छत्रपति शिवाजी राज्याभिषेक हुआ

शाहजी राजे 1637 ई. के आसपास कर्नाटक की यात्रा पर थे। उस दौरान उन्होंने पुणे और मावल प्रांत के जागीर की जिम्मेदारी शिवाजी राजे और जीजाबाई को सौंप दी थी। साथ में अनुभवी प्रबंधक दादाजी कोंडदेव की नियुक्ति कर दी थी। दादाजी ने उजाड़ और निर्जन हो गये पुणे परगना को फिर से आबाद और समृद्ध करने के उपाय किये। बंजर जमीन पर सोने का हल चलाकर लोगों को फिर से खेती करने को प्रोत्साहित किया। इससे राजस्व में तेजी से वृद्धि होने लगी।

शिवाजी राजे को सिंहासन पर बिठा दिया गया था। उनकी उपस्थिति में ही जीजाबाई और दादाजी कचहरी का कामकाज निबटाते थे। इन सबका शिवाजी राजे के बालमन पर काफी सकारात्मक असर पड़ रहा था। यह सब देख कर धीरे-धीरे उनके मन में न्याय के प्रति आदर-भाव पनपने लगा। दूसरी तरफ दादाजी, शिवाजी को अपने साथ लेकर पूरे मावल में घूमते रहते थे। इस दौरान उनके चारों तरफ धीरे-धीरे किसानों के बच्चों का जमावड़ा बढ़ने लगा। इन लड़कों का एक ही काम होता था: हथियार चलाना, घुड़सवारी करना, जंगलों और पहाड़ों में घूमना-फिरना। ये लड़के शिवाजी के भक्त बन गये थे। उन्होंने मन में फैसला कर लिया था कि अब वे एकमात्र शिवाजी को ही अपना राजा मानेंगे। बादशाही को उखाड़ फेकेंगे, भले ही इसके लिए जान क्यों न देनी पड़े। शिवाजी उनसे कहा करते थे, ‘यहां पर स्वराज होना चाहिए। यही श्री (ईश्वर) की इच्छा है।’’

उस समय महाराष्ट्र में पांच शक्तियों की हुकूमत था: दिल्ली का मुगल बादशाह, बीजापुर का आदिलशाह, गोवा के फिरंगी, जंजीरा के सिद्दी और वर्द्धा व गोदावरी दोआब पर शासन करनेवाला कुतुबशाह। ये सभी अपने-अपने इलाकों की जनता पर जुल्म ढा रहे थे। सभी की अपनी-अपनी फौज थी, जो तोप, गोलाबारूद से लैस थी। इनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। मगर इनके मुकाबले शिवाजी राजे के पास था – पिता द्वारा प्रदत्त छोटी-सी जागीर ।

शिवाजी ने स्वराज्य की स्थापना की शुरुआत तोरणा किले पर कब्जे से की थी। इस किले की मरम्मत के दौरान परकोटे से ढेर सारी दौलत हाथ लगी थी। सबने महसूस किया कि इस धन का इस्तेमाल स्वराज्य की स्थापना पर खर्च किया जाना चाहिए- यही श्री की इच्छा है। देखते-देखते शिवाजी ने और कई इलाकों और किलों पर भी कब्जा कर लिया।

शिवाजी की विस्तार योजनाओं और गतिविधियों की खबर बीजापुर के सुल्तान के कानों तक पहुंच गयी थी। शिवाजी को सबक सिखाने के लिए वहां पर उनके पिता शहाजी राजे को गिरफ्तार कर लिया गय। इसी समय फत्त्ेाहखान को शिवाजी के खिलाफ हमला बोलने का आदेश दिया गया, जबकि बंगलौर पर फर्रादखान की नेतृत्ववाली सेना से हमला करवाया गया। गौरतलब है कि बंगलौर उस समय शाहजीराजे के बड़े बेटे और शिवाजी के बड़े और सगे भाई संभाजी राजे की देखरेख में था। लेकिन दोनों जगहों पर हमलावरों को भारी पछाड़ खानी पड़ी। आदिलशाह हिल गया। उसने बंगलौर और पुणे स्थित कोंडाणा किले को लेने के बाद शहाजी राजे को मुक्त कर दिया (16 मई 1649 ज्येष्ठ पूर्णिमा)। इसके पश्चात शिवाजी महाराज ने कुछ साल तक अपनी गतिविधियों पर रोक लगाये रखीं। फिर मौका मिलते ही मावल के घने जंगल में स्थित जावली के पहाड़ी प्रदेश पर अपना कब्जा जमा लिया। यही पर महाबलेश्वर में प्रतापपढ़ नामक एक नये किले का निर्माण कराया।

