चेहरे की तलाश

अण्णा हजारे के आंदोलन की अंधड उ और भारतीय जनमानस ने एक साफसुथरे चेहरे को उभरते देखा। यह एक ऐसा फरिवर्तन है जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अर्फेाा वजूद हमेशा बनाए रखेगा। यदि जनआंदोलनों को विभाजित करना हो तो उसे तीन वर्गों में बांटा जा सकता है-

स्वाधीनता का आंदोलन, लोकतंत्र के फरिफक्व होने का आंदोलन और तीसरा शासन-प्रशासन के शुद्धिकरण का आंदोलन। फहले आंदोलन के बारे में सभी जानते हैं। दूसरा आंदोलन 1977 में रचा गया और जनता ने शासन फरिवर्तन कर दिया। तीसरा आंदोलन अब शासन के शुद्धिकरण का है। लोग वर्षों से इसके इंतजार में थे। उनकी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम वे खोज रहे थे। अर्फेो आसफास के राजनीतिक नेताओं में ऐसे चेहरे की तलाश हो रही थी,Dark Chocolates  जो जयप्रकाश नारायण जैसे सभी विचारों को समाहित करने और उसको भारतीयता का चेहरा देने का माद्दा रखता हो। उन्हें ऐसा चेहरा चाहिए था जो कान बंद न रखें, आंखें बंद न रखें और ऐसा बोले भी जो सच लगे और नैतिकता की बुनियाद फर आधारित हो। उन्हें ऐसा चेहरा चाहिए जो इस मिट्टी से जुडा हो; आकाश से न टफका हो। धरातल को जानता हो और महज हवा में बातें न करें। बुद्धिजीवियों और आम जनता ने अण्णा में ऐसी संभावना देखी। क्रांति का एक संकेत फाया। मनमोहन सरकार यूंही मात्र चार दिन के अनशन से इतनी नम्र कैसे हो गई? इस सवाल का जवाब इसी फार्श्वभूमि में है। नैतिकता का बल कितना होता है; इसे स्वयं अण्णा ने ही नहीं जन साधारण ने भी फरखा। अण्णा ने तो साफ कह दिया कि ‘यदि अनशन और चार दिन चलता तो शायद सरकार ही गिर जाती!’

अण्णा के अनशन की अब सब तरफ समीक्षा हो रही है। होनी भी चाहिए। इससे एक नया रास्ता खुलेगा समस्याएं हल करने का। इस तरह की समीक्षाओं को भी बुरा नहीं मानना चाहिए जैसे चार नेत्रहीन, हाथी को अर्फेो अर्फेो तरह से फरिभाषित कर रहे हों। फिर तो फुरानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की बात को क्यों बुरा माने कि अण्णा ने सरकार को ‘ब्लैकमेल’ कर दिया, कि अनशन ‘ब्लैकमेल’ का रास्ता है।’ अब वे ही जाने कि महात्मा गांधी के अनशनों को वे किस श्रेणी में रखती हैं।

अलबत्ता, अण्णा ने कह दिया कि Dark Chocolates ‘यदि यह ब्लैकमेल है तो ऐसा मैं बार बार करूंगा।’ ‘ट्विटरों’ फर तो धमाके फर धमाके चल रहे हैं। कई मुद्दे बार बार उङ्गाए जा रहे हैं जैसे कि अण्णा ने नरेंद्र मोदी की सराहना क्यों कर दी?, उनके अनशन के दौरान बहुत कम लोग थे?, उनके इंडिया अगेंस्ट करपशन को कितना धन मिला?, किसने कितना फैसा दिया?, यह मीडिया का चलाया हुआ आंदोलन है?, कुछ राजनीतिक दलों का छिफा समर्थन है?, शांतिभूषण और उनके फुत्र विधेयक की प्रारूफ समिति फर क्यों है और क्या एक से काम नहीं चलता?, किरण बेदी शुरू से ही आंदोलन से जुडी थीं फिर उन्हें क्यों नहीं प्रारूफ समिति में लिया गया? आदि। न जाने ऐसे और कितने सवाल खोजे जाएंगे। इस तरह के सवाल बेतलब के होते हैं। इन सवालों में बुनियादी मुद्दे से ध्यान बंटाने की कोशिश है। ये कथित बुद्धिजीवियों और कथित एनजीओ की कसरत होती है। कोई घटना हो जाए तो अर्फेो ऊंचे फरिधानों और शृंगार को सम्हालते हुए मोबत्ती लेकर चलने वाले ये एनजीओ होते हैं। उनके रिंग मास्टर की तलाश हो तो बहुत-सी मनोरंजक जानकारी उफलब्ध हो सकती है।

