आंबेडकरवादी कौन?

 

आज सम्पूर्ण विश्व में आंबेडकरवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार हो रहा है, उनके विचार वर्तमान विश्व की समस्याओं का समाधान करने का साधन बन गये हैं इसलिए विश्व के बड़े से बड़ा राजनेता जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति  बराक ओबामा, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला एवं बुद्धिजीवी – अर्थशास्त्र में नोवल पुरुस्कार प्राप्त अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने भी डॉ आंबेडकर को अपना आदर्श माना हैं, क्योंकि सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के विचारों को डॉ. आंबेडकर ने तार्किक, वैज्ञानिक एवं मानवीयता के आधार पर सटीक रूप से प्रस्तुत किया हैI

आंबेडकरवाद वह विचारधारा है जो दुनिया में मानवता, आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास, त्याग, लोकतांत्रिक सिद्धांतों और भ्रातृत्व को स्थापित करना चाहती है तथा दुनिया में  किसी भी प्रकार के अन्याय के विरुद्ध जैसे नस्ल, रंग, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता इत्यादि  के भेदभाव को नहीं मानती है तथा नैतिकता, तर्क, अहिंसात्मक एवं वैज्ञानिक आधार पर तथ्यों को प्रस्तुत करना चाहता हैI अध्ययन पद्दती में यह पाया गया है ऐतिहासिक, क़ानूनी, संवैधानिक, आर्थिक, समाजशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक आधार पर अपने अध्ययन को प्रस्तुत करते हैंI

आंबेडकरवाद दुनिया की सबसे प्रगतिशील और विकसित विचारधारा का नाम हैI दुनिया की ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान आंबेडकरवाद में न मिलता हो, तब यह स्वाभाविक हो जाता है कि आंबेडकरवादी होना अच्छी बात है|

पिछले 6 -7 वर्षों से इलेक्ट्रोनिक मिडिया, प्रिंट मीडिया, साहित्य एवं राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय  संगोष्ठियों के द्वारा भारतीय समाज में डॉ. आंबेडकर के विचारों का दायरा बहुत बढ़ा है और व्यापक भी हुआ है डॉ आंबेडकर की छवि केवल दलितों के मसीहा के रूप में सीमित थी लेकिन अब यह एक राष्ट्र-पुरुष, आधुनिक भारत का निर्माता, एक कुशल अर्थशास्त्री, संविधान-निर्माता, कानून-विद; समाजशास्त्री, शिक्षा-विद, दलितों के मसीहा, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ इत्यादि रूपों में डॉ. आंबेडकर के कार्यों पर प्रकाश डाला गया है जिससे आज भारतीय समाज में डॉ. आंबेडकर की पहुंच बढ़ी है और उनके अनुसरण करने वाले भी बड़ रहै हैं, यह एक अच्छी बात हो सकती है मगर साथ ही यह सवाल उठता है की ये सब लोग क्या सच में अंबेडकर के विचारों को मानते हैं या नहीं? आज देश में जितने भी सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, दलित, पिछड़े, छात्र, अल्पसंख्यक  संगठनों के लोग एवं अन्य राजनीतिक दलों  के नेताओं द्वारा आज जो सामाजिक, आर्थिक व् राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन किए जा रहै हैं, ये अपने आप को आंबेडकरवादी कह रहै हैं यह प्रवृति पिछले कुछ वर्षों से बढ़ रही हैI इसके क्या कारण हो सकते है यह एक अध्ययन करने का विषय हैंI

लेकिन इन आंबेडकरवादी लोगों द्वारा क्या वास्तव में डॉ. आंबेडकर के विचारो को सही से पढ़ा है? या नहीं? क्या वे डॉ. आंबेडकर के विचारो को समझते हैं? या फिर वे भ्रमित हैं? या फिर समाज को भ्रमित करना चाहते हैं? उनके विचारों का मूल उद्देश्य क्या है? क्या वे ये जानते हैं कि वे डॉ.आंबेडकर के विचारो को आगे बढ़ा रहै हैं? या फिर अपने कुछ स्वार्थ के कारण डॉ. आंबेडकर के सिद्धांतों एवं विचारों के साथ तालमेल कर रहै हैं और समाज को भ्रमित करने की चेष्टा तो नहीं कर रहै हैं?

