भाजपा नेतृत्व आत्मपरीक्षण करे

हाल के दिल्ली विधान सभा चुनावों में भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी। भाजपा के विकास से भटक कर राष्ट्रीय मुद्दों की ओर बढ़ जाने का शायद यह परिणाम हो सकता है। अब तक पांच राज्य भाजपा गंवा चुकी है और अन्य पांच राज्यों में शीघ्र चुनाव होने हैं। यह भाजपा नेतृत्व के लिए आत्मपरीक्षण की घड़ी है।

भारत की राजधानी दिल्ली में हुए चुनावों ने राजनीति बिसात ही बदल दी हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री कौन होंगे? इस पर पूरे देश की नजरें लगी हुई थीं। अरविंद केजरीवाल तिकड़ी करेंगे या भाजपा दिल्ली में सत्ता पर काबिज होगी इसके लिए यह लड़ाई थी। चुनाव पूरे हुए और परिणाम भी सामने हैं। दिल्ली के नागरिकों ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को मुक्त हस्त से मतदान किया। दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ को 70 में 62 सीटों पर विजय दिलाई। भाजपा के हिस्से में केवल 8 सीटें आई। वैसे ये परिणाम चकित करने वाले नहीं हैं। कार्यालय के काम से पिछले वर्ष अनेक बार दिल्ली जाना हुआ तब स्थानीय लोगों से राजनीतिक चर्चा हुआ करती थी। तब केजरीवाल सरकार के खिलाफ कहीं विरोध के स्वर दिखाई नहीं दे रहे थे। सन 2014 में देश में मोदी लहर को दिल्ली ने रोका था। तब 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को मिली थीं। भाजपा केवल तीन सीटों पर विजय पा सकी थी। इसी नतीजे की क्या 2020 में पुनरावृत्ति होगी, इसका जवाब दिल्ली की यात्रा के दौरान लोगों से चर्चा के बाद ‘हां’ में ही मिला करता था। दिल्ली चुनावों की घोषणा के बाद जनवरी के पहले हफ्ते में चुनावी सर्वेक्षणों और मतदान के बाद किए गए चुनावी सर्वेक्षणों में यह साफ हो चुका था कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार ही आएगी। दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा की यह लगातार चौथी पराजय है। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड के बाद दिल्ली में भी भाजपा को पराजय झेलनी पड़ी। भाजपा का विजयी अश्वमेध चार राज्यों के मतदाताओं ने क्यों रोका? इसका जवाब भाजपा के चाणक्यों को खोजना होगा।

आम आदमी पार्टी ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में बेहतर प्रशासन तो दिया ही, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर अत्यंत कार्यक्षमता के साथ काम किया। इसलिए दिल्ली वालों ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी को ही भरपूर वोटों से विजय दिलाई। इस चुनाव के नतीजों से एक प्रश्न मन में उभरता है कि हरियाणा, झारखण्ड में मतदाताओं ने भाजपा का साथ छोड़ दिया,जिसकी पुनरावृत्ति दिल्ली विधान सभा चुनाव में हुई है।

दो वर्ष पूर्व देश के 18 राज्यों में भाजपा की सरकारें थीं। लेकिन मतदाता धीरे-धीरे भाजपा पर नाराज क्यों हो रहे हैं? इसका चिंतन भाजपा के धुरंधर नेताओं को करना होगा। दिल्ली की जिस जनता ने 2014 व 2019 के लोकसभा चुनावों में सभी सीटें भाजपा की झोली में डाली थीं, वही जनता विधान सभा चुनावों में भाजपा के उम्मीदवारों की अनदेखी करें और भाजपा के मुश्किल से आठ उम्मीदवार जीते- भाजपा के साथ मतदाताओं का यह व्यवहार अत्यंत चकित करने वाला है।

वैसे देखें तो केजरीवाला की पार्टी इकलौते खंबे का तम्बू ही है। अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह केजरीवाल ने भी अपनी पार्टी में किसी का कद बढ़ने नहीं दिया। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव जैसे महत्वाकांक्षी नेताओं को उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया और कुमार विश्वास को पूरी तरह निष्प्रभ बना दिया। पिछले पांच वर्षों में इस पार्टी का एक भी अधिवेशन नहीं हुआ। केजरीवाल का पक्ष यह है कि उन्होंने पांच वर्षों में दिल्ली में सरकारी स्कूलों, शिक्षा व्यवस्था, पानी की समस्या, नागरिकों का जीवन स्तर सुधारने के लिए जो चीजें जरूरी हैं उनमें क्रांतिकारी परिवर्तन कराए। दिल्ली की जनता में अपनी छवि मजबूत बनाने पर केजरीवाल ने खूब ध्यान दिया। इसीलिए अगले पांच वर्षों में दिल्ली का विकास होना हो तो उनकी निशानी झाडू को ही वोट देने का उन्होंने दिल्ली वासियों को सकारात्मक आवाहन किया।

