भगवान महावीर ने तो जीवन जीने की कला सिखाई -गिरीश भाई शाह

कोरोना वायरस से आज सभी मास्क लगाए घूम रहे हैं, लेकिन जैनों में यह परम्परा तो हजारों वर्षों से है। सारी सृष्टि को जियो और जीने दो का संदेश उन्होंने दिया, जिसकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। समस्त महाजन के श्री गिरीश भाई शाह ने महावीर जयंती के उपलक्ष्य में एक विशेष साक्षात्कार में भगवान महावीर के सिद्धांतों व समस्त महाजन के उसके अनुरूप कार्यों का भी विवरण दिया। प्रस्तुत है उसके अंश-

 

आज भगवान महावीर जी की जयंती है। उनका तत्व ज्ञान क्या था?

भगवान महावीर की जयंती को हम जन्म कल्याणक कहते हैं। जन्म, जयंती जैसे शब्द हमारी परंपरा में प्रयोग नहीं किए जाते हैं। भगवान का जन्म पूरे विश्व के कल्याण के लिए हुआ है। पहला कल्याणक माता की कोख में अवतरण हुआ इसलिए इसे च्यवन कल्याणक कहते हैं। जब भगवान दीक्षा लेते हैं, सब कुछ त्याग कर के उसे हम तीसरा कल्याणक कहते हैं। चौथा है जब उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान होता है उसे केवल ज्ञान कल्याणक कहते हैं और पांचवा है जब भगवान का निर्वाण होता है उसे निर्वाण या मोक्ष कल्याणक कहते हैं। इस प्रकार भगवान के जीवन में ऐसे पञ्च कल्याणक होते हैं।

भगवान महावीर के जन्म कल्याणक का जो अवसर आ रहा है, उस पर आपने सही प्रश्न पूछा है कि भगवान का सत्व या तत्व क्या है। जैन धर्म परंपरा यह अनादी काल से चली आ रही है। इस परम्परा में परमात्मा आदेश्वर भगवान जो हमारे चौबीस तीर्थंकर में से प्रथम थे, उन्होंने क्षेत्र काल के प्रथम धर्म की स्थापना की। हम उसे शासन स्थापना कहते हैं, जैसे महाराष्ट्र शासन, गुजरात शासन, केंद्र शासन, वैसे ही शासन का मतलब व्यवस्था। व्यवस्था का स्थापन भगवान महावीर ने किया। अक्षय तृतीया के सात दिन के बाद वैशाख शुक्ल ग्यारस को इस समय के 21 हजार साल की शासन की स्थापना भगवान महावीर ने की।

कोई चीज उत्पन्न होती है, स्थिर होती है और फिर नाश होती है। यह सनातन सत्य है। सनातन सत्य के आधार पर परमात्मा फिर जो केवल ज्ञान है, प्रकाश होता है, उसके माध्यम से प्रवचन करते हैं और प्रवचन के माध्यम से वह पूरे विश्व को, प्रजा को, समाज को जीवन जीने की कला सिखाते हैं। मतलब कम से कम पाप किए जीवन कैसे जिया जाए, उसकी सारी कला ये भगवान सिखाते हैं। मैं यह मानता हूं कि जैन धर्म जीवन जीने की पद्धति है।

जीवन जीने की कला भगवान महावीर ने कैसे सिखाई?

