गिरि राजा हिम तेंदुआ

हिम तेंदुआ को अंग्रेजी में एहदै थज्द् अथवा ध्ल्हम झ्हूप ळहग्म् कहते हैां हिन्दी में उसे हिम तेंदुआ कहते हैं।
मार्जर वंश का यह सब से चित्ताकर्षक और शानदार प्राणी हैा वह सामान्य तेंंदुए से छोटा है और उसका वजन 35 से 45 किलोग्राम होता हैा लम्बाई 100 से 130 से मी और बदन के बाल लम्बे और घने होते हैां बालों का रंग धूसर नीला और धूसर होता है। उस पर हल्के पीले रंग की झांक होती हैा पेट का रंग सफेद होता हैा सिर और निचले हिस्से पर गोल काले छल्ले होते हैां पूंछ और कान के पीछे का रंग काला होता है। पूरे बदन पर गुलाब के फूलों के आकार हल्के पीले निशान होते हैां उनमें बारीक गहरे काले बिंदु होते हैां तेंदुए की तुलना में हिम तेंदुए मी पूंछ मोटी होती हैा पूंछ पर भरपूर बाल होते हैां उस पर भी गुलाब पुष्प के आकार के चिह्न होते हैं।

पैर के मुलायम तलुओं पर बालों का आवरण होता हैा इससे शीत से बचाव होता है और बर्फ में आसानी से घूमा जा सकता है।

क्षेत्र: हिम तेंदुआ हिमालय, हिमालय मी तराई, लडाख से अरुणाचल में 3 हजार से 4 हजार मीटर ऊंचाई पर मिलते हैं।

आदतें और निवास: अपने अस्तित्व का पता न लगने देने वाला यह शर्मिला प्राणी हैा हिमालय की वृक्ष रेखा पर (ऊाा थ्ग्हा) दिखाई देता हैा लेकिन शीत के दिनों में वह 2 हजार मीटर ऊंचाइ तक स्थलांतर करता है।

पर्वतीय भेड, मारखोर, हिमालयीन तहर, जंगली भेड, कस्तूरी मृग, कृतंक वंश के प्राणी और शिकारयोग्य पक्षी उसका मुख्य भोजन हैा इसके अभाव में तुंग शशक (झ्ग्व्), शैल मूषक (श्स्दू), खरगोश पर काम चला लेता है। फरवरी से मार्च उसका जनन काल होता हैा इस काल में हिम तेंदुआ श्ब्ग्म्ल्हग् ुीस्हग्म् नामक झाडियों वाली वनस्पती चाव से खाता है। ऊस्ग्म्मा नामक वंश की श्ब्ग्म्ल्हग् ुीस्हग्म् यह कंटली झाडियां लाहुल स्पीति से कुमायूं के बंजर इलाके, नद के किनारे अथवा शीत रेगिस्तान में पनपती है। उसे गुलाबी रंग के फूल आते हैं।

हिम तेंदुआ जिद्दी और तेजतर्रार प्राणी हैा वह 15 मीटर तक की छलांग आसानी से लगा सकता हैा वह यद्दपि निशाचर है; फिर भी कई बार दिन में भी शिकार करता हैा ऊंचे पर्वतों पर से लुकते छिपते संचार करते समय वह निचले इलाके में आहार विहार करते प्राणियोंं पर नजर रखता है। उसकी आंखोंं की पुतलियां गोल होती हैं और उनमें कोई रेखा नहीं होती।

वह अकेला रहना पसंद करता हैा वह अपने इलाके में विहार करते समा पेड के तनों और शिलाओं पर अपने मूत्र छोड कर निशान छोडता चलता है। जमीन कुरेदता है। पहाडों की खोह में पनाह पाता हैा कई बार गिध्दों के नाटे पेड पर बने बडे घोंसलों पर कब्जा जमा लेता है। गिध्द उसे भगाने की कोशिश करते हैं; लेकिन वह उनकी एक नहीं चलने देता।

उसकी गर्भधारणा का काल सौ दिनों का होता है। मादा एक या चार बच्चों को जन्म देती हैा बच्चों के लिए अपने बालों का बिछौना वह बनाती है।
हिम तेंदुआ अमुमन आदमी पर हमला नहीं करता; लेकिन यदि उससे छेडछाड की जाए तो वह जानलेवा हमला कर सकता है। हिम तेंदुआ का असली दुश्मन आदमी ही है। उसकी अमूल्य खाल के लिए उसकी शिकार की जाती है। उसकी सुंदर ऊन से महिलाओें के लिए फैशनेबुल वस्त्र, तकिए, हाथमोजे व अन्य वस्तुएं बनाई जाती हैं। कश्मीर के दाचिगैम अभयारण्य में 1951 से हिम तेंदुआ को संरक्षण प्रदान किया गया है।1952 से उसकी खाल के व्यापार पर पाबंदी लगा दी गई है।

कुछ इलाकों में हिम तेंदुए भोजन बनने वाले प्राणी समाप्त हो रहे हैं। पहाडों के घास के मैदानों का चराई के लिए अथवा खेती के लिए विकास किया जा रहा है। हिम तेंदुए के निवास स्थान दिन ब दिन सिकुडते जा रहे हैं। इस तरह वह नष्ट होने के कगार पर हैा

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