दिल्ली के मतदाताओं ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में मतदान किया हो तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनावों में ‘आप’ याने केजरीवाल की पार्टी की दारुण पराजय हुई थी। इससे सीख लेकर उन्होंने दिल्ली चुनावों की रणनीति बनाई। इसमें उन्होंने मोदी या राष्ट्रीय मुद्दों पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की। पूरा ध्यान विधान सभा चुनावों पर ही केंद्रित किया। दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर गौर करते हुए दिल्ली वालों को कुछ मुफ्त रियायतें देने की झड़ी लगा दी। इसी तरह दिल्ली वासियों के जीवन स्तर में सुधार के लिए भी कदम उठाने शुरू कर दिए। केजरीवाल की यह रणनीति कामयाब रही।

दिल्ली विधान सभा चुनावों में विजय प्राप्त करना भाजपा के लिए बेहद महत्व रखता था, क्योंकि 1998 के बाद दिल्ली की सत्ता पर भाजपा कभी काबिज नहीं हुई। इसी तरह दिल्ली की राजनीति पर पकड़ रखने वाले मदनलाल खुराणा, सुषमा स्वराज, साहब सिंह वर्मा, अरुण जेटली जैसे दिग्गजों और दिल्ली के राजनीति की नब्ज पहचानने वाले नेतृत्व की बड़े पैमाने पर कमी बड़े पैमाने पर महसूस की गई। इस चुनाव के आरंभ से ही भाजपा ने दिल्ली के विकास के मुद्दों से भटकना शुरू किया। असल में भाजपा को दिल्ली के विकास कार्यों की ओर अरविंद केजरीवाल सरकार की अनदेखी पर प्रचार की तोप केंद्रित करनी थी। भाजपा का प्रचार सीएए, जामिया मिलिया, जेएनयू और बाद में शाहीनबाग जैसे अ-स्थानीय परंतु राष्ट्रीय मुद्दों में उलझता चला गया। आम आदमी पार्टी के पास केजरीवाल के अलावा और कोई नेता नहीं था। भाजपा के पास नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा जैसे राष्ट्रीय दिग्गज नेता थे। इसके साथ ही देश के ढाई सौ सांसदों की फौज दिल्ली में प्रचार के दौरान दिन-रात एक कर रही थी। फिर भी एक बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। इस पराजय से भाजपा को आत्मपरीक्षण करना चाहिए। भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाले संकेत क्या इस चुनाव से मिल रहे हैं? इस पर भी विचार करना चाहिए।

केजरीवाल जैसे धुरंधर मुख्यमंत्री के सामने भाजपा मुख्यमंत्री का कोई चेहरा पेश नहीं कर सकी। इसी तरह भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने स्थानीय नेतृत्व को सिर ऊंचा करने नहीं दिया। हर निर्णय के अधिकार केंद्रीय नेतृत्व ने अपने पास रखे। इस तरह की चर्चा दिल्ली के जानकारों में है। भाजपा जिन राज्यों में पराभूत हुई वहां भी लगभग यही स्थिति थी। इसके परिणाम लगातार सामने आ रहे हैं, फिर भी भाजपा सुध नहीं ले रही है।

स्थानीय मुद्दों को दरकिनार किए जाने के कारण ही भाजपा दिल्ली समेत अन्य राज्यों में भी पराभूत होती गई। दिल्ली के चुनावों में कांग्रेस कोई सीट नहीं जीत सकी। इस पर हमें संतुष्ट होने की आवश्यकता नहीं है। इस बारे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सोचेंगे। पिछले दो वर्षों में भाजपा में जो बड़ी दरार पड़ गई है, इससे भाजपा को काफी नुकसान पहुंचा है। उसे किस तरह पाटा जाए इस पर गंभीर चिंतन जरूरी लगता है।

चुनावों के दौरान रामजन्मभूमि न्यास के गठन, कश्मीर में वहां के नेताओं की गिरफ्तारी, शाहीनबाग जैसा मुद्दा, सीएए, एनआरसी जैसे राष्ट्रीय मुद्दों और देश के बारे में राष्ट्रद्रोही उद्गार व्यक्त करने वाले मुस्लिम युवकों के कारनामे इतने विषय बढ़ते चले जाने पर भी मतदाताओं ने भाजपा से किनारा क्यों किया? भाजपा को इन बातों को समझना होगा कि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ते समय राष्ट्रीय मुद्दों, धार्मिक मुद्दों पर जनता ध्यान नहीं देती, क्या दिल्ली की जनता ने इस बार यह संकेत दिया है? गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों की ओर ध्यान देने का समय क्या चूक गया है?

