शगुन शगुन बरखा बरसे

मध्य युग में उत्तरी भारत के किसानों के सर्वप्रिय मौसमी विज्ञानी कवि घाघ और भड्डरी थे। आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण जनों में घाघ की तथा पंजाब और राजस्थान में भड्डरी की कहावतें प्रचलित हैं।

दरअसल सदियों से हमारे गांवों में कृषि कहावतों की परंपरा चली आ रही है। इन कहावतों पर चल कर और उनके ज्ञान के भरोसे ही हमारे किसान सदियों से खेती करते चले आ रहे हैं। आज भी घाघ और भड्डरी की कहावतें उत्तर भारत के किसानों की जुबान पर हैं। ये कहावतें घर-घर में लोगों को याद हैं। समय-समय पर इन्हें बाप-बेटे से और दादा अपने पोते से कहता है। इस तरह बिना पढ़े-लिखे ही इस ज्ञान को गांव में लोग याद करते आये हैं।
कब बरसात आयेगी, कब सूख पड़ेगा, आकाश में किस नक्षत्र के कहां होने से कैसा मौसम रहेगा – यह सभी ज्ञान सदियों से किसानों को घाघ और भड्डरी से ही मिलता रहा है। मध्य युग के ये दोनों ही लोक मौसम विज्ञानी आम किसानों द्वारा बरसात और खेती के विशेषज्ञ माने जाते रहे हैं।
बरसात के बारे में घाघ की कहावतों के कुछ नमूने देखिए :-

पूरब धुनहीं पच्छिम भान
घाघ कहे बरखा नियरान

(पूर्व दिशा में इंद्रधनुष दिखाई दे और उसी समय सूर्य पश्चिम में चले गये हों यानी संध्या के समय इंद्रधनुष पड़े तो यह समझना चाहिए कि वर्षा समीप ही है ।)

छिन पुरवइया, छिन पछियांव ।
छिन छिन बहैं, बबूला बांव ॥
बादर ऊपर बादल घावै ।
कहैं घाघ पानी बरसावै ॥

(जब क्षण भर के लिए पूर्वी हवा चले और दूसरे ही क्षण पछुआ हवा चलने लगे, बार-बार बवंडर उठने लगे तथा बादल के ऊपर बादल दौड़ने लगे, तो यह समझना चाहिए कि अब पानी बरसेगा।)

उत्तर चमके बिजुरी, पूरब बहती बाऊ ।
घाघ कहे सुन घाघिनी बरघा भीतर लाऊ॥

(जब उत्तर दिशा में बिजली चमके और पुरवइया हवा बहने लगे, बैलों को भीतर बांध देना चाहिए।

वायु में वायु घुस जाय।
घाघ कहैं जल कहां समाय॥

(यदि हवा में हवा घुसी जा रही हो, तो बहुत अधिक वर्षा होती है।)

बरसात के बारे में घाघ की तरह भड्डरी की कहावते भी हैं :-

तीतरी, बरनी बादरी, रहै गगन पर छाय ।
डंक कहै सुन भड्डरी, बिन बरसै न जाय॥

(जब तीतर के रंगवाली लहरदार बदली आकाश पर छा रही हो, तो डंके की चोट से कहा जायेगा कि वह बिना बरसे नहीं जायेगी।)

सुक्करवारी बादरी, रहै सनीचर छाय।
यों भाखैं भड्डरी, बिन बरसे ना जाये॥

(शुक्रवार को आकाश में छानेवाली बदली, यदि शनिवार को भी छायी रहे, तो वह बरसे बिना नहीं जाती।)

बरसात की तरह सूखे के बारे में भी घाघ ने कहावते कही हैं :-

दिन को बद्दर, रात निबद्दर।
बह पुरविया छब्बर छब्बर॥
घाघ कहै कछु होनी होई।
कुआं क पानी धोबी धोई॥

(यदि दिन में बादल छाए हों और रात में आसमान साफ हो तो धोबी को कुएं के पानी से कपड़ा धोना पड़ेगा, यानी सूखा पड़ेगा।)

दिन में गरमी रात में ओस।
कहै घाघ बरखा सौ कोस॥

(यदि दिन में गरमी और रात में ओस पड़े तो यह समझना चाहिए कि वर्षा सौ कोस दूर है।)