आंदोलन करने के लिए अपनाये गये तरीकों में डॉ. आंबेडकर हमेशा से संविधानिक एवं  लोकतान्त्रिक तरीके में विश्वास करते थे, लेकिन ये नए आंबेडकरवादी हिंसा पर उतर आये हैं कानून व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहै हैं, डॉ. आंबेडकर ने कभी भी इस तरह के आंदोलन करने के लिए लोगों से आग्रह नहीं किया। मगर इसके साथ सवाल यह भी सामने खड़ा होता है कि जब देश की संस्थान लोगों को न्याय देने में विफल हो रही हो तो फिर क्या किया जाए, और जिसका सबसे अधिक डर आंबेडकर के दो वक्तव्यों में झलकता है जब वह कहते हैं कि कोई भी संविधान बुरा नहीं होता मगर यह उन लोगों पर ही निर्भर करता है कि उन लोगों की नियत क्या है, और दूसरा यह कि उन्हें अपने समाज को लेकर डर था कि पढे-लिखे लोग एक संगठन में होंगे या नहीं, ओर अपने-अपने समाज के लोगों के संसद में आवाज़ बनेंगे या नहीं।

क्या डॉ. आंबेडकर का भारत की या राष्ट्र की एकता और अखंडता में विश्वास नहीं था अर्थात उनका राष्ट्र की एकता और अखंडता में अटूट विश्वास था लेकिन ये नए आंबेडकरवादी क्या इसमें विश्वास करते हैं कि नहीं? डॉ. आंबेडकर ने कहा था की में प्रथम और अंत में भारतीय हूँ, इससे उनका राष्ट्र प्रेम झलकता हैI

क्या डॉ. आंबेडकर कभी अवसरवादी गुट या गठबंधन बनाना चाहते थे? नहीं. लेकिन आज के नए आंबेडकरवादी सभी विचारों को मिलाकर एक अवसरवादी राजनीति करना चाहते हैंI अगर यह सब हो भी रहा है तो आखिर यह आंबेडकरवादी लोग ऐसा क्यों कर रहै हैं? यह भी एक शोध का विषय हो सकता हैं। इस तरह का प्रयोग जोगेन्द्र नाथ मंडल ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर के किया था लेकिन उस गठबंधन का क्या हुआ? ये जोगेन्द्र नाथ के पाकिस्तान के मंत्रिमंडल से लिखे  त्याग पत्र से साफ जाहिर हो जाता हैI

क्या डॉ. आंबेडकर कभी ब्राह्मण के खिलाफ थे? कभी नहीं., लेकिन ये नए आंबेडकरवादी ब्राह्मण के खिलाफ आंदोलन की बात करते हैI लेकिन आज कुछ आंबेडकरवादी कहते है कि ब्राह्मण को वोट न देकर किसी को भी वोट दो ये अपील कहा तक उचित है? जब ब्राह्मणवाद की बात की जाए तो हम सभी के सभी उन्हीं मापदंडों को मानते हैं जिनके ख़िलाफ़ जीवन-भर आंबेडकर लड़ते रहे थे।

