या है, इस विषय में लेख इस ग्रंथ में दिये गये है। ये सब लेखन भावनात्मक है एवं इसमें विवाद निर्माण करने जैसी कोई बात शायद नहीं मिल रही है। जो अपनी शक्ति, समय एवं पैसा इसी काम में खर्च करते हैं उनके लिये इस ग्रंथ ने निराशा पैदा की है। ऐसे व्यक्तियों को दिल्ली में प्रकाशित ‘आज के शिवाजी:नरेन्द्र मोदी’ इस पुस्तक ने मसाला दिया तो उनके दिल को ठंडक पहुंची होगी।

कभी कभी मन में विचार आता है कि स्वर्गीय शिवाजी को उनके नाम से चल रहे इस विवाद के बारे में क्या लगता होगा? दु:ख हो रहा होगा, हंसी आ रही होगी, दया आ रही होगी, कुछ कह नहीं सकते। परंतु उन्हें एक बात निश्चित लगती होगी कि जिस स्वराज्य के लिये मैंने अपना सर्वस्व होम कर दिया, जाति-पांति भूलकर सबको स्वराज्य के काम में लगाया, ब्राम्हण कहकर ब्राम्हणों को अलग नहीं किया। आगरी, कोली, भंडारी इ. जातियों को राजनिती की समझ नहीं है, यह मानकर दूर नहीं किया, कंधे पर कम्बल डालकर गांव-गांव घूमने वाले चरवाहों को अपने से दूर नहीं किया, किसी समाज को अस्पृश्य नहीं कहा। ये सब मेरे ही आदमी है, इसी धरती के पुत्र हैं, यह मानकर स्वराज्य और सुराज्य के लिये सबका उनकी क्षमता के अनुसार उपयोग किया।

स्वर्ग में महाराज कहते होंगे कि मेरी इस विरासत को आगे बढ़ाने की बजाय आज मेरे नाम का उपयोग कर महाराष्ट्र को जातिवाद में डुबो दिया गया है। दूसरों में अच्छाई देखने की बजाय उनमें जो दोष नहीं है वे भी उन्हें चिपकाये जाने की गंदी राजनिती की जा रही है। महाराज निश्चित कह रहे होंगे कि यदि महाराष्ट्र को सडाना हो तो आप अपने कर्तृत्व से सडाइये, आपके कर्मों के फल आपको भोगने ही पड़ेंगे। परंतु यदि महाराष्ट्र को आगे ले जाना हो तो 350 वर्ष पूर्व मेरी शक्ति, बुद्धि, युक्ति से जो मैं नहीं कर सका, यद्यपि मैंने प्रयत्न किया था, उसका स्मरण करें। वह विरासत स्वीकार करने की यदि हिम्मत हो, भुजाओं में बल हो तो उसका स्वीकार करें। परंतु उस विरासत को नष्ट न करें क्योंकि इतिहास जैसे मुझे भूलता नहीं है वैसे वह आपको भी माफ नहीं करेगा।

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