गुड़ोंं को पनाह देती राजनीति

गैंगस्टर विकास दुबे जैसे आस्तीन के सांप हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं, जिसकी पीड़ा आज हमारा समाज भुगत रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार व केंद्र की मोदी सरकार स्पष्ट बहुमत से सत्ता में हैं। राजनीतिक गठबंधन की कोई बेड़ियां उनके पैरों में नहीं है। क्या ऐसे में राजनीति का अपराधीकरण रोकने में वे वास्तविक कदम उठाएँगे?

राजनीति का अपराधीकरण और अपराधीकरण की राजनीति यह मुद्दा अब फिर से चर्चा में है। सही मायने में राजनीति का अपराधीकरण यह एक बड़ी सामाजिक और राजनैतिक समस्या है। दिन-ब-दिन देश में आपराधिक समस्या कितनी उग्र होती जा रही है, इस बात का एहसास उत्तर प्रदेश के कानपुर में कुख्यात अपराधी विकास दुबे द्वारा की गई आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की भयानक घटना से होता है। इस घटना के बाद संपूर्ण देश में बढ़ते अपराध और अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस पर चिंता है। देश को फिर एक बार अपराधीकरण पर अंकुश बिठाने के लिए गहराई से ध्यान देने की आवश्यकता है। कुख्यात अपराधी विकास दुबे को गिरफ्तार करने की कोशिश में आठ पुलिसकर्मी गुंड़ों के खूखार हमले में मारे जाते हैं। यह घटना कानून, शासन और समाज पर बड़ा प्रश्न उठाती है। अपराधियों का हौसला कितना बुलंद है और कानून व्यवस्था अपराधियों पर कोई असर नहीं कर रही है? इस तरह का परिदृश्य निर्माण हो रहा है। राजनीति के साथ अपराध का गठजोड़ कितना मजबूत है?

कानपुर की इस घटना के कारण सम्पूर्ण भारत का जनमानस भीतर तक हिल गया है। भारतीय जनमानस के मन में सवाल निर्माण हो रहे हैं, विकास दुबे जैसे माफिया क्या एक रात खड़े होते हैं? इन जैसे गुंड़ों में इतना अनैतिक साहस कैसे आ जाता है? क्या ये खूंखार अपराधी किसी दूसरी दुनिया से अपनी अनैतिक शक्ति निर्माण करके यहां आते हैं? यह विकास दुबे इनामी बदमाश था, फिर भी उसके पास अपना आपराधिक साम्राज्य चलाने का नेटवर्क किस प्रकार से निर्माण हुआ था? पुलिस छापा मारने उसके घर जाने वाली थी, छापे के पहले ही उसे होने वाले पुलिस कार्रवाई की खबर कैसे लगती है? इसी बात से पता चलता है कि हमारी कानून व्यवस्था कितनी कमजोर है और राजनीति के साथ अपराध का गठजोड़ भी कितना मजबूत है।

देश को हिलाकर रखने वाली इस घटना ने यह साबित कर दिया कि अपराधियों के हाथ इतने पहुंचे होते हैं कि सत्ता भी उसके सामने बौनी लगने लगती है। विकास दुबे कितना शातिर और पहुंचा हुआ अपराधी है इसका अंदाजा भी इसी बात से लगता है। 8 पुलिस वालों की हत्या के कई दिन बाद भी उसकी गिरफ्तारी के लिए सारा उत्तर प्रदेश पुलिस महकमा काम पर लगा था। पर यह आलेख लिखते समय ही अभी अभी खबर आई है कि कुख्यात अपराधी विकास दुबे मध्य प्रदेश के उज्जैन में पकडा गया है। अब सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस की जब 100 कम्पनियां काम कर रही थीं तब यह गुंड़ा उत्तर प्रदेश की सीमा लांघकर कानपुर से लगभग 10 घंटे की दूरी पर मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर तक कैसे पहुच गया?