झारखण्ड विधान सभा चुनावों में भाजपा के पराजित होने से भाजपा के हाथ से छितर गए राज्यों की संख्या अब पांच हो गई है। 2018 में भाजपा ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ राज्य गंवाए। 2019 में भाजपा ने महाराष्ट्र और झारखण्ड ये दो राज्य गंवाए। अब दिल्ली में भी भाजपा के हाथ निराशा लगी है। इस पृष्ठभूमि में शीघ्र ही बिहार में होने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा को किस तरह सफलता मिलेगी, इस ओर सब का ध्यान लगा हुआ है। दिल्ली विधान सभा में भाजपा को कितनी सफलता मिलेगी इस पर अगले चुनावों के गणित निर्भर थे। 2021 में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी में चुनावी दंगल है। पिछले दो वर्षों में भाजपा के हाथ लगी निरंतर निराशा से आने वाले पांच राज्यों के चुनाव भाजपा के लिए सत्वपरीक्षा के ही होंगे।

बिहार में अक्टूबर या नवम्बर में विधान सभा चुनाव हो सकते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा, संयुक्त जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी के मिलेजुले एनडीए ने बिहार में लोकसभा की 40 सीटों में से 39 पर विजय पाई थी। राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के महामोर्चे का सफाया हो गया था। लेकिन चित्र अब बदल चुका है। बिहार के पड़ोसी झारखण्ड राज्य में हाल में हुए विधान सभा चुनावों में भाजपा पराजित हुई है। अब भाजपा के कट्टर विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व महामोर्चे का आत्मविश्वास बढ़ चुका है। इस पराजय से भाजपा बैकफुट पर आ गई है। इसलिए भाजपा के मित्र दल संयुक्त जनता दल की भाषा भी बदल गई है। दिल्ली चुनावों के नतीजों का परिणाम भाजपा को मित्र दलों में भी भुगतना पड़ सकता है। सीटों के बंटवारे पर तथा अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर मित्र दल भाजपा के साथ कठोर सौदेबाजी कर सकते हैं। इसी तरह दिल्ली के चुनावों में एक बात साफ उजागर हुई है कि जन आंदोलन के जरिए चुनावी राजनीति में सफलता से हस्तक्षेप किया जा सकता है। पिछले दो माह से दिल्ली के शाहीनबाग में चला आंदोलन इसकी मिसाल है। कुल मिलाकर दिल्ली चुनावों के दूरगामी परिणाम होंगे। इस पराजय से भाजपा के लिए बहुत कुछ सीखने लायक है। भाजपा को भविष्य में नई अपेक्षाओं, नए जोश व नई रणनीति के साथ जनता के समक्ष आना होगा। जनसंघ से भाजपा और अब सत्ता तक भाजपा की यात्रा में उसे हमेशा संघर्ष झेलना पड़ा है। इस संघर्ष से रास्ता बनाते हुए भाजपा ने यह शिखर पाया है। अतः आगामी समय में भी भाजपा उत्कर्ष का शिखर पादाक्रांत करने में सफल होगी, ऐसा लगता है। ऐसी स्थिति को बयान करते हुए किसी शायर ने क्या खूब कहा है-

रबाबे जिन्दगी में जितने टूटे तार होते हैं

उन्हीं को जोड़कर नग्में तैयार होते हैं।

This Post Has One Comment

  1. Balesh tewari

    शायद आप की बात कुछ हद तक ठीक हो लेकिन दिल्ली या देश किसी भी कोने में अगर भाजपा को हार मिली तो यह उसकी हार पूर्ण रूप से सहयोगी को छोड़ देना तथा राज्य केमुद्दों को राष्ट्र के मुद्दों से जोड़ देना, कभी कभी अपने छोटो को भी आगे करना चाहिए जैसे महाराष्ट्र में सेना को पूर्ण रूप से बाहर से समर्थन देते और विरोधियो को परास्त करते ,सर्कार में नहीं रहते तो जनता को इनपर विस्वास बढ़ता और विरोधियो को झाड़ भी सकते, नहीं 60 40 का फार्मूला बना देते, दिल्ली में तो फ्री वालो के चक्कर में हर गए क्योकि वहाँ पर एक समुदाय को केजरीवाल ने तुष्टिकरण की राजनीती करके अपने साथ कर लिया, अमित शाह जी ने यह ध्यान नहीं दिया की तुष्टिकरण एवं कुछ लालची लोग क्या क्या कर सकते है, लेकिन इन सब के बाद भी यह मतलब नहीं की भाजपा की हार हो गयी, शायद यह सही कहा गया है कि “हरि इच्छा बलवान,

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