डॉ. आंबेडकर की लड़ाई जाति व्यवस्था के खिलाफ थी वर्ण व्यवस्था के खिलाफ नहीं, वे चाहते थे इंसान इस देश में रहें जातियाँ न रहेंI वर्ण व्यवस्था को उन्होंने अपनी जगह सही माना क्योंकि वर्ण व्यवस्था योग्यता के आधार पर थी जबकि जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर बनी जिसने लोगों की स्वतन्त्रता और अधिकारों का हनन कियाI लेकिन आज के आंबेडकरवादी केवल अपनी-अपनी जातियों के हितों के लिए कार्य कर रहे हैं| वे जाति व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए आंदोलन नहीं कर रहे है, और जहाँ तक इस विषय को समझने की कोशिश की जाए तो सभी लोग अपनी-अपनी जातियों को मज़बूती प्रदान कर रहें हैं जो कि आंबेडकर के विचारों से सहमति नहीं मिलती है।

आज दलित चेतना का फैलाव आंबेडकर से बुद्ध तक तो हो गया लेकिन बुद्ध और आंबेडकर के सिद्धांतों से कोसो दूर चला गया हैI बुद्ध ने कहा था “अप्पो दीपो भव;” ‘अपना नेत्रत्व स्वयं करो’, लेकिन आज के दलितों के आंदोलन का नेतृत्व अन्य संगठनों व जातियों के हाथों जा रहा है। यहाँ पर दो बातों पर चर्चा करना महत्वपूर्ण हैं की जैसे बुद्ध ने भगवान की धारणा को ख़त्म किया और उसे नहीं मना मगर उनके अनुयायियों ने बुद्ध को भगवान बना दिया और उसी प्रकार से आंबेडकर ने मूर्ति पूजा और राजनीतिक अंध-भक्ति में न विश्वास करने को बोला था, मगर आज कल के आंबेडकरवादी, आंबेडकर को भगवान बनाने की कोशिश और अपने दलित नेताओं को अंध-भक्ति की ओर समाज को धकेल रहें हैं, जो कि एक गम्भीर सोचनीय विषय है।

ये आंबेडकरवादी तब शांत क्यों थे जब 20 मई 2007 को मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश में  SC/ST एक्ट को कमजोर किया थाI उस समय दलितों के हितों के पैरोकार कहाँ थे उन्होंने मायावती सरकार के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठायी? क्योंकि वे उन आंबेडकरवादियों की शुभचिंतक या समर्थक थी जो दलितों के आंदोलनों को चलाते हैI

क्या आंबेडकरवादियों ने आंबेडकर के विचारों को वास्तव में पढ़ा है? क्या उनको आधार मानकर वे अपना साहित्य सृजन कर रहे है? इन आंबेडकरवादियों को डॉ. आंबेडकर के मूल कार्यों के बारे में पता है कि नहीं ये में नहीं जानता|

क्या डॉ. आंबेडकर धर्म, आदर्शों, नैतिक मूल्यों व परम्पराओं के खिलाफ थे, नहीं., लेकिन ये नये आंबेडकरवादी इन सिद्धांतों में कितना विश्वास करते है ये सभी जानते हैI

डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि हमें पुराने गढ़े हुए मुद्दों पर नहीं जाना चाहिए (बुराइयों) इसके लिए हमें स्मृतियों, विस्मृतियों का सहारा लेना चाहिए हमें पुरानी बुराइयों को भूलना चाहिए उनके आधार पर समाज में वैमनस्य पैदा नहीं करना चाहिएI हमें किसी जाति या वर्ग को नहीं कोसना चाहिए। मगर आंबेडकर ने यह भी बताया था कि जो कोम अपना इतिहास भूल जाती है वह कभी भी उन्नति नहीं कर पाती, तो फिर आंबेडकर ने किस इतिहास की ओर इशारा किया था जो एक अध्ययनकर्ता  के लिया रोचक विषय होगा।

लेकिन समसामयिक समय में आंबेडकरवादी बनना एक फेशन बन गया है, न कोई विचारधारा न कोई सिद्धान्त लेकिन डॉ. आंबेडकर के होर्डिंग, बेनर, पोस्टर इत्यादि लगाकर आंदोलन किए जा रहे हैं ये लोग डॉ. आंबेडकर के सिद्धांतों और विचारों का दुरुपयोग कर रहे हैंI