कवि घाघ कन्नौज के रहनेवाले कहे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म 1696 ई. में हुआ था। हिंदी के विख्यात कवि रामनरेश त्रिपाठी ने घाघ के संबंध में काफी छानबीन के बाद इन्हें अकबर का समकालीन माना है। इनका यह भी कहना है कि घाघ ने बादशाह अकबर के नाम पर अकबराबाद का सराय घाघ नाम का गाँव बसाया था, जो आज भी है और ‘सराय बाघ’ या ‘चौधरी घाघ’ नाम से जाना जाता है।

वैसे यह जानना रोचक होगा कि हिंदी साहित्य कोश भाग-दो में बताया गया है कि असम तथा उड़ीसा में डाक नाम के लोक-साहित्य में वे प्रसिद्ध हैं। असमी में तो डाक के ‘बचन’ का संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। इनके छंद भी घाघ जैसे हैं। अधिकांश तो ऐसे हैं, जिनको हिंदी छंदों का असमी रूपांतर कहा जाता है। उड़ीसा के डाक कवि के बारे में भी यही बात है। तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ये तीनों एक ही कवि हैं। बिहार और राजस्थान में घाघ ‘डाक’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इससे भी डाक और घाघ या उक्त तीनों कवियों को एक मानने को बल मिलता है।

मजे की बात है कि उड़ीसा वाले इनका जन्मस्थान उड़ीसा में और असम वाले असम में और राजस्थानवाले राजस्थान में मानते हैं। ऐसे में यह निर्धारित कर पाना काफी मुश्किल है कि घाघ मूलत: कन्नौज, राजस्थान, उड़ीसा और असम में से कहां के थे तथा मूलत: किस भाषा के कवि थे।
घाघ के बारे में यह निश्चयपूर्वक जरूर कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में घाघ के खेती विषयक तथा अन्य व्यावहारिक छंद मिलते हैं। इनके बहुत से छंद तो लोकोक्ति बन चुके हैं। गांव-देहात के करोड़ों किसानों के लिए वे विज्ञान के जीते-जागते सूत्र हैं।

घाघ के छंदों (कहावतों) की कोई पांडुलिपि नहीं मिलती। लोगों से सुन सुनकर बहुत से लोगों ने इन्हें संग्रहित किया है, जो ‘घाघ और भड्डरी’ नाम से (हिंदुस्तान अकादमी, इलाहाबाद, 1931) छप चुका है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में घाघ की गणना फुटकर पद्य कहनेवालों में की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि हम इनको कवि कहना ठीक नहीं समझते। शुक्लजी ने घाघ को सूक्तिकार कहना उचित समझा है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामशंकर शुक्ल रसाल आदि हिंदी साहित्य के प्राय: सभी इतिहासकारों ने घाघ को हिंदी का लोककवि माना है।

नागरी प्रचारणी सभा द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य का वृहद इतिहास‡ सप्तम भाग’ के अनुसार जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में घाघ की कहावतें प्रचलित हैं, वैसे ही राजस्थान व पंजाब में भड्डरी की कहावतें। इनकी जीवनी अभी तक अविदित है। विदित इतना ही है कि ये एक राजस्थानी ज्योतिषी थे तथा कृषि के विशेषज्ञ। इनकी दो सौ के लगभग कहावतें प्रकाशित हैं। इन कहावतों के विषय वर्षा, सुकाल और अकाल आदि हैं। ये कहावतें दोहा, चौपाई आदि छंदों में हैं।

आज के जमाने में घाघ और भड्डरी की मौसम संबंधी इन कहावतों की व्यावहारिक जीवन में प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना स्वाभाविक है। लेकिन इस संदर्भ में यह सवाल भी जरूर पूछा जाना चाहिए कि हमारे मौसम विभाग की आज की भविष्यवाणियों की क्या प्रामाणिकता है? प्राय: यह जिस दिन मूसलाधार बारिश की भविष्यवाणी करता है, उस दिन धूप खिली रहती है। और वह जिस दिन धूप चमकने की भविष्यवाणी करता है, उस दिन मूसलाधार बरसात होती है। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि घाघ और भड्डरी की इन कहावतों का आज के जीवन में क्या महत्व है ? शायद जब तक मौसम विज्ञान और उसके यंत्र गांव-गांव नहीं पहुंचेंगे तब तक गांवों में ये कहावतें चलती रहेंगी और हमारे किसान इनमें विश्वास और रुचि रखते हुए खेती करते रहेंगे।

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