शिवाजी महाराज ने अपनी राजधानी को राजगढ़ स्थानांतरित कर लिया और अपना विजय-अभियान का रुख कोंकण की तरफ कर दिया। इस दौरान उत्तरी और दक्षिणी कोंकण को अपने स्वराज्य का हिस्सा बना लिया। विजित इलाकों में सुवर्ण दुर्ग, विजय दुर्ग जैसे समुद्री किलों का निर्माण कराया। शिवाजी यह शुरू में समझ गये थे कि समुद्र पर अगर अपना रुतबा कायम करना है, तो उनके पास नौसेना का होना अनिवार्य है। इसी क्रम में जलयान के निर्माण के लिए कल्याण में एक कारखाना खोला गया।

शिवाजी के विजय अभियान की गाथा बीजापुर तक पहुंच चुकी थी। अब की बार अफजल खान के नेतृत्व में एक विशाल सेना को बीजापुर से शिवाजी के खिलाफ रवाना किया गया। अफजल खान ने चलते समय खूब डींग हांकी और कसम खाते हुए कहा कि ‘मैं शिवाजी को पकड़के लाऊंगा।’ शिवाजी ने डरने का नाटक करते हुए यह कहकर उसके अहंकार को और हवा दी: ‘आप मेरे पिता के समान हैं। आपका पराक्रम, आपका रौब, आपकी ताकत से मैं वाकिफ हूं। मेरे अपराध बहुत बड़े हैं।’ एक तरफ अफजल खान को उन्होंने अपनी बातों भरमाया तो दूसरी तरफ उनके दूत गोपीनाथ पंत ने अफजल खान को जावली के घने जंगल और पहाड़ी प्रदेश में आने को मजबूर कर दिया। इस तरह अपनी पूरी तैयारी और सुनियोजित योजना के अनुसार अफजल का काम तमाम कर दिया। अफजल की सेना से जिन लोगों न शिवाजी की शरण में आने की ख्वाहिश जताई उनका स्वागत किया गया या फिर छोड़ दिया गया।

अगले 15 दिन के अंदर कोल्हापुर तक का इलाका स्वराज्य का हिस्सा बन चुका था। अफजल खान के बेटे फाजल खान ने अपने पिता के मारे जाने का बदला लेने के लिए 10 हजार फौज के साथ शिवाजी महाराज की पांच हजारी की सेना के खिलाफ अभियान छेड़ा, मगर बुरी तरह परास्त होकर भाग खड़ा हुआ। इसके बाद 35 हजार की फौज के साथ बीजापुर से सिद्दी जौहर रवाना हुआ। महाराज ने उसे स्वराज्य की सीमा पर ही रोकने का फैसला किया। शिवाजी महाराज स्वयं कोल्हापुर के नजदीक पन्हालगढ़ की तरफ रवाना हो गये चैत्र शुद्ध प्रतिपदा, 2 मार्च 1660)।
सिद्दी जौहर ने पन्हालगढ़ को चारों तरफ से घेर लिया था। इसके अलावा उसने सूर्यराव सुर्वे और जसवंत राव पलवणीकर को 20-21 कोस की दूरी पर स्थित विशाल गढ़ की घेरेबंदी करने के लिए भेजा दिया था। दूसरी तरफ औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खान को एक बड़ी फौज के साथ स्वराज पर हमला करने के लिए भेजा। उसकी फौज में एक लाख सैनिक, तोपखाने, हाथी-घोड़े और ऊंट थे (28 जनवरी 1660ई0)। शाइस्ता खान ने 3 मार्च 1660 को स्वराज में कदम रखा।