आज के आंबेडकरवादियों ने कुछ आंदोलन किए ये नए आंबेडकरवादी कुछ नए चेहरे है जैसे कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, हार्दिक पटेल, उमर खालिद  व चंद्रशेखर जिन्होंने देश भर में कुछ आंदोलनों की शुरुआत हुई– हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला मामले की बारीकी से जांच करने के लिए जस्टिस अशोक रुपनवाल कमिटी बनाई गयीI इस कमिटी ने 12 पृष्ठों की अपनी रिपोर्ट तैयार की, कमिटी ने भिन्न-भिन्न पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया जैसे क्या रोहित वेमुला दलित हैं या नहीं। इस के लिए 4 पेजों में जिक्र किया गया है रोहित वेमुला की माँ स्वयं को माला दलित समुदाय की बताती है लेकिन उन्हें अपने माता –पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं है उनका लालन पालन माला समुदाय के लोगों के बीच में हुआ, दूसरा बिन्दु उन्होंने ओबीसी समुदाय के व्यक्ति से शादी की है, इसलिए वे भी दलित है, ये विचार उनके दलित होने के आधार को कमजोर करता हैI एक और सबसे महत्व पूर्ण दस्तावेज़ जो रोहित वेमुला ने सुसाइड नोट में दिया है वहाँ पर जाति के आधार पर कोई भेद भाव नहीं झलकता है बल्कि वह आम गरीब व्यक्ति की बात कर रहा हैI लेकिन इस मुद्दे को दलितों के साथ जोड़ कर सभी राजनीतिक दलों एवं दलित संगठनों ने दलितों के साथ जोड़कर राजनीति की, इसमें पहली वार वामपंथी दलों ने डॉ. आंबेडकर के बेनर, पोस्टर व झंडे के नीचे दलित संस्थानों के साथ सड़कों पर आये, कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी कैंपस पहुचते एवं  दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल जी भी कैंपस पहुच कर रोहित वमुला के भाई को सरकारी नौकरी देने की घोषणा कर देते हैंI दलितों के नाम पर राजनीति होती रहीI

जे एन यू की घटना, रोहित वेमुला की घटना के बाद  9 फरवरी 2016 को JNU में वामपंथी विचार धारा के छात्रों द्वारा मीर अफजल गुरु पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिसमें कुछ लोगों के द्वारा देश द्रोही नारे लगाये जाने की भी शिकायत आती है, जिससे विश्वविद्यालय परिसर में तनाव बढ़ जाता हैI अभी – अभी रोहित बेमुला की घटना पूरे देश में आग की तरह से बढ़ ही रही थी कि अचानक JNU का मुद्दा गर्माने लगता हैI एक तरफ दलितों में रोहित वेमुला के घटना को लेकर असंतोष था तो दूसरी तरफ वामपंथी विचारधारा का दक्षिण पंथी विचार धारा से लड़ाई थी ये एक अवसर था जब ये लोग एक साथ पहली वार दलितों के साथ डॉ. आंबेडकर के  पोस्टर, वेनर व होर्डिंग को हाथों में लेकर आंदोलन करते हुए सड़कों पर दिखेI मगर साथ ही साथ यह देखा होगा कि आंबेडकर को एक तरफ़ राष्ट्र भक्त मानते है और फिर उन्हीं के बनाए संविधान का पालन न होना भी बहुत सारे प्रश्न चिन्ह लगा देता है कि जैसे विश्वविद्यालयों में छात्रों के दाख़िला प्रवेश में, तथा नौकरी में आरक्षण का पालन हो रहा है या नहीं, क्या इस सब लोगों को भी आंबेडकर के मापदंडों से राष्ट्रद्रोही की श्रेणी में रख सकते है या नहीं?

