आठवां फेरा बेटी का!

संतोष नाम सुना होगा आपने। यह नाम लड़के का हो सकता है, तो लड़की का भी। नाम भले ही एक हो, लेकिन लड़के या लड़की को यह नाम देनेे के पीछे की मानसिकता एक नहीं हो सकती। बहुत संभव है लड़के को यह नाम उस ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए दिया गया हो, जिसकी ‘कृपा’ से पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ है – शुक्रिया भगवान, हम जो चाहते थे, वह हमें मिल गया, अब संतुष्ट हैं। लेकिन लड़की के मामले में इस नाम का केवल यही अर्थ हो सकता है कि बस भगवान, बहुत हो गया, अब अपनी यह ‘कृपा’ बंद करो! यह नाम तो फिर भी ठीक-ठाक लगता है- कम से कम बुलाने में ही सही। लेकिन क्या ‘धापू’ के बारे में भी ऐसा कह सकते हैं ! राजस्थानी शब्द है ‘धापू’ और इसका अर्थ होता है: बस धाप गये, पेट भर गया हमारा। यह नाम राजस्थान में अक्सर उन घरों में सुनाई दे जाता है, जहां कई बेटियां हों। सचाई ये है कि यह सिर्फ राजस्थान की कहानी नहीं है। देश के हर राज्य में, हर भाषा में इस तरह के नाम और इस तरह के नामों के पीछे की मानसिकता देखी जा सकती है।

शिक्षा के प्रचार-प्रसार और सामाजिक जागृति के चलते इस मानसिकता में बदलाव की बातें अवश्य होती हैं, लेकिन ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में लड़कों एवं लड़कियों के अनुपात को देखें तो इन बातों का सच-झूठ सामने आ जाता है। सारी जागरूकता और सारे सुधारों के बावजूद आज देश में प्रति हजार लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या 914 है। विकसित माने जाने वाले राज्यों-क्षेत्रों में तो कहीं-कहीं स्थिति इससे भी बदतर है। कन्या भ्रूण हत्याओं के किस्से आये दिन प्रगति और प्रगतिशीलता के हमारे दावों को अंगूठा दिखाते हैं। जिस देश में राष्ट्रपति महिला हो, देश पर शासन करनेवाले दल की अध्यक्ष महिला हो, लोकसभा की अध्यक्ष महिला हो, नेता विपक्ष महिला हो, देश के सबसे राज्य की मुख्यमंत्री महिला हो, उस देश में महिलाओं के प्रति समाज का नकारात्मक रवैया आसानी से समझ नहीं आ सकता!

ऐसी स्थिति में जब कोई सकारात्मक खबर सामने आती है, तो सुखद आश्चर्य ही नहीं होता, यह आशा भी बंधती है कि शायद दिन सुधरे! जिस खबर की बात मैं कर रहा हूं, वह अखबारों के मुख्य पृष्ठों की सुर्खी नहीं बनी, न ही सनसनी बेचनेवाले खबरिया चैनलों को यह खबर महत्वपूर्ण लगी थी- पर है यह खबर महत्वपूर्ण। खबर पुणे के हवेली तालुके के एक गांव नरहे की है। वहां की सरपंच ने अपना नाम बदल लिया है। वैसे जन्म के समय उसका नाम जयश्री रखा गया था, पर इस नाम से न उसे कभी पुकारा गया, न ही पहचाना गया। सब उसे ‘नकोशी’ नाम से जानते-पुकारते थे। मराठी के इस शब्द का अर्थ है: अचाहा या अचाही! सरपंच का कहना है, ‘‘बरसों तक मैं इसी नाम के साथ जीती रही हूं। मेरे माता-पिता बेटा चाहते थे और मैं उनकी चौथी संतान थी। वैसे मेरा नाम तो जयश्री रखा गया था। लेकिन गांववाले मुझे अक्सर चिढ़ाया करते थे – ‘ नको नको म्हणतात, कशाला जगतात’(नहीं, नहीं कहते कैसे जी रही हो)। परिवार में तीन और नकोशियों के जन्म के बाद ही मेरा भाई जनमा था।’’

