विदेश से लौटना और माह भर का एकांतवास……

जब भारत में कोरोना की शुरुआत हुई और विदेशों से आने वाले विमानों पर रोक लगाने का निर्णय किया गया तब आप किस देश में थीं?

मैं 9 मार्च को हिंदू सेवा संघ के काम के लिए ब्रिटेन गई थी। मेरा वीजा तो 6 महीने का था और मेरा प्रवास भी कुछ आगे तक था; परंतु दुनिया भर में कोरोना का संकट गहराने लगा था। अत: हम जैसे प्रवास पर गए भारतीय लोगों को वापस लाने का विचार होने लगा था; क्योंकि विदेशों की विमान सेवाएं बंद की जाने वाली थीं। अत: मैंने भी अपना प्रवास बीच में रद्द करके स्वदेश लौटना ही उचित  समझा। मैं 18 मार्च को वापस आई।

आप जब ब्रिटेन में थीं तब वहां की परिस्थिति कैसी थी?

वहां भी कोरोना का प्रभाव दिखाई देने लगा था। हालांकि वहां की सरकार ने लॉकडाउन जैसे कोई कदम नहीं उठाए थे, परंतु लोग स्वयं ही सावधानी बरतने लगे थे। बीच-बीच में ब्रिटिश  सरकार कुछ निर्देश अवश्य देती थी, लेकिन रोजमर्रा का जीवन सामान्य था। वहां कुछ भी बंद नहीं किया गया था।
जिस दिन मैं वहां से निकलने वाली थी उस दिन मैं भारतीय दूतावास में गई थी। ब्रिटेन में मेरे निवास स्थान से दूतावास तक की यात्रा मैंने ट्यूब (वहां की मेट्रो) से की थी। उसमें बहुत कम लोग सफर कर रहे थे। परंतु तब तक सरकार की ओर से आवागमन पर कोई रोक नहीं थी।

वहां की परिस्थिति को देखते हुए आप भारत के बारे क्या सोच रही थीं?

उस दौरान वहां एक वीडियो चर्चा का विषय था, जिसमें भारत सरकार द्वारा विदेशों से आने वाले लोगों को क्वारंटीन काल के दौरान दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण था। फूड पैकेट के साथ ही स्लीपर जैसी अति सामान्य आवश्यकता का ध्यान भारत सरकार रख रही है, यह वहां चर्चा का विषय था। मैंने भी अपने मन को समझा लिया था कि मुझे भी 14 दिन इसी प्रकार क्वारंटीन रहना होगा। हम जिस प्रकार राष्ट्र सेविका समिति के ग्रीष्मकालीन या अन्य समयों पर लगने वाले शिविरों में रहते हैं, उसी प्रकार बाहर की दुनिया से अलग रहना होगा यह मैंने मन में ठान लिया था। केवल अंतर इतना था कि शिविरों में बाकी सेविकाओं के साथ दिनचर्या होती है, अब मुझे 14 दिन अकेले ही सरकारी क्वारंटीन व्यवस्था में रहना होगा।

अपना कार्यक्रम बीच में ही रद्द करके जब आपने वापस आने का निर्णय किया तो क्या आपको कुछ परेशानी हुई? उस समय आपकी मदद किसने की?

सबसे पहली समस्या थी हवाई यात्रा क टिकट निकालने की; क्योंकि लगभग सभी टिकट बिक चुके थे। ब्रिटेन में हिंदू स्वयं सेवक संघ का कार्य काफी अच्छा है। वहां के कार्यकर्ताओं की मदद से मुझे उस हवाई जहाज का टिकट मिल गया, जिसमें दो ही सीट बाकी थी। सामान्यत: मैं भारत वापस आने की यात्रा लंडन से शुरू करती हूं, परंतु इस बार स्टैंडस्टेड से यात्रा शुरू करनी थी। वहां कुछ लोगों ने मास्क लगाया हुआ था और कुछ लोग तो पीपीई किट पहनकर बैठे थे।

क्या आपने भी सावधानी बरतना शुरू कर दिया था?