ऊना की घटना– ऊना की घटना कुछ शरारती तत्त्वों या स्वयंभू गों रक्षकों का अमानवीय व्यवहार था, कोई भी समाज इस तरह से निर्दोष लोगों को मारने व पीटने की इजाजत नहीं देता है, ये विषय इतना संवेदनशील रहा जिसमें केन्द्रीय ग्रह मंत्री तथा प्रधान मंत्री मोदी को भी आगे आकर बोलना पड़ा कि 80% गों रक्षक स्वयंभू है इन पर अंकुश लगाया जाए, मगर सवाल यही है कि  आगे इस तरह की घटना रुकेंगी या नहीं?

उना का जवाब, सैराट और कबाली जैसी फिल्‍मों की कामयाबी, रोहित वेमूला के बाद देश भर में आंबेडकरवादी समूहों की लगातार बढ़ती सक्रियता और विकसित होते नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच बहुजनों के आइकन बन रहे हैं, उभर रहे हैं|

बीबीसी हिंदी पर शुरू होने वाली एक विशेष सिरीज़ के जरिए जानिए चार युवाओं- जिग्नेश मेवाणी, शीतल साठे, भंवर मेघवंशी और सूरजपाल राक्षसI|शीतल साठे, संस्कृतिकर्मी हैं, सतारा, महाराष्ट्र में रहती हैं, पति जेल में हैं, दलित और स्त्री सवाल पर देश के प्रमुख स्वरों में गिनी जा रही हैं|

पूना में विजय दिवस का आयोजन भीमा कोरेगाव शोर्यदिवस के मंच को जो लोग साझा कर रहे थे उनमें पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया, मूलनिवासी संघ, मुस्लिम मंच, छत्रपति शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड एवं दलित ईलम जैसे संगठन तथा अन्य महत्वपूर्ण लोग जो इस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे उनमें प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवनी, उमर खालिद एवं रोहित वेमुला की माँ श्रीमती राधिका वेमुला इत्यादि ने अपने-अपने भाषण दिए तथा दलितों पर अत्याचार के लिए अन्य लोगों को जिमेदार ठहरायाI

मुंबई: पुणे में नए साल के अवसर पर हुई जातीय हिंसा के बाद महाराष्ट्र पुलिस सतर्क हो गई है| मुंबई में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद के कार्यक्रम पर पुलिस ने रोक लगा दी है| पुलिस ने उमर तथा जिग्नेश के मुंबई प्रवेश पर रोक लगा दी है, पुलिस ने जहां कार्यक्रम होना था उस ऑडिटोरियम को सील कर दिया है| कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सैकड़ों छात्र सभा स्थल पर जमा होने लगे और पुलिस की इस कार्रवाई का विरोध करने लगे, पुलिस ने विरोध करने वाले छात्रों को हिरासत में ले लिया है| छात्रों का आरोप है कि उनका कार्यक्रम शांतिपूर्वक ढंग से होने जा रहा था पुलिस बीच में आकर माहौल को खराब करने की कोशिश की जा रही है, पुलिस की इस कार्रवाई पर छात्र वहां धरना देकर बैठ गए|

कार्यक्रम के संयोजक छात्र भारती संगठन के उपाध्यक्ष सागर भालेराव ने बताया कि आज विलेपार्ले के भाईदास हॉल में अखिल भारतीय छात्र समिट होने जा रही थी, लेकिन पुलिस ने पूरे इलाके को घेरकर यहां एंट्री पर रोक लगा दी है. कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रदेशभर से छात्र यहां इकट्ठा हो रहे हैं| इस कार्यक्रम में जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद को भी आमंत्रित किया गया था, उधर, पहली जनवरी को हुई हिंसा को लेकर पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद के खिलाफ धारा 153 (ए), 505 तथा 117 के तहत मामला दर्ज किया गया है|

