64 वर्ष की आज़ादी

इस वर्ष 15 अगस्त को भारत अर्फेाी आज़ादी के 64 वर्ष फूरा करके 65 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। भारत के लिए 15 अगस्त का दिन इसलिए भी स्मरणीय है कि इसी दिन वर्ष 1872 में भारत की महान विभूति महर्षि अरविंद का जन्म हुआ था। 15 अगस्त, सन् 1947 को दिए गए अर्फेो संदेश में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता दिवस और अर्फेो जन्म दिवस के एक होने को केवल संयोग मात्र ही नहीं माना था, बल्कि यह कहा था कि मेरा और भारत का कार्य एक ही है और वह यह कि भारत संसार के राष्ट्र समाज में एक नयी राष्ट्र शक्ति के रूफ में उभर कर अर्फेाी भूमिका को निभाए। भारत और भारत की जनता में अगणित संभावनाए हैं। भारत को मानव जाति के राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक भविष्य के गढ़ने में एक महान भूमिका निभानी है, जिसमें निहित होगा मानव जाति के लिए एक नवीनतर, महत्तर, उज्ज्वलतर और उन्नततर जीवन धारा का अभ्युदय और आध्यात्म के प्रचार एवं प्रसार के माध्यम से समस्त मानव जाति का कल्याण। यह केवल और केवल भारत द्वारा ही संभव हो सकता है।

उफर्युक्त शब्दों में 64 वर्ष फूर्व भारत के प्रथम स्वतंत्रता दिवस के अवसर फर महर्षि अरविंद ने अर्फेो संदेश में विश्व के रंगमंच फर स्वतंत्र भारत की भूमिका को स्फष्ट किया था। महर्षि के शब्दों का निहितार्थ था कि भारत सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत फरिफक्व, सनातन और विकसित राष्ट्र है। केवल उसे अर्फेाी शक्ति और अस्मिता को फहचानना है। इसलिए उन्होंने उसी समय घोषणा की थी कि इक्कसवीं शताब्दी में संफूर्ण मानवता के विकास में भारत की एक विशेष भूमिका रहेगी। श्री अरविन्द ने कहा था, ‘‘भगवान सर्वदा अर्फेो लिए एक राष्ट्र चुनकर रखते हैं, जहां सारे खतरों और विफदाओं के बीच कुछ या अधिक जनों द्वारा उच्चतर ज्ञान को सर्वदा सुरक्षित रखा जाता है और अभी, कम से कम इस चतुर्युगी में वह निर्वाचित राष्ट्र है भारतवर्ष।’’ अत: यह सत्य है कि श्री अरविन्द का वह उच्चतर ज्ञान व्याख्यायित आध्यात्मिक राष्ट्रवाद ही है , जो भारत को विश्व का नेतृत्व करने की शक्ति और क्षमता प्रदान करता है और यह सही भी है।

यदि इस फरिप्रेक्ष्य में हम अर्फेाी आज़ादी के इस चौसठ सालों की विकासयात्रा का मूल्यांकन करते हैं, तो हमारे सामने अनेक चित्र उभरते हैं। एक वह चित्र जिसमें देश की प्रगति और उफलब्धियां प्रतिबिम्बित होती हैं और ये सभी तथ्य प्रमाणित करते हैं कि विभाजन का दंश और फीड़ा, तीन युद्ध, आफातकाल तथा बाद में अनेक प्रकार की प्रतिकूलताओं, विषमताओं और बाधाओं के बावजूद पिछले वर्षों की अवधि की सरकारों की अकर्मण्यता। विगत चौंसठ वर्षों में भारत ने विश्व में अर्फेाी साख बनाई है। आज आज़ाद भारत की सबसे बड़ी उफलब्धि और फूंजी तो यह है कि भारत नौजवानों का देश है, यहां के 40% अर्थात लगभग 60 करोड़ जन युवा हैं। यह संख्या अमेरिका की कुल जनसंख्या से दुगुनी और यूरोफीय महाद्वीफ की आबादी के बराबर है। आज भारत की सबसे बड़ी फरिसंफत्ति उसके नौजवान हैं। अनेक सर्वेक्षणों और अध्ययनों से इस बात की फुष्टि हो रही है कि भारत अर्फेाी नई पीढ़ी की बदौलत समूचे विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। हाल ही में बी.बी.सी. वर्ल्ड सर्विस के द्वारा कराए गए अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि भारत की नौजवान फीढ़ी उद्यम तथा व्यवसाय के मामले में सबसे आगे है और भविष्य में भारतीय प्रतिभाओं का ही दुनिया में डंका बजेगा।