आजकल लोग मजाक – मजाक में कहते हैं कि क्या है ये, यह नहीं खाना, वह नहीं खाना, रात को नहीं खाना, कंदमूल नहीं खाना, ये नहीं करना, वो नहीं करना लेकिन अब कोरोना वायरस से सब संकट में आ गए हैं तब उन्हें समझ में आ रहा है कि नियमों का पालन करना एवं परहेज करना कितना जरूरी है। अब लोग हमारी सनातन परम्परा को स्वीकार कर रहे हैं और हाथ मिलाने के बजाए नमस्ते कह कर अभिवादन कर रहे है। हमारे यहां तो बहुत पहले से ही यह परम्परा अस्तित्व में है। हमें सर्वप्रथम प्रणाम करना सिखाया गया था। आज सभी डर कर मास्क लगा रहे हैं। हम तो पहले से ही मास्क लगाते आ रहे हैं। हम मंदिर में भी भगवान की पूजा के लिए जाते हैं तो मास्क  अष्टपड़ /रुमाल लगा कर जाते हैं। भगवान तो प्रतिमा रूप में है बावजूद इसके मुंह और नाक ढंके बिना भगवान के पूजा की मनाही है। इतना ही नहीं यदि किसी से बात भी करोगे तो उस समय अष्टकोण रुमाल(मुडपत्ती) मुंह पर रख कर ही बात करोगे। हमारी परम्परा में स्थानकवासी जो परम्परा है वह तो मुंह पर कपड़े बांध कर ही रखते हैं। कोरोना वायरस के कारण दुनिया भर में मास्क का बिजनेस बढ़ गया है लेकिन हमारे यहां तो यह पहले से ही है। हमारे मुंह या खांसी – छिंक से निकलने वाला वायरस किसी अन्य तक न पहुंचे, किसी को कोई नुकसान न पहुंचाए, इसका भी ख्याल रखने की बात भगवान महावीर ने बताई थी। महावीर ने यही संदेश दिया था कि दूसरों को तकलीफ न दो, ऐसा जीवन जियो, ‘जियो और जीने दो’। भगवान महावीर से बड़ा कोई पर्यावरण प्रेमी कोई हो ही नहीं सकता। उन्होंने सभी जीव मात्र के कल्याण की बात कही। आहार शास्त्र से लेकर जीवनशैली कैसी होनी चाहिए, इस बारे में भगवान महावीर ने सम्पूर्ण मार्गदर्शन दिया है। आहार मीमांसा नामक ग्रंथ में बहुत ही विस्तारपूर्वक इसका वर्णन किया गया है। इसके अलावा हमारा व्यवहार माता – पिता के साथ, बहन भाई, मित्र, पडोसी आदि के साथ कैसा होना चाहिए, इस संबंध में भी बताया गया है।

सामाजिक बंधुत्व को लेकर भगवान महावीर ने क्या संदेश दिया है?

भगवान महावीर ने बहुत ही सुंदर तरीके से सामाजिक बंधुत्व के लिए अपनी भावना एवं विचार प्रस्तुत किए हैं। विश्व के सम्पूर्ण जीव हमारा कुटुंब है। सभी के साथ हमें मैत्री भाव रखना चाहिए। केवल अपने परिवार के साथ ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को अपना मानने की बात भगवान महावीर ने हमें सिखाई है। भगवान ने कहा है कि किसी भी जीव के प्रति मन में किसी प्रकार की दुर्भावना न रखे। किसी भी प्राणी के प्रति आपका मनमुटाव हुआ हो तो ‘मिच्छामी दुक्कडम’ कह कर हमें उनसे क्षमा मांगनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी भरे सदन में ‘मिच्छामी दुक्कडम’ कह कर क्षमा याचना की है और इस प्रकार उन्होंने अपनी भावनाएं सभी के बीच जाहिर की है। यदि रात के समय भी हमसे कोई गलती हो जाए या किसी के प्रति मन में ख्याल भी आ जाए तो सुबह उठ कर ‘मिच्छामी दुक्कडम’ कह कर हम माफ़ी मांगते हैं और पश्चाताप करते हैं। जीव मात्र के प्रति करुणा का भाव रखने का विश्व संदेश सामाजिक बंधुत्व के तहत भगवान महावीर ने दिया है।

समस्त महाजन संस्था भगवान महावीर के किन आदर्शों पर चलते हुए ग्राम विकास के सपने को साकार करने के लिए कार्यरत है? भगवान महावीर ने ग्राम विकास के लिए क्या उपदेश दिए हैं?

मैंने पहले ही कहा था कि भगवान महावीर सबसे बड़े पर्यावरण प्रेमी थे, वह पेड़ के पत्ते तक नहीं तोड़ते थे, वे पेड के पत्ते में भी जीव है ऐसा सोचते थे। क्योंकि उन्हें  परमात्मा को जो सम्पूर्ण सत्य प्रकाश ज्ञान हुआ वह वृक्ष के नीचे ही हुआ और वह भी नदी के किनारे हुआ। नदी और वृक्ष के सबसे समीप भगवान रहते हैं, यूं कह सकते हैं कि उनसे जुड़े हुए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो बड़े – बड़े राजभवनों में भी परमात्मा का सत्य ज्ञान प्रकाशित होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ है परमात्मा नदी – वृक्ष प्रकृति से गहरे जुड़े हुए हैं। यह भी कह सकते हैं कि परमात्मा से संपर्क स्थापित करने का एंटीना तो यही है। भारत एक समय सोने की चिड़िया कहा जाता था, भारत सोने की चिड़िया तभी रहेगी जब हम पशु कल्याण, वृक्ष कल्याण और जल कल्याण इन तीनों को संरक्षित एवं संवर्धित कर पाएंगे। ग्राम विकास के संदर्भ में भगवान महावीर ने यह सारी बातों का उपदेश दिया है और समस्त महाजन संस्था भगवान के विचारों की पूर्ति के लिए ही ग्राम विकास के लिए पूरी तन्मयता से जुटी हुई है।

वर्तमान समय में भगवान महावीर के विचार कितने प्रासंगिक हैं?