गुरुवार को भीमा-कोरेगांव हिंसा के मुद्दे को कांग्रेस की सांसद रजनी पाटिल, सपा सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में उठाया और हिंसा की जांच के लिए एक आयोग के गठन की मांग की| भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के बाद विरोध की लहर महाराष्ट्र को पार करती हुई अन्य राज्यों में भी पहुंच गई है| प्रदर्शनकारियों ने जूनागढ़ में राजकोट-सोमनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग को बंद कर विरोध दर्ज कराया, गुजरात के धोराजी में कुछ उपद्रवियों ने एक बस में भी आग लगा दी थी, हालांकि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ|

दो अप्रैल का भारत बंद का आयोजन – कुछ लोग मानते है यह  भारतीय जन आंदोलनों के इतिहास में 2 अप्रैल का भारत बंद दलित आक्रोशित जनांदोलन के रूप में एक अनोखे तरीके से इतिहास में दर्ज होकर रहेगा, जो बिना किसी दल विशेष नेता के आह्वान पर ना होकर स्व-स्फूर्त जन आन्दोलन में तबदील हो गया जिसका मुख्य कारण वर्तमान भारतीय राजनीति,मीडिया व न्यायपालिका के साथ-साथ धर्माधिकारियों द्वारा दिये गये वक्तव्य मसलन दलितों, अछूतों का मंदिर प्रवेश निषेध बताकर बहुसंख्यक आबादी के दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक वर्ग की उपेक्षा एवं अवहेलना का परिणाम था| आऐ दिन इन वर्गों पर होने वाले कातिलाना हमले व अपने हक हकूक के लिए लड़ने वाले सामाजिक योद्धाओं को मिथ्या मुकद्दमे फंसा कर रासुका लगा कर जेल में बंद कर, दलितों को अधिकार विहीन करने की न्यायपालिका की साजिश बहुजन समाज को लग रही थी जिसे पूर्णतया राजनीतिक सुरक्षा कवच मिला हुआ लगता है| इसी सोच विचार समझ के तहत खुद को असहाय व असुरक्षित होने के भाव में उत्पीड़ितों का एक जुट होना व सड़कों पर प्रतिरोध का स्वर उतरना लाजिम ही नहीं वरन एक बेबसी भी रही होगी|

ये आंदोलन दलितों के स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के लिए था दलितों का न्यायपालिका और सरकार के प्रति विरोध के रूप में थाI देश के इतिहास में पहली बार इतनी संख्या में लोग आन्दोलन के लिए सड़कों पर निकले अपने मान सम्मान व स्वाभिमान के लिए ये सभी आंबेडकरवादी लोग थे, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के लिए ये आन्दोलन अपनी राजनीति को चमकाने व आगे बढ़ाने के लिए एक संजीवनी के रूप में था।

हमें यह भी ध्यान देना होगा कि  हाल के वर्षों में यह सब घटनाएँ हुई हैं और इन सब में वामपंथी और एक नयी आंबेडकरवादी विचारधारा का उद्गम के रूप में देखा जा सकता है मगर इन सब में राजनेता जो दलित समुदाय से आते है और संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करते है, क्या वो लोग इस सब का हिस्सा है या नहीं? अगर नहीं है तो क्या वो अपने समुदाय के लोगों की आवाज़ बनने में असमर्थ है? जो अम्बेडकर का एक ओर दर्द बयाँ करता है की जो राजनीतिक आरक्षण है वह समाज को ओर अधिक विपरीत दिशा में धकेल रहा है, जिसका सबसे बड़ा नुक़सान है कि  एक स्वतंत्र राजनीति का पतन भी साथ ही साथ देखा जा सकता है।