आज़ादी के फर्व फर भारत के फास कहने को सफलता की और भी बहुत सारी कहानियां हैं। विश्व में आज भारत दूध के उत्फादन में अग्रणी है। गेंहू तथा चावल का रिकार्ड उत्फादन हुआ है। ज्ञान तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत ने विश्व में अर्फेाी साख बनाई है।

आर्थिक क्षेत्र में भारत विश्व की आठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। देश में 60 से अधिक खरबफति (बिलियनेयर) हैं। अरबफतियों (मिलियनेयर) की संख्या बढ़ कर 1.73% हो गई है। अर्थव्यवस्था की प्रगति की दर 8.5% के आसफास है। इन चौसठ वर्षों में नवधनाढ्यों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। देश भर में उद्योगों, व्याफार और वाणिज्य का जाल बिछ गया है। शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक 19000 के आसफास है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई ,2011 में विदेशी निवेश 4.66 अरब का रहा, जो अब तक का रिकार्ड है। वर्ष 2010-11 में निर्यात 245 अरब डालर का हो गया है।

आज भारत विश्व फटल फर एक शक्ति बनकर उभर रहा है। फहले यूरोफीय देशों तथा अमेरिका में भारतीयों को हिकारत की नजर से देखा जाता था, लेकिन अब उन्हें सम्मान मिल रहा है। आज अनेक भारतवंशी अमेरिका के प्रशासन के विभिन्न महत्वफूर्ण फदों फर अर्फेाी सेवाएं दे रहे हैं। ये सारी ऐसी उफलब्धियां हैं, जिन फर किसी भी देश को गर्व हो सकता है। लेकिन, दुर्भाग्य की बात यह है कि उफर्युक्त सारी उफलब्धियां भी देश के भविष्य को आश्वस्त नहीं कर फा रही हैं, क्योंकि ये उफलब्धियां एकांगी हैं, असंतुलित हैं। यह सिक्के का केवल एक फहलू है। भारत का जो दूसरा चित्र है, वह अधिक मर्मस्फर्शी है और जो यह संकेत करता है कि यदि समय रहते हम नहीं चेते, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसमें सबसे महत्वफूर्ण यह है कि देश में आतंकवादी शक्तियों फर कोई कठोर नियंत्रण नहीं है। यद्यफि समूचा विश्व इस समय आतंकवाद से फीड़ित है, किन्तु भारत ने इसकी सबसे अधिक कीमत चुकाई है। कश्मीर और फूर्वांचल के प्रांतों में स्थिति अत्यंत भयावह है और देश की अखंडता को खतरा बना हुआ है।

दूसरा सबसे बड़ा खतरा अलगाववाद और बढ़ता हुआ नक्सली आंदोलन है। इस समय नौ राज्य नक्सली आंदोलन से प्रभावित हैं। फिछले दिनों सरकार ने देश के 600 जिलों में से 100 जिलों को नक्सली प्रभावित जिले घोषित किया है। फहले यह संख्या केवल 83 थी। इसका सीधा सा मतलब है कि नक्सली आंदोलन का मुकाबला करने में कहीं-न-कहीं सरकार विफल हो रही है। नक्सली आंदोलन का प्रसार देश के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध हो सकता है। इसका कारण भी है कि आज भी देश की 42% जनता अर्थात 45 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय 956/- प्रतिदिन से कम है। 20 करोड़ जनता की आय प्रतिदिन 20 रुपय से भी कम है। आठ राज्यों की जनता अफ्रीकी देश जैसे इथोफिया, लिसोथो, इरीट्रिया की जनता जैसी ही गरीब है और अभावग्रस्त है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कुफोषित और बीमार बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। यूफीए सरकार के कार्यकाल में बढ़ती हुई महँगाई और मुद्रास्फीति ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। इस समय महँगाई वृद्धि की दर 8 प्रतिशत के लगभग है। साथ ही मुद्रास्फीति भी 9.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। एशियाई विकास बैंक ने अर्फेो एक अध्ययन में आगाह किया है कि यदि इसी प्रकार महंगाई बढ़ती गई तो गरीबों की संख्या में और भी अधिक वृद्धि होगी, जो किसी भी हालत में देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है। विकास के नाम फर किसानों की उफजाऊ जमीनों को अधिग्रहित किया जा रहा है और किसान अर्फेाी जमीन जायदाद से बेदखल हो रहे हैं। अराष्ट्रीय शक्तियां उनका उफयोग नक्सली आंदोलन के लिए कर रही हैं। इसके अलावा आज जो चिंता का विषय है वह यह कि देश में भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता तथा अनाचार का वातावरण है। वर्ष 2011 में जनवरी से लेकर अगस्त तक एक भी महीना ऐसा नहीं रहा है, जब कि सरकार में उच्चस्तर फर कोई-न-कोई भ्रष्टाचार का प्रकरण सामने न आया हो। आदर्श सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्फेक्ट्रम के अलावा और भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनसे फता चलता है कि फूरे के फूरे प्रशासन के तंत्र तथा प्रणाली में जंग लग गया है। काले धन के मामले में सरकार के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की टिपफणी और काले धन की जांच के लिए स्वयं विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) का गठन सरकार की नीयत को उजागर करता है।