महाराज को पन्हालगढ़ के घेरे से बाहर निकालने की सारी कोशिशें नाकाम होती जा रही थीं। आषाढ़ का महीना शुरू हो गया था। महाराज को घेरेबंदी में चार महीना गुजर चुके थे। यहां से निकलने के लिए उन्होंने एक बड़ा दाव खेला। उनके दूत गंगाधर पंत सिद्दी जौहर की छावनी पहुंचे और कहा कि ‘महाराज आपकी शरण में आ रहे हैं।’ इस बात से उन्होंने सिद्दी जौहर और उसकी 35 हजार सेना को भरमाये रखा। फिर उसी दिन रात को (आषाढ़ पूर्णिमा, गुरुवार, दिनांक 12 जुलाई 1660) 10 बजे के आसपास मूसलाधार बारिस में छह सौ लोगों के साथ पालकी मैं बैठकर सिद्दी जौहर की घेरेबंदी से बाहर विशालगढ़ की तरफ निकल गये। गौरतलब है कि जौहर विशालगढ़ पर भी घेरा डलवा रखा था। सिद्दी जौहर को जैसे ही शिवाजी महाराज के निकल जाने की खबर हुई उसने पिछा करने का अपने सैनिकों को आदेश दिया। शिवाजी महाराज पत्थरों, गड्ढों, झाड़-झंखाड़ों, घुटने तक के कीचड़, नदी-नालों और जंगली रास्तों से तेजी से बच कर निकल भागने की कोशिश कर रहे थे। शत्रु के घुड़सवार सैनिक पीछा कर रहे थे। इसी दौरान एक घाटी में बाजी प्रभू के नेतृत्व में हिरडस मावल के 300 लड़ाकों ने शिवाजी महाराज के विशालगढ़ पहुंचने तक छह घंटे तक 3 हजार लड़ाकों वाली शत्रु सेना को दर्रे में उलझाये रखा। बाजी प्रभू की इस दौरान जान चली गयी। आखिरकार शिवाजी महाराज 21 घंटे के बाद विशाल गढ़ सुरक्षित पहुंच गये।
शाइस्ता खान को चाकण स्थित एक मामूली से किले पर कब्जा करने में 55 दिन लग गये। इस किले में सिर्फ 300 मराठे थे, जबकि शाइस्ता खान की फौज में 22 हजार सैनिक थे। उसका एक सरदार कारतलब खान लोनावाला की पहाड़ी और जंगल के रास्ते कोंकण की ओर धावा मारने में जुटा था। लेकिन शिवाजी महाराज ने घाटी में ही उसको धर दबोचा और उसके शस्त्र और सारे साजो-सामान छीन कर निहत्था कर छोड़ दिया।

शाइस्ता खान का एक शेखीबाज सरदार था नामदार खान। इसने खान के सामने डींग मारी थी कि उसको एक बड़ी सेना मुहैया करायी जाये तो वह शिवाजी को पकड़ लेगा। इसी को शिवाजी ने रात में उस समय छापा मारकर भाग खड़े होने को मजबूर कर दिया, जब वह कल्याण में एक पहाड़ी की छावनी में बैठा हुआ था।

शाइस्ता खान पुणे में शिवाजी महाराज के लाल महल में तीन साल से जमा हुआ था। उसके पास एक लाख की विशाल फौज थी। इसके बावजूद शिवाजी ने मध्य रात्रि को अपने 400 लड़ाकों के साथ लाल महल पर हमला कर दिया (6 अप्रैल 1663)। जो भी हाथ लगा मारा गया। शाइस्ता खान के 54 आदमी मारे गये। उसकी दो औरतों, एक पुत्र के अलावा एक जवाई भी मारा गया। अन्य कई घायल हो गये। खुद शाइस्ता खान ‘दुश्मन दुश्मन’ चिल्लाते हुए महल छोड़कर भाग खड़ा हुआ। शिवाजी महाराज ने उसकी हथेली पर वार कर दिया। इस दौरान उसे अपनी तीन उंगलियां गवांनी पड़ीं।
तीन साल की अवधि में शाइस्ता खान ने स्वराज्य में जो बरबादी का आलम लाया था, उसकी भरपाई शिवाजी महाराज ने मुगल साम्राज्य के महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र सूरत को लूट करके किया था। एक खास बात यह रही कि इस दौरान चांदी, हीरे, मोतियों को लूटने के अलावा और किसी तरह की हानि नहीं पहुंचायी।

औरंगजेब खुद महाराष्ट्र में मुगल सैनिक कार्रवाई का नेतृत्व करना चाहता था, लेकिन शिवाजी ने आदिलशाह और मुगल सरदारों की जो हालत कर रखी थी, उससे वह डर गया था। वह सोचता था कि अगर उसकी भी वही दुर्दशा हुई तो मुगल सल्तनत की साख खाक में मिल जायेगी। इसलिए उसने अबकी बार मिर्जा राजे जयसिंह और दिलेरखान को विशाल सेना के साथ रवाना किया। इन सबने स्वराज्य में भीषण बरबादी लायी। इस दौरान दिलेरखान का साबका शिवाजी के दिलेर सरदार मुरारबाजी देशपांडे से पड़ा। इस सरदार के पराक्रम से वह इतना चकित हुआ कि उसके मुंह से बेशाख्ता निकल पड़ा – ‘या खुदा तूने ये कैसा आदमी पैदा किया ।’