अभी जो आन्दोलन नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में किये जा रहे है उन आंदोलनों व प्रदर्शन व विरोधों में भी वही एक अवसरवादी लोगो का एक मंच पर आना और अपने अपने हितों को साधना उनकी प्राथमिकता हैI यहाँ पर मूलनिवासी की बात की जा रही है, यह बात बामसेफ से जुड़े हुए कुछ लोग कह रहे है तथा अपने कुछ स्वार्थों के लिए ये  दलितों में भय पैदा करने की कोशिश कर रहे है कि आप को भी मुसलमानों की तरह नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया जायेगा, हमें इस लड़ाई में CAA के विरोध में आना चाहिए, लेकिन वे ये नहीं समझ रहे है कि ये नागरिकता किन लोगों को दी जा रही है, इनमें अधिकांश लोग दलित है जिन्हें ये नागरिकता मिलेगी, ये लोग यह नहीं समझ पा रहे कि जोगिन्द्र्नाथ मंडल जो उच्च शिक्षा प्राप्त दलित नेता थे, मुस्लिम लीग से उनका सम्बन्ध 1937 से एक लम्बे समय तक रहा, लेकिन पाकिस्तान बनने के तीन साल बाद ही दलित मुस्लिम गठबंधन की स्पष्ट सच्चाई सामने निकल कर आ गयी, पाकिस्तान में दलितों पर कितने अत्याचार होने लगे ये जोगिन्द्र्नाथ मंडल ने नहीं  सोचा  होगाI आज जो लोग दलित मुस्लिम गठबंधन की बात कर रहे है उनके भ्रम को तोड़ने लिए इस घटना का उल्लेख काफी है|

आज के आंबेडकरवादी डॉ. आंबेडकर के विचारों का अनुगमन करने की बजाय जोगिन्द्र्नाथ मंडल के विचारों के फोलोवेर अधिक हो रहे है इसलिए हर जगह दलित मुस्लिम गठबंधन को ज्यादा महत्व दे रहे हैI मुस्लिम एवं दलित प्रेम जो स्वतंत्रता आन्दोलन के समय में पूर्वी बंगाल में दलित नेता जोगेन्द्र नाथ मंडल एवं मुस्लिम लीग के बीच एक समझौता हुआ था| दलितों एवं मुस्लिम की स्थिति एक जैसी है, दोनों ही विकास के मामले में पिछड़े हुए है इसलिए दोनों का विकास मिलकर कार्य करने में है इसलिए दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ना प्रारम्भ किया और दोनों ने मिलकर बंगाल में सरकार भी बनाई, लेकिन जून 1947 में पाकिस्तान के बटवारे के बाद भी दलितों एवं मुस्लिम लीग के नेताओं के बीच दिल्ली में एक समझोता हुआ जो दिल्ली समझोते के नाम से जाना जाता है जिसमें पाकिस्तान में दलितों के अधिकारों को सुरक्षा की गारंटी दी गयी थीI जोगेन्द्र नाथ पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने और पाकिस्तान के संविधान के निर्माण में भी महत्व पूर्ण भूमिका निभायी, लेकिन जोगेन्द्र नाथ मंडल का मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान के प्रति विश्वास 8 अक्तूबर 1950 को पूर्णतः टूट गया, वे  दलितों के अधिकारों को सुरक्षा नहीं दे पाए तथा उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और बाद में वे भारत(कलकत्ता) लौट आये यह एक उदाहरण है उन लोगों के लिए जो ‘जय मीम और जय भीम’ के तालमेल की बाते करते हैI

नए अंबेडकरवादियों को भारतीय समाज का अध्ययन डॉ आंबेडकर के अध्ययन के उपागमों के आधार पर करने की जरूरत है, डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण समाज व राष्ट्र को जोड़ने की बात करते थे, सामाजिक सामंजस्य की बात करते थेI डॉ अम्बेडकर के अनुसार संविधानिक एवं क़ानूनी एवं लोकतान्त्रिक आधार पर अपने अधिकारों को प्राप्त करना चाहिए, देश को बाँटना नहीं है जोड़ना हैI नए अंबेडकरवादियों को अपने कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए समाज को गुमराह करने से बचना चाहिए एवं सम्पूर्ण राष्ट्र एवं समाज हित में कार्य करना चाहिएI

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