ऐसा बताया जा रहा है कि विकास दुबे अपराध जगत और राजनीति में सक्रिय था। इस बात से कानून, शासन और समाज पर भी कई बड़े सवाल उपस्थित होते हैं। विकास दुबे जैसा अपराधी पुलिस थाने में घुसकर पुलिस की मौजूदगी में 2001 में उत्तर प्रदेश राज्य के मंत्री संतोष शुक्ला की हत्या करता है। उसके बाद भी पुलिस महकमा उसे दबोच नहीं पाया था। वह चुनाव लड़ता है और चुनाव जीतता भी है। ऐसे अपराधी को चुनाव जीतने के लिए आवश्यक जन समर्थन कैसे मिलता है? यह हमारे कानून और समाज व्यवस्था की एक विडंबना है। हमारी व्यवस्था की खामियों का बेहद शर्मनाक प्रमाण है यह है कि वह जेल में रहते हुए भी अपने गिरोह को चलाता है। अपनी अपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहता है। आज उत्तर प्रदेश राज्य ने कानपुर में इस कुख्यात अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश में आठ पुलिस कर्मी खोए हुए हैं। दर्दनाक और खूंखार घटना के बाद पुलिस ने जिस प्रकार से कठोर कार्रवाई का प्रारंभ किया काश यह कार्रवाई 20 साल पहले की होती तो आज कुछ अलग चित्र निर्माण होता।

राजनीति का अपराधीकरण यह अब ज्यादा चर्चा का विषय नहीं रहा है। क्योंकि ऐसा कोई सियासी दल नहीं है जिसमें अपराधी व्यक्तित्व का दबदबा न रहा हो। समाजवादी पार्टी के साथ बसपा, भाजपा, कांग्रेस सभी राजनीतिक दलों में आपराधिक तत्वों की उठ-बैठ है। राजनीति में मिले भरपूर संरक्षण की वजह से गुंड़े अपनी अपपराधिक जमीन तैयार कर लेते हैं। शुरू शुरू में गुंड़ागर्दी कर समाज पर अपनी खौफ जमा लेते हैं। कारावास होने पर समाज में ही उनके संदर्भ में डर निर्माण होता है। जेल से जमानत पर छूटने के बाद अपने आप को जादा मजबूत और प्रतिष्ठित समझने लगता है। लोग उनसे डरने भी लगते हैं। लोगों के डर का फायदा उठाते हुए यह गुनाहगार दिन-ब-दिन अपना आपराधिक विस्तार बढ़ाते जाता है। गुनाहों के अनेक क्षेत्रों में अपना खौफ पैदा करता है। समाज में उसे प्रतिष्ठा मिलने लगती है।

गुंड़ागर्दी के कारण निर्माण हुए खौफ और अनैतिक तरीकों से कमाए पैसे के बल पर वह राजनीति में प्रवेश करता है और जीत भी हासिल कर लेता है। ऐसे बाहुबली लगभग सभी राजनीतिक दलों में हैं। कोई भी राजनीतिक दल अपवाद नहीं है। वर्तमान के भारत के राजनीतिक प्रांगण में इस प्रकार के अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह सर्वाधिक चिंता का विषय है। अपराधों का राजनीतिकरण करने की परंपरा बड़े धड़ल्ले से चल रहा है।
उत्तर प्रदेश और उसके बगल के राज्य बिहार में बाहुबली और राजनीति यह एक समीकरण बरसों से बन सा गया है।

मौहम्मद शहाबुद्दीन जैसे उम्र कैद की सजा पाने वाले बाहुबली जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद उसके जुलूस में दो-ढाई सौ वाहनों का होना, यह उस राज्य की कानून व्यवस्था के प्रति विश्वास घटाता है। जब हत्या, अपहरण और लूट जैसे बड़े अपराधों में लिप्त मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसा व्यक्ति चार बार जीतकर देश की संसद में जाकर बैठता है तब उस राज्य के जनमानस के संदर्भ में भी प्रश्न निर्माण होता है। स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति आंदोलन की विचारधारा से उभरे लालू प्रसाद यादव को शहाबुद्दीन जैसे अपराधियों को अपने पक्ष का नेता कहने से कोई संकोच और लज्जा भी नहीं होती है। भ्रष्टाचार के आरोप में लालू प्रसाद यादव वर्तमान में खुद कारावास की सीखचों में बंद है। क्या राजनीति के अपराधीकरण की वृद्धि से इन बातों का कोई संबंध है?