भगवान महावीर के विचार कालजयी हैं, वे सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। मैं मानता हूं कि आज भी वह 100 प्रतिशत प्रासंगिक हैं। जीवन जीने का जो संदेश भगवान महावीर ने संसार को दिया है यदि उस तरह से अखिल विश्व जीवन जीना शुरू कर दे तो शांति, सदाचार, सौहार्द, संपन्नता और चारों ओर आनंद ही आनंद हो जाएगा। कोई किसी का दुश्मन नहीं रहेगा। विश्व में कहीं भी कभी युद्ध नहीं होगा। सभी मिलजुलकर रहेंगे। दुनिया आज पैसों के पीछे भाग रही है। संवेदनहीन हो चले हैं, तनाव भर जीवन लोग जी रहे हैं। भगवान महावीर ने उस समय ही कह दिया था कि परिग्रही बनो अर्थात एक मर्यादा में रह कर ही पुण्य व पुरुषार्थ के बल पर पर्याप्त मात्रा में जो धन आपको मिले, उससे ही ख़ुशी ख़ुशी अपने जीवन का निर्वाह करो। इससे आप सदा आनंदित भी रहोगे और तनाव भी नहीं होगा। भगवान महावीर ने विषयुक्त आहार का सेवन करने की मनाही की है। ऑर्गेनिक खेती का ही अन्न सेवन करने के योग्य है। सर्वप्रथम अहिंसा का संदेश उन्होंने ही दिया। किसी जीव के साथ हिंसा मत करो। ऐसी अनेकानेक सुंदर व्यवस्थाएं उन्होंने बताईं। इसलिए भगवान महावीर के जन्म कल्याणक के शुभ अवसर पर मेरा यही संदेश है कि स्वस्थ, निरोगी, शांतिपूर्ण सहस्तित्व के साथ प्रेमपूर्वक जीवन जीना चाहते हो तो भगवान महावीर के बताए रास्तों पर चलो। इससे सभी का भला होगा। भगवान महावीर के विचारों को अमल में लाने पर ही जगत का कल्याण निहित है।

भगवान महावीर के कौन से उपदेशों को आत्मसात कर समस्त महाजन संस्था समाज कार्य में संलग्न है?

मेरे गुरुदेव परम तारक पन्यास चंद्रशेखर विजय महाराज की प्रेरणा और आशीर्वाद से वर्ष 1995 – 96 से मैंने समाज कार्य की शुरुआत की और इसके बाद वर्ष 2002 में समस्त महाजन संस्था की स्थापना की। हमने केवल जैन समाज के नाम से इस ट्रस्ट की शुरुआत नहीं की क्योंकि हमारे भगवान तो सबके हैं। इसलिए सभी के लिए हमने समस्त महाजन अर्थात अच्छे लोगों का समूह, इस ‘समस्त महाजन संस्था’ नाम से ट्रस्ट की शुरुआत की। आज विश्व में सज्जनों की संख्या बढे तो दुर्जनों का प्रभाव कम हो जाएगा। सज्जनों की निष्क्रियता से ही सबसे अधिक नुकसान हो रहा है। यदि सज्जन शक्ति सक्रिय हो जाए तो विश्व का कल्याण हो जाएगा। हमने भारत या मुंबई महाजन नाम नहीं दिया बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की पवित्र भावना के साथ समस्त महाजन संस्था नाम दिया। विश्व के सभी अच्छे लोग एक अच्छी विचारधारा के साथ जुड़े। इस भावना के साथ भगवान महावीर का संदेश है ‘सभी जीव करुं रती’। अर्थात सभी जीवों को जीने का अधिकार है। भगवान महावीर के उपदेशों के अनुरूप हमने सभी प्राणियों एवं पञ्च महाभूतों जिनमें पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि तथा प्रकृति यानि पर्यावरण की रक्षा, सुरक्षा, संवर्धन को अपना ध्येय मानकर समाज कार्य कर रहे हैं; ताकि परमेश्वर प्रदत्त इस सृष्टि को और अधिक सुंदर बनाया जा सके। मेरा सभी अच्छे लोगों से यह आग्रह है कि वह एकजुट होकर अपनी पूरी ताकत से इस ईश्वरी कार्य में सम्मिलित हो जाए और दुष्ट तामसिक पाशविक शक्तियों को परास्त करें। तभी यह संसार फिर से मंगल ग्राम बन पाएगा और यह दायित्व अच्छे सज्जन लोगों पर ही है।

समस्त महाजन संस्था द्वारा भगवान महावीर के विचार आपने जन – जन में कैसे पहुंचाए?