हां मैंने मास्क लगाना, दस्तानें पहनना तथा सेनेटाइजर लगाना शुरू कर दिया था। हवाई यात्रा शुरू करने के पहले मेरी किसी प्रकार की चिकित्सकीय जांच नहीं की गई, परंतु सुरक्षा जांच के दौरान मुझे बहुत अच्छा अनुभव आया। इंग्लैंड की एक सेविका जो कि स्वयं डॉक्टर हैं, उन्होंने मुझे सेनेटाइजर की बोतल दी थी। वह बोतल 100 मिली से अधिक की थी। चूंकि 100 मिली से अधिक कोई तरल पदार्थ हवाई जहाज में लेकर नहीं जा सकते अत: जांच के दौरान मुझे वह बोतल फेंक देनी पड़ी। उस समय मेरे मन में थोडी चिंता जागृत हुई कि मुझे यहां से भारत में मुंबई तक और आगे पुणे तक की यात्रा करनी है और मेरे पास जो एक सेनेटाइजर की बोतल थी वह भी अब नहीं है। मेरा एक दस्ताना भी कहीं गिर गया था। सुरक्षा जांच की कतार में मेरे साथ एक आयरिश लड़की भी थी जिसने ये सब देखा था। जांच के बाद सामान लेते समय उसने मुझे उसके पास की सेनेटाइजर की एक बोतल देते हुए कहा, ‘आप चिंता मत करो। मेरे पास दो बोतल हैं। आप इसमें से एक ले लीजिए। यह आपके घर पहुंचने तक चल जाएगी।’ मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और अच्छा भी लगा कि बिना किसी पूर्व जान-पहचान के, एक देश के न होने के बाद भी उसने मेरी मदद की।

भारत में लौटने के बाद यहां क्या व्यवस्था थी?

भारत आने के बाद हमें एक फॉर्म भरने को कहा गया जिसमें स्वास्थ्य की जानकारी से सम्बंधित कई प्रश्न थे। हमारा तापमान देखा गया। मैं जिस हवाई जहाज से आई थी वह दुबई से होकर आया था और उस समय दुबई में कोरोना का प्रभाव बहुत बढ़ चुका था। अत: दुबई से होकर आए प्रवासियों को अलग कतार में खड़े रहने के निर्देश दिए गए थे। सारी जांच होने के बाद हमारे बाएं हाथ पर एक ठप्पा लगाया गया जिसमें लिखा ‘प्राउड टू बी….मुंबईकर’। मुझे वह देखकर बहुत अच्छा लगा कि इस चिंताजनक परिस्थिति में भी सकारात्मकता लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उसमें क्वारंटीन कालावधि की तारीख लिखी गई थी। मुंबई हवाईअड्डे से निकलकर मैं टैक्सी से सीधे पुणे में अपने घर आई। बीच में कहीं भी नहीं रुके। उस टैक्सी ड्राइवर ने मास्क लगाया था, मैंने भी मास्क लगाया हुआ था।

आपका 14 दिनों का क्वारंटीन काल कैसा रहा?

14 दिन नहीं, एक महीने का। हवाई अड्डे पर तो हमें 14 दिन कहा गया था, परंतु बाद में फोन करके उसे और 14 दिन बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। मैं उन 28 दिनों में घर से बाहर कहीं भी नहीं निकली थी।

आप राष्ट्र सेविका समिति की सक्रिय सेविका हैं, निरंतर प्रवास पर रहती हैं, लोगों से मिलना- जुलना होता रहता है। पूरा एक महीना घर पर रहने का अनुभव कैसा रहा?

सह कहूं तो घर के सारे काम तो थे ही और उन दिनों में भी इतने सारे काम ऑनलाइन हो रहे थे कि समय निकल ही जाता था। वेबिनार, ऑनलाइन बौद्धिक वर्ग, चर्चा सत्र नियमित रूप से चल रहे थे तो ऐसा लगा ही नहीं कि खाली बैठी हूं। व्यस्ततासामान्य दिनों से ज्यादा ही हो गई थी। एक बहुत अच्छा अनुभव भी इन दिनों में आया। मुंबई के उपनगर मुलुंड की एक सेविका हैं। उनसे मेरा कोई बहुत गहरा या नियमित सम्पर्क नहीं है। उनका बेटा बर्लिन में रहता है। मेरी पिछली यात्रा में मैं उनसे मिलने गई थी। इस बार भी उन सेविका को पता चला कि मैं ब्रिटेन की यात्रा पर हूं और यह भी ज्ञात था कि सरकार 18 मार्च को विदेशी हवाई यात्राएं बंद करने वाली है। इन सबका गणित लगाकर उन्होंने ठीक 19 मार्च की सुबह- सुबह मुझे गीत रामायण की लिंक भेजी और उसके साथ संदेश लिखा ‘एकांतवास में सुनने के लिए’। इसके बाद वे नियमित मुझे गीत भजन भेजती रहीं। इतनी आत्मीयता, इतना विश्वास केवल समिति की ही देन है, यह विश्वास हो गया।