इस विषय पर चिंतन से यथार्थ सामने आता है। आज जिस प्रकार की राजनीति हो रही है, भ्रष्टाचार और दुराचार की खबरें वातावरण को दूषित कर रही है, समाज के राजनेता नीति शास्त्र को अस्वीकार करते हैं, केवल वोट बैंक की चिंता में लगे रहते हैं, गद्दी पाने या बचाने के लिए किसी भी प्रकार का साजिश करने के लिए राजनेता अपराधियों की मदद ले लेते हैं और अपराधी इसी माध्यम से राजनीति में अपना प्रवेश करते हैं। इस प्रकार आत्मकेंद्रित होते आज के सामाजिक दौर में विभिन्न प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं। अपराधी राजनीतिक आधार लेकर अपने आप को सफेदपोश बना रहे हैं। उसका कारण हम और हमारे नासमझ- स्वार्थी राजनीतिक व्यक्तित्व हैं।

प्रशासन का कार्य केवल अपने दायित्वों का निर्वहन करना इतना ही काफी नहीं है, बल्कि शिक्षा और नैतिक व्यवहार के माध्यम से समाज में एक सकारात्मक दिशा निर्माण करना यह भी है। कानपुर जैसी घटना हमारे लिए चिंता का विषय है। दूरदृष्टि के अभाव के कारण इस प्रकार की घटना देश में शहरों का नाम बदल कर आए दिन छोटे मोटे स्तर पर होती रहती है। आपराधिक घटनाओं की बढ़ोतरी रोकने के साथ हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाना होगा। यह अत्यंत आवश्यक हैं।

अपराधियों के मन में कानून का भय अवश्य रहना चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था इतनी जटिल और उबाऊ है कि अंजाम तक पहुंचाने में हमें कई वर्ष लग जाते हैं। हद तो इस बात की होती है ही अपील दर अपील निचली अदालत में ही 10 साल लग जाते हैं। इसी बीच अपराधी जमानत पर खुले आम घूमते हैं। 1997 में संसद में लगातार 6 दिन तक राजनीति और अपराधीकरण इस विषय पर सांसदों की बहस चली थी। राजनीति का आपराधिकरण एवं भ्रष्टाचार के विरोध में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने संसद में प्रस्ताव रखा था। वह प्रस्ताव सभी के सहमति से संसद में पारित हुआ था। संसद में इस प्रकार का बड़ा प्रस्ताव पारित करने के बाद भी अपराधी तत्व के लोग राजनीति में आते रहे। आज हर दल में कम से कम 10-20 से भी ज्यादा भयानक गुनाह जिनके पर दर्ज हैं, ऐसे नेता विधायक और सांसद के रूप में हमें दिखाई देते हैं। उस समय संसद में पारित किया हुआ यह प्रस्ताव सिर्फ संसद भवन में ही मर्यादित रहा है, यह बात स्पष्ट होती है।

राजनीतिक दल अपने- अपने दलों में अपराधी तत्वों को राजनीतिक नेतृत्व बहाल करने में एक-दूसरे से आगे रहने का अपना कर्तव्य निभाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों से जनप्रतिनिधियों से जुड़े हुए कानूनी मामले में 1 साल के भीतर फैसला सुनाने का आदेश दिया है। उम्मीद है कि राजनीति का अपराधीकरण रोकने में इससे काफी मदद मिलेगी। कोर्ट ने कहा है कि किसी विधायक या सांसद के खिलाफ अदालत से 1 साल के भीतर सुनवाई पूरी करके फैसला भी आ जाना चाहिए। अदालत में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। उसने यह भी कहा है कि अगर कारवाई 1 साल में पूरी नहीं होती तो संबंधित अदालत को इसका कारण बताना होगा और उसकी रिपोर्ट चीफ जस्टिस को देनी होगी। इस बात का राजनीतिक समीकरणों पर किस प्रकार से प्रभाव पड़ता है यह देखने की बात है।