नकोशी का जयश्री बनना सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक युवती ने स्थिति बदलने की घोषणा की है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि स्थिति अपनेआप नहीं बदली, कोशिश करके बदली गयी है- और इस कोशिश को जयश्री का समाज समर्थन व प्रशंसा के भाव से देख रहा है। यह शुभ लक्षण है।
सरपंच जयश्री ने अपना नाम चुपचाप नहीं बदला। एक भव्य समारोह में ‘तू आम्हाला हवीय’ (आप ही हमे चाहिए) की जय-जयकार के बीच बदला था। ‘कशाला जगतात’ से ‘हवीय’ तक की यह यात्रा एक बदलाव की परिचायक है, जिसका स्वागत होना चाहिए। पुणे जिला परिषद और पंचायत समिति द्वारा आयोजित इस नामांतरण समारोह में जब जयश्री ने अपनी कथा श्रोताओं को सुनायी तो कइयों का आंखें भींग गयी थीं। यही नहीं इसी के साथ वहां उपस्थित पच्चीस अन्य नकोशियों ने हाथ खड़ा करके कहा था: हम भी अपना नाम बदलना चाहती हैं!

बात सिर्फ नाम बदलने की नहीं है – बात व्यक्ति की, समाज की मानसिकता बदलने की है। जयश्री ने इस बदलाव का एक रास्ता दिखाया है; मगर इस राह पर चलना आसान नहीं है। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले इसी पुणे जिले में 2011 की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार 0-6 वर्ष के बच्चों में एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या सिर्फ 883 है। जबकि सन् 2001 में यह संख्या 913 थी! कुछ जिलो में तो लड़कियों की यह संख्या 850 से भी नीचे पहुंच गयी है! यह स्थिति चिंताजनक होने के साथ शर्मनाक भी है।

महाराष्ट्र अकेला ऐसा राष्ट्र नहीं है, जहां बेटों और बेटियों में यह आपराधिक भेद-भाव होता है। कुल मिलाकर सारे देश की यही कहानी है। सोच में बदलाव आता है, लेकिन यह बदालव कुछ टापुओं तक ही सीमित है। जबकि नकोशी से जयश्री तक की इस यात्रा में सारे देश को कदम-से-कदम मिलाकर जलने की जरूरत है।

जयश्री के नामांतर समारोह में कुछ और भी महत्वपूर्ण हुआ था: रेमा वानी नामक एक महिला का सम्मान किया गया था। इस महिला ने बेटी के जन्म के बाद वंध्यीकरण का आपरेशन कराने का साहस दिखाया था। वहां यह भी बताया गया कि हवेली पंचायत समिति ने ऐसी 45 युवतियों को सम्मानित किया था, जिन्होंने वंध्यीकरण कराया। यह बात मानसिकता में आ रहे बदलाव को गति देने की है, ताकतवर बनने की है ।

नकोशी को जयश्री बनने की प्रेरणा देनेवालों में एक महिला डाक्टर भी हैं, जो पिछले लगभग दस सालों से समाज में जागृति लाने के लिए कृत-संकल्प हैं। इस जागृति के लिए इस डाक्टर के सहयोगी विवाह के समय वर-वधू से सात की जगह आठ फेरे लेने के लिए कहते हैं- आठवां फेरा इस संकल्प का कि हम अपने जीवन में बेटी का स्वागत करेंगे।

यह आठवां फेरा बेटियों के संदर्भ में समाज की मानसिकता बदलने में एक निर्णायक दिशा देनेवाला है। समाज को नकोशी या धापू या संतोष वाली बीमार मानसिकता से उबरने की हर संभव कोशिश हमारे आज की आवश्यकता है और हमारे बेहतर कल की शर्त थी।

आपकी प्रतिक्रिया...