आपके वापस आने के बाद आपने निवास परिसर में रहने वाले लोगों का आपकी ओर देखने का दृष्टिकोण कैसा था।

ये थोड़े मिश्र अनुभव थे। जब लोगों को पता चला कि मैं विदेश यात्रा करके लौटी हूं तो कुछ लोग घबरा गए थे। सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप पर कुछ लोगों ने आशंका भरे संदेश भेजे थे। हमारे यहां के पार्षद तक को सूचना दे दी गई थी। सोसायटी को सेनेटाइज किया गया था। मुझे लगता है यह सब परिस्थितिजन्य था। परंतु मेरा बाहर जाना बंद होने के कारण मुझे जिस चीज की भी आवश्यकता थी वे सब मेरे पड़ौसियों ने, मेरी बड़ी बहन तथा सोसायटी में रहने वाले मेरे भाई ने ही लाकर दिया था। मैंने भी अपनी यात्रा का सारा विवरण सोसायटी के ग्रुप पर डाल दिया था। इसके बाद सारी परिस्थिति सामान्य हो गई थी।

इस एक महीने में सरकार की ओर से क्या कुछ जांच की गई थी?

जी हां। हेल्थ ऑफिसर आए थे। उन्होंने एक फॉर्म भरवाया था और मेरे घर के बाहर एक पर्चा चिपका दिया था कि मैं एक महीने के लिए ’होम क्वारंटीन’ हूं। एक एप डाउनलोड करने के लिए कहा गया था, जिस पर दिन में तीन बार मुझे अपना फोटो अपलोड करना पड़ता था, यह बताने के लिए कि मैं घर पर ही हूं। संयम नाम का भी एक एप डाउनलोड करने के लिए कहा गया था, जिससे वे मेरी लोकेशन जान सकें। इसके अलावा पुलिस अधिकारी भी घर आए और उन्होंने दरवाजे के बाहर से ही मेरा फोटो लिया। मेरे निकट के पुलिस थाने तथा महानगरपालिका स्वास्थ्य विभाग से भी नियमित फोन आते थे। मैं देखकर हैरान थी कि एक व्यक्ति के लिए इतना पूरा सरकारी तंत्र कार्यरत है। हाथ पर लगाई जाने वाली मुहर से लेकर एप के नामों तक सरकार ने किस स्तर तक विचार किया है, यह मैंने उस एकांतवास के काल में अनुभव किया।

अभी महानगरों से मजदूर अपने गांव लौट रहे हैं। एक तुलना इस प्रकार से की जा रही है कि इन लोगों को घर पहुंचाने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं और विदेश से लोगों को ‘मिशन वंदे भारत’ का बोलबाला करके वापस लाया जा रहा है। इस बारे में आपकी क्या राय है?

मेरे विचार से ये दोनों ही समान समस्या का सामना कर रहे हैं। सरकार को दोनों की ही चिंता है। वंदे भारत मिशन के अंतर्गत हवाई जहाज की व्यवस्था की गई थी, मजदूरों के लिए ट्रेनों और बसों की व्यवस्था की गई। उन्हें बीच रास्ते में नहीं छोड़ा गया। जहां वे ट्रेनें से उतरे वहां भी उनकी व्यवस्था की गई थी। जिस परिवार के लोग विदेशों में हैं, वे परिवार भी चिंतित रहते हैं। मुझे भी कुछ लोगों ने विदेशों में रह रहेे अपने परिवार के सदस्यों की जानकारी लेने के लिए कहा था और मुझे यह संतोष है कि मैं उनके काम आ सकी।

This Post Has One Comment

  1. अविनाश फाटक, बीकानेर. (राजस्थान)

    इसीलिये तो कहते हैं – “शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है,
    दिव्य ऐसे प्रेम में ईश्र्वर स्वयं साकार है.

आपकी प्रतिक्रिया...