सच्चाई यह है कि हमारे देश में न्याय प्रक्रिया की सुस्ती का फायदा आपराधिक पृष्ठभूमि के राजनेताओं ने उठाया है। राजनीतिक नेताओं ने यह कहकर बातों को हवा में उड़ा दिया है कि कोर्ट के दोषी करार देने तक वह दागी नही है। वह बेदाग है। कोर्ट की सुनवाई वर्षों चलती रहती है तब तक नेता अपनी मूछों पर ताव देकर अपना कार्यकाल पूरा भी कर लेते हैं। उसके बाद न्याय आने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है।

हमारे राजनीतिक दल चुनाव प्रणाली को सुधारने की बातें करते हैं, पर सच में वे इस बात के लिए गंभीर नहीं दिखाई देते, जो एक कड़वी सच्चाई है। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद दागी सांसदों की संख्या बढ़ती जा रही है। सिर्फ उत्तर प्रदेश राज्य के में 2017 के विधान सभा चुनाव में 402 विधायकों ने उन पर दर्ज आपराधिक मामलों का विवरण दिया था। सत्ताधारी भाजपा के 312 विधायकों में से 83 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। समाजवादी पार्टी के 47 में से 14 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बसपा के 19 में से 5 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। कांग्रेस के 7 विधायकों में से एक का आपराधिक रिकॉर्ड है।

अभी इस बात से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि राजनीति कितनी गंदी और बदबूदार हुई है। इस स्थिति को देखकर क्या हम यह आशा रख सकते हैं कि भारत देश की राजनीति अपराधीकरण से मुक्त होगी? इस स्थिति को देखते हुए महसूस हो रहा है कि हमारे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो गई है। आपराधिक तत्वों के नेताओं की सफाई के संदर्भ में किसी भी राजनीतिक दल को कोई भी दिलचस्पी नहीं है। अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का प्रस्ताव पिछले 16 बरस से चुनाव आयोग के पास पड़ा है। इस दौरान सरकार या विपक्षी दलों किसी ने भी इसे कानूनी जामा देने का प्रयास नहीं किया है। आत्मनिर्भर भारत और भारत विकास का सपना हम सभी भारतीय देख रहे हैं। इस सपने की ओर आगे बढ़ते हुए भारतीय राजनीति की गलियां भी हमें स्वच्छ करनी पड़ेगी। समाज और राष्ट्र के दीर्घकालीन हितों के संदर्भ में विचार करते हुए हमें सभी पक्ष की बुरी आदत को बदलना आवश्यक है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? प्रशासन, शासन, समाज और कानून को इन आपराधिक तत्वों के राजनीति में सफाई अभियान में हृदय से जुड़े बिना आपराधिक तत्वों से लोहा लेना संभव नहीं होगा।

हम रहबरों के साथ है
या रहजनों के साथ?
ए अनुभवी सपेरों!
जरा यह तो बता दो,
रहते हैं सांप किस तरह
चन्दन के साथ।

किसी कवि की ये पंक्तियां पढ़कर आज की सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का उत्तर मिलता है। क्योंकि सभी एक दूसरे का महिमामंडन निःसंकोच कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी जी की सरकार को केंद्र में और उत्तर प्रदेश राज्य सरकार को समाज ने पूर्ण बहुमत से चुनकर दिया है। मोदी सरकार के पैरों में राजनीतिक गठबंधन की कोई भी बेड़ियां नहीं हैं। क्या राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त और स्वच्छ बनाने का प्रयास देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के माध्यम से होगा? इस विषय पर भारत का जनमानस आंखें लगाए बैठा है। विकास दुबे जैसे आस्तीन के सांप हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं, जिसकी पीड़ा आज अपने देश का समाज आए दिन भुगत रहा है।

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