जैसे महावीर जी ने जल तत्व की बात की तो हमने गांव – गांव में तालाब, कुएं, नदी – नाले आदि की पुन: व्यवस्था कर गांववासियों को पानी के मामले में आत्म निर्भर बनाया। हमने यह अभियान चलाया कि गांव में प्रत्येक व्यक्ति 16 वृक्ष लगाए। मान लो किसी गांव में 1000 लोग रहते हैं और वे सभी 16 – 16 वृक्ष लगाते हैं तो कुल 16 हजार वृक्ष गांव में लग जाएंगे। वह गांव नंदनवन बन जाएगा। उसे किसी पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। हर गांव, हर व्यक्ति स्वावलंबी बने। पैसे कमाने के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। पहले हर गांव में पशु पालन और कृषि व्यवस्था थी। उससे उनकी आमदनी होती थी। दूध, दही, घी, मक्कखन, एवं अनाज आदि के व्यापार से ग्रामीण लोग समृद्ध थे। हम फिर से पुरानी ग्रामीण व्यवस्था को जिवंत करने के लिए काम कर रहे हैं और भगवान महावीर के विचारों को अपने सामाजिक कार्यों के माध्यम से जन – जन तक पहुंचा रहे हैं।

बाढ़, भूकंप, अकाल आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय आपकी संस्था समस्त महाजन देश – विदेश में भी राहत कार्यों में सहायता प्रदान करती है, इन सेवा कार्यों के पीछे आपकी क्या भावना होती है?

देखिए, ऐसा है कि भगवान ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संकट के समय पीड़ितों की सेवा – सहायता करनी चाहिए। कभी भी हमें कोई पीड़ित व्यक्ति मिले तो हमसे जो भी यथायोग्य सेवा हो सकती है, वह करनी चाहिए। प्राकृतिक आपदा की बात करे तो उस समय पशु – पक्षी और मानव आदि सभी संकट में पड़ जाते हैं। उनको बचाना तो सर्वश्रेष्ठ धर्म है। हमने कश्मीर में बाढ़ आने पर वहां भी काम किया। तब हमने यह नहीं सोचा कि वहां कौन रहते हैं। वह भारत से जुड़ना नहीं चाहते तो उनकी मदद क्यों करे। हमने तब यह सोचा कि वह कोई भी हो, वह मानव है और प्राकृतिक आपदा के समय हमें उसकी सहायता करनी चाहिए, यही हमारा धर्म हमें सिखाता है। इसी भावना के साथ हमने केरल से लेकर नेपाल आदि सभी जगहों पर राहत कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और पीड़ितों को यथासंभव सहायता प्रदान की। भगवान महावीर ने भी हमें यही संदेश दिया है कि संकट के समय पीड़ितों लोगों की मदद व सेवा करो। हम उनकी ही प्रेरणा से यह सारे कार्य कर रहे हैं।

भगवान महावीर जयंती के उपलक्ष्य में हिंदी विवेक के पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहते हैं?

हिंदी विवेक के सभी सुधि पाठकों को मैं महाजन ही मानता हूं। जो हिंदी विवेक पत्रिका पढ़ कर विवेकशील बनते हैं तो वह महाजन ही है। महाजन परम्परा से जुड़ कर अपने – अपने क्षेत्र में अच्छे कार्य करें। केवल बातों से नहीं अपितु कार्यों से करें। हमें अब प्रैक्टिकल बनना पड़ेगा। ग्राउंड लेवल पर हम छोटे – छोटे कार्य कर सकते हैं। जैसे 16 – 16 वृक्ष लगाकर भी हम अच्छे कार्यों से जुड़ सकते हैं। हम छोटा सा गड्ढा खोद कर पानी रिजर्व कर सकते हैं। हम गोचर, गोवंश की सेवा कर सकते हैं। किसी दीनहीन जरूरतमंद की सहायता कर सकते हैं। ये सब अच्छे कार्य हैं। सभी को करने चाहिए। ये सब कार्य कर के हम अपने जीवन में भी कुछ सुधार ला सकते हैं। हम अपने आहार में भी सुधार ला सकते हैं। हम क्यों होटल का खाना खाते हैं? नहीं खाना चाहिए। हम क्यों गंदा खाना खाते हैं? नहीं खाना चाहिए। हमें सर्वप्रथम अपना कल्याण स्वयं करना चाहिए। हम पहले अपनी व्यवस्था सुधारें। इसके बाद पर का कल्याण करें। फिर अपने आसपास के लोगों का कल्याण करें। अगर आप बहुत ताकतवर बन जाए तो पूरे देश सहित विश्व कल्याण की भावना लेकर व्यापक काम करें। इसी से सभी का कल्याण होगा और भगवान महावीर के विचारों को हम साकार कर पाएंगे।

 

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