शिवाजी ने मिर्जा राजे के साथ एक संधि की, जिसके अनुसार उन्हें बीजापुर हमले में मदद करनी थी। लेकिन इसमें मिर्जा राजा को पराभव हाथ लगी। मिर्जा राजा ने शिवाजी महाराज को सलाह दी थी कि वे औरंगजेब से आगरा में मिले। महाराज आगरा पहुंचे। लेकिन यहां पर दरबार में हुए अपने अपमान को बरदाश्त नहीं कर पाये और खुले दरबार में अपना गुस्सा जाहिर कर दिया और दरबार से बाहर चले आये। जो होना था वही हुआ – औरंगजेब ने उनको कैद कर लिया (29 मई 1666 के आसपास)। महाराज ने बीमार होने का नाटक किया। तबीयत ठीक होने के लिए गरीबों, बैरागियों, फकीरों का आशीर्वाद पाने के लिए बड़े-बड़े पिटारों में मिठाइयां बाहर भिजवाना शुरू कर दिया। एक दिन वह भी दिन आ गया, जब उन्हीं पिटारों में बैठ कर शिवाजी महाराजा और उनके पुत्र संभाजी औरंगजेब की कैद से निकल भागे (17 अगस्त 1666 ई0)। महाराज अपने 350 लोगों के साथ औरंगजेब की पहुंच से दूर जा चुके थे। वह शिवाजी महाराज के दिलेरी से इतना डर गया कि तीन दिनों तक दरबार में अपना मुंह तक नहीं दिखाया। अपने महल के बाहर सख्त पहरा बिठा दिया।

आगरा से लौटने के बाद शिवाजी महाराज ने दो साल तक आराम किया। फिर वे मुगलों पर टूट पड़े। पचास-पचास से साठ-साठ हजार मुगल सेनाओं को उन्होंने धूल चटाई। शिवाजी महाराज का नाम हिदुस्तान के कोने-कोने में गूंजने लगा। काशी के एक प्रकांड पंडित ने उनका नाम सुना तो सीधे महाराष्ट्र पहुंच गये। उनका नाम था – गागा भट्ट यानी सभी विद्याओं का स्वामी!

गागाभट्ट पैठण निवासी महाराष्ट्रियन ऋग्वेदी ब्राह्मण थे। उनके दादा के परदादा काशी पहुंचे और फिर वहीं बस गये – तब से यह खानदान वहीं का होकर रह गया था। शिवाजी महाराज ने नासिक से अपना उपाध्याय भेजकर बहुत सम्मान देते हुए उन्हें रायगढ़ बुलवाया। गागाभट्ट का मानना था कि एक तरफ मुसलमान बदाशाह हैं, जो कि तख्त पर बैठते हैं और छत्र धारण करते हैं, दूसरी शिवाजी महाराज हैं, जिन्होंने चार-चार पातशाहियों को जमींदोज कर अपना स्वराज्य, धर्मराज्य, रामराज्य और शिवराज्य का निर्माण किया, फिर भी इस महान पुरुष के पास अपना सिंहासन नहीं! अपना राज्याभिषेक नहीं कराया। छत्र सिहासन के बगैर सच्चे राज्य का निर्माण नहीं होता। अड़ोस-पड़ोस के राज्य क्या, राज्य की प्रजा भी उसको वास्तविक रूप से राजा नहीं मानती। इसलिए शिवाजी का राज्याभिषेक होना जरूरी है। अपनी इस इच्छा से उन्होंने जीजाबाई, शिवाजी महाराज और उनके अधिकारियों को अवगत कराया। उनकी बात सभी ने मान ली। इस तर गागाभट्ट की देखरेख में राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हो गयी।

राजदरबार का निर्माण किया गया। 32 मन के सोने से छत्र और राज सिंहासन का निर्माण किया गया। श्रीनृपशालिवाहन शक 1596, आनंदनाम संवत्सर ज्येष्ठ शुद्ध 13 शनिवार, सूर्योदय पूर्वं तीन घटका महाराज सिंहासन पर बैठे (6 जून 1674)। महाराज ने इस अवसर पर सबको कुछ-न-कुछ दिया। पूरे राज्याभिषेक पर 50 लाख रुपये का खर्च आया।

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