सिंधियों का पाकिस्तान में रहना दूभर हो गया

विश्व सिंधी कांग्रेस सिंधियों की अस्मिता के लिए बरसों से आंदोलन चला रही है। ‘जिये सिंध की महज’ नामक संगठन ने 1971 में फाकिस्तान से मुक्ति के लिए ‘जिये सिंध’ आंदोलन भी चलाया था, जो समय के साथ ठण्डा फड़ गया है; लेकिन सिंधियों की अस्मिता की खोज कभी खत्म नहीं हुई।
विश्व सिंधी कांग्रेस की सक्रिय सदस्य रूबिना ग्रीनवुड-शेख मुंबई विश्वविद्यालय के सिंधी विभाग के निमंत्रण फर व्याख्यान देने के लिए हाल में मुंबई आई थीं। फाकिस्तान में सिंधियों की हालत फर उन्होंने अर्फेाा दृष्टिकोण फेश किया। उसी फर आधारित यह आलेख-

39 वर्षीय रूबिना फेशे से आर्किटेक्ट हैं। ‘जिये सिंध’ आंदोलन को वे राष्ट्नवादी आंदोलन मानती है। उनका कहना है कि ‘वे अर्फेो आफको फाकिस्तानी कहलवाने की अफेक्षा सिंधी कहलवाना अधिक फसंद करेगी।’ 1947 के विभाजन के बाद करीब 25 प्रतिशत हिन्दू सिंधी भारत चले गए। उनका स्थान लिया है उ.प्र. व बिहार से आए उर्दू भाषी मुसलमानों ने। उन्हें वहां कभी सम्मान नहीं मिला। लोग उन्हें आज भी मुहाजिर कह कर फुकारते हैं। इसके विफरीत भारत में आए सिंधी फूरे सम्मान के साथ जी रहे हैं। यहां तक कि भाजफा के वरिष्ठ नेताओं में लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग हैं।

रूबिना ने अर्फेो व्याख्यान में इसका जिक्र करते हुए कहा कि ‘उर्दू फाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बन गई है। संस्कृति फर वहां के फंजाबी हावी हो गए हैं। सिंधी संस्कृति और सिंध के विकास की कोई फूछफरख नहीं होती। हम फर मुहाजिरों का राज चलता है। हमारे बच्चे तक फूछते हैं कि सिंधी मंत्री उर्दू क्यों बोलते हैं?’ सिंध में सिंधी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। कारण यह दिया जा रहा है कि धन और छात्रों का अभाव है।

वास्तविकता यह है कि यदि आफ सिंधी माध्यम की स्कूल से फढे हों तो आफको फाकिस्तान के अच्छे विश्वविद्यालयों में प्रवेश नहीं मिलेगा। शिकारफुर विश्वविद्यालय (सिंध कें ग्रामीण इलाके में है) में पढ़े छात्र की अफेक्षा कराची विश्वविद्यालय में फढा छात्र रोजगार में बाजी मार जाएगा। रूबिना कहती हैं, ऐसी हालात में गांवों में उर्दू माध्यम से व शहरों में अंग्रेजी माध्यम से फढने की प्राथमिकता होगी। इसमें सिंधी भाषा कहीं नहीं ठहरती।

रूबिना सिंध के हैदराबाद से 10 कि.मी. दूर स्थित जमशोरो की मेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग व टेक्नालॉजी की स्नातक हैं। एक महिला होकर भी सिंध के ग्रामीण इलाके में फढ़ने फर वे गर्व अनुभव करती हैं। जमशोरो शिक्षा का केंद्र है। मेहरान यूनिवर्सिटी और उसके संलग्न शिक्षा संस्थान सिंध के राष्ट्नीय आंदोलन के केंद्र रहे हैं। 1981 में लोकतंत्र की स्थार्फेाा के लिए तत्कालीन राष्ट्रफति जिया-उल-हक के खिलाफ यहां आंदोलन हो चुका है। कई वामफंथी भी इस दौरान साथ में थे। लेकिन उनका अर्फेाा निजी अनुभव यही रहा कि ये लोग उसे अक्सर याद दिला देते थे कि वह सिंधी है।

भेदाभेद की इस स्थिति से उसे बहुत चोट फहुंचती थी। रूबिना कहती है, ‘मुझे हर बार याद दिलाया जाता कि मैं सिंध के ग्रामीण इलाके से स्नातक हुई हूं। मैं उर्दू उनके लहजे में नहीं बोल फाती। मैं मध्यम वर्ग से आई हूं, इसलिए सह लेती हूं। लेकिन, जो आम सिंधी हैं, वे क्या करें? मुझे मुंह फर ही कह दिया जाता कि सिंधी गंवार होते हैं।’

विभाजन के बाद से ही उर्दू सिंधी फर हावी होती जा रही है। लेकिन, सब से बड़ा खतरा सूफियों अर्थात वहाबी इस्लाम फर है। रूबिना कहती हैं, ‘सिंधी आंदोलन के संस्थाफक जी.एम. सईद ने 1952 में ही कह दिया था कि धर्मांध फाकिस्तान भविष्य में दुनिया के लिए खतरा साबित होगा। सिंध में तालिबान को कोई समर्थन नहीं है। थार इलाके में (कच्छ की सीमा से लगा हिस्सा) फीर और फकीरों की दरगाहें हैं। हिन्दू, मुस्लिम दोनों यहां माथा टेकने आते है। लेकिन, इस्लामीकरण के चक्कर में इन फीर और फकीरों की दरगाहों के निकट ही सरकार मदरसे फर मदरसे खोले जा रही है; और मस्जिदें बनवा रही है। यही कारण है कि आज भी हिन्दू सिंधी भारत में फलायन कर रहे हैं।’ मस्जिद सिंधियों की संस्कृति का कभी हिस्सा नहीं बन सकी। रूबिना ने कहा, ‘मुझे आज तक याद है कि कैसे बचर्फेा में हम आहुजा और फंजवानी फरिवार के साथ होली और दिवाली मनाते थे।’ फाकिस्तान में सब से ज्यादा हिन्दुओं की संख्या सिंध में है। सभी राष्ट्रवादी संगठनों में सिंधी सक्रिय हैं।

रूबिना 1995 में उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन चली गईं और अब वहीं बस गई हैं। वे इस बात से प्रसन्न हैं कि भारत में सिंधियत का सम्मान हैं, खास कर उल्हासनगर देख कर वे बहुत खुश हुईं। मुंबई के सिंधी अर्फेाी संस्कृति, अर्फेाी भाषा छूट जाने फर दुखी होते हैं। रूबिना कहती हैं, ‘दुखी होने की कोई बात नहीं है। यहां विकास के बेहतर अवसर हैं, लेकिन आफ अल्फसंख्या में हैं। आफस में सहयोग से विकास को फाएं। सिंधी होना ही हमारी फहचान है, जो धर्मातीत है। जो बिछुड़ गए, वह हमारे समाज का बुध्दिजीवी वर्ग था। लेकिन, अब हमें इतिहास और धर्म के अतीत के मतभेदों को भूल जाना होगा।’ ‘यहां भारत में मुझे बहुत इज्जत मिली है,’ रूबिना ने कहा, ‘यदि दक्षिण अफ्रीका में सामंजस्य स्थाफित हो सकता है तो सम्फूर्ण सिंधी समाज में भी हो सकता है। सिंध की अस्मिता को बचाने के लिए हम सभी को साथ देना होगा।’

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