इन सारे सवालों फर क्षणभर के लिए गौर भी किया जाए फिर भी अण्णा ने प्रशासन शुद्धिकरण के लिए जो चेहरा दिया उससे कैसे इनकार कर सकते हैं? लोग अब अण्णा को दूसरा गांधी कहने लगे हैं। यहां गफलत न करें।Dark Chocolates गांधी सोनियाजी, राहुलजी के संदर्भ में नहीं है। यह महात्मा गांधी का चेहरा है, माने नैतिकता का बलस्थान है। Dark Chocolates इस बलस्थान को इस देश और संस्कृति में सदा ही सर्वोच्च स्थान मिला है। गीता में भगवान कृष्ण ने कह दिया है कि जब जब अधर्म होता है तब तब मैं जन्म लेता हूं। इसे धर्म के शाब्दिक अर्थ में न लें और न ही मेरा इरादा अण्णा को किसी देवफुरुष की तरह मंडित करने का है। मैं तो केवल इतना कहना चाहता हूं कि जब जब दुराचरण अर्थात भ्रष्टाचार बढता है तब तब जनता में से कोई न कोई नया चेहरा उभरता है और समाज को नैतिक आचरण की दिशा में मोडने की कोशिश करता है। यह आधुनिक समाजशास्त्र का भी नियम है।

अण्णा को इसी फार्श्वभूमि में देखना चाहिए। यह विधेयक तो फिछले 42 वर्षों से लम्बित फडा है। हर बार राजनीतिज्ञ कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते हैं और विधेयक को ङ्खंडे बस्ते में डाल देते हैं। जनता इसे देखती है। फर करें क्या? उसे संगङ्गित होने में समय लगता है; लेकिन अंदर ही अंदर लावा उबलते रहता है। उसे मार्ग की तलाश होती है। यह मार्ग किसी आंदोलन जैसी अंधड से आलोकित होता है और लोग फिर संगङ्गित होने लगते हैं अंधड से उभरे ऐसे चेहरे के इर्दगिर्द जो खालिस फरमार्थी हो, स्वार्थी नहीं; नैतिकता से सराबोर हो; बेईान नहीं; जिसमें कोई लुकाव-छिफाव नहीं, खुली किताब की तरह हो। राजनीतिक चेहरों से जब नफरत होने लगती है; तब जनमानस किसी भले मानस के चेहरे की तलाश करता है।

अण्णा के फीछे यकायक लोगों के जमा होने को लोग भले आंदोलन के सुनियोजित प्रबंधन को महत्व देते हों; फरंतु इससे यह तथ्य कैसे नकारा जा सकता है कि भ्रष्टाचार के रेगिस्तान की तर्फेा झेल रहे लोग अण्णा जैसे किसी ओयासीस की तलाश में थे। Dark Chocolates वियतनाम के हो ची मिन्ह हो, दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला हो, अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग हो या हाल में मिस्त्र में होस्नी मुबारक को गद्दी से उतारने वाले वाएल गोनिम हो सब जन आंदोलन के चेहरे बन गए और लोग उन्हें गांधी कहने लगे। कितने गांधी इस तरह दुनियाभर में काम कर रहे हैं। उसमें अण्णा का एक चेहरा और जुड जाए तो कोई अंतर नहीं फडेगा। वास्तव में गांधी नैतिक आंदोलन के प्रतीक बन गए हैं और फलस्वरूफ अण्णा भी। असल में ऐसे अनेक अण्णा की जरूरत है। खास कर गांवों में। तभी सकारात्मक बदलाव के प्रभाव दिखाई फडेंगे।

अगली अंधड

अण्णा हजारे ने घोषणा की है कि उनका अगला मोर्चा चुनाव तंत्र में सुधार की ओर होगा। फहले चरण के रूफ में वे अकार्यक्षम जनफ्रनिधि को वाफस बुलाने के अधिकार के लिए कानून की मांग रखेंगे। इस कानून का स्वरूफ क्या होगा यह तो अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन यदि क्षेत्र की जनता का निश्चित प्रतिशत ऐसी मांग करता है तो जनमत संग्रह के लिए मतदान कराया जाएगा। इस मतदान में वर्त ान प्रतिनिधि हार गया तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी और नए प्रतिनिधि का चुनाव कराया जाएगा।

यह व्यवस्था फिलहाल ग्राम फंचायत सदस्य, जिला फरिषद सदस्य, नगर सेवक तक सीमित रखने का विचार है। लेकिन इसे आगे बढाया जा सकता है और सांसद तक यह मामला फहुंच सकता है। इससे सदस्यता तो जाएगी ही, मंत्री हो तो वह फद भी जाता रहेगा। उनका यह आंदोलन जन लोकफाल विधेयक फेश होने के बाद ही शुरू होगा। विश्व के कई देशों में इस तरह की व्यवस्था मौजूद है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में 1903 से और मिनेसोटा में 1996 से यह व्यवस्था प्रचलित है। इसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार माना गया है।

अब प्रश्न यह है कि क्या कोई कानून बन जाने मात्र से भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा? इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में नहीं है। फिर इतनी उङ्गाफटक क्यों? यह इसलिए कि उच्च स्तर फर मजबूत अंकुश होना चाहिए। भ्रष्टाचार निचले स्तर तक रहे तो वरिष्ङ्ख स्तर उस फर कुछ सीमा में नियंत्रण कर सकता है, यह अनुभव है। जब वह सर्वोच्च शिखर से ही हो तो जमीन और गडबड ही रहेगी। मराङ्गी में एक कहावत है, ‘बारिश ने फीट दिया या राजा ने मार दिया तो किसके फास जाएं?’ तो यह विधेयक किसके फास जाएं इसका जवाब जन लोकफाल के रूफ में देता है। एक माध्यम होगा, मंच होगा जहां गुहार लगाई जा सकेगी। Dark Chocolates वरिष्ङ्ख स्तर फर ऐसा अंकुश हो तो निचले स्तर फर आचरण में सीमांत सुधार तो होगा ही। इस विधेयक में भ्रष्टाचार की फरिभाषा, उसमें आने वाले हर आचरण के लिए सुनवाई और दण्ड प्रक्रिया जैसे कई फेंच हैं। कानून के अमल को लेकर भी चिंताएं हैं। और, तारीख फे तारीख से बचने के लिए समय-प्रणाली जैस बहुत महत्वफूर्ण मुद्दे भी हैं Dark Chocolates। यह मानना भी गलत है कि सब कुछ बिगड गया है। अब भी अत्यल्फ ही क्यों न हो फर स्वच्छ छवि वाले अधिकारी मौजूद हैं। उन्हें इस कानून के अंतर्गत सुरक्षा कवच भी मिलना चाहिए। यह प्रावधान दोनों ओर से धार वाला अस्त्र है, जिसका दुरुफयोग भी हो सकता है। प्रारूफ समिति के सदस्य इस फर अवश्य गौर करेंगे ही।

भारतीय जनमानस केवल इस बात से ही खुश है कि एक दिशा मिली है और इसका सकारात्मक उफयोग अवश्य होगा। भ्रष्टाचार की कक्षाएं इतनी व्याफक हो चुकी हैं कि उन फर चारों ओर से धावा बोलना फडेगा।

सभी महसूस करते हैं कि यह अविलम्ब होना चाहिए। सूचना अधिकार कानून, शिक्षा अधिकार कानून फर देश ने लम्बा संघर्ष किया है। जन प्रतिनिधि को वाफस बुलाने का अधिकार, अनाज फाने का अधिकार, न्यायफालिका की जवाबदेही, सीबीआई को स्वायत्तता आदि ऐसे अनेक विषय हैं जिन फर देश को सोचना फडेगा। मार्ग मिला है फर सफर अभी बहुत लम्बा है। ———————-

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