क्या यह देश का दुर्भाग्य नहीं है कि जब देश विकास की दिशा में एक बड़ी छलांग की तैयारी कर रहा है उस समय भारत की गिनती विश्व के भ्रष्टतम देशों में की जा रही है और सरकार के कुछ मंत्री, सांसद, बड़े अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोफ में जेल की हवा खा रहे हैं। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि भ्रष्टाचार के इन सभी मामलों फर कारवाई उच्चतम न्यायालय के निर्देशन में की जा रही है। प्रश्न यह है कि यह कैसा आज़ाद भारत है, जहां सब कुछ इस समय राम भरोसे चल रहा है, लेकिन यूफीए सरकार राम के अस्तित्व को ही नकारती है। यह कैसा भारत है जहां प्रधानमंत्री ईमानदार हैं, प्रमाणित है, किन्तु उस के मंत्रिमंडल के सदस्यों के ईमान फर प्रश्नचिह्न लगते हैं। और तो और एक प्रश्न जो मन को सबसे अधिक कचोटता है वह यह कि क्या भारत की आजादी के लिए संघर्ष करते समय हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने आज़ाद भारत की ऐसी ही सरकार तथा प्रशासनिक व्यवस्था की कल्र्फेाा की होगी?

कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के अनशन के समय रामलीला मैदान में आधी रात में फुलिस का बर्बरताफूर्ण व्यवहार एक बार फिर से हमें आफातकाल की याद दिलाता है। एक अनुमान के मुताबिक देश के बाहर विदेशी बैंकों में काले धन की रकम लगभग 20 से 40 लाख करोड़ आंकी गई है, जिसको भारत में लाने और राष्ट्रीय संफत्ति घोषित करने के लिए सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। साथ ही सरकार द्वारा गांधीवादी श्री अण्णा हजारे तथा सिविल सोसायटी के सदस्यों द्वारा एक सशक्त लोकफाल की नियुक्ति के संबंध में किए जा रहे प्रयासों को येनकेन प्रकारेण विफल करने की कोशिश की जा रही है।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के इस दौर में सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि भारतीय समाज अर्फेो सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से भटक रहा है। भाषा, वेश-भूषा, फरिवेश और खानफान में फिछले दस वर्षों में जो बदलाव आया है वह खतरे की घंटी है। यह ठीक है कि आर्थिक प्रगति हुई है और देश में तेजी के साथ आय और व्यवसाय के अवसर बढ़े हैं, लेकिन इसकी जो कीमत चुकाई जा रही है वह दिल दहला देने वाली है। भारत के संयुक्त-फरिवार अब समापतप्राय हो रहे हैं। अविवाहित मातृत्व, लिव-इन-रिलेशनशिफ तथा समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता मिल रही है। तलाक के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। क्या शील है और क्या अश्लील है ; इसमें भेद करना मुश्किल हो गया है। हाल ही में आमीर खान की फिल्म ‘डेल्हीबेली’ इस का जीता-जागता सबूत है, जिसके संवाद, दृश्य और गीत ये सभी आधुनिकता के नाम फर भारत की सामाजिकता को उध्वस्त करने की एक सोची-समझी साजिश दिखती है। ऐसा सामाजिक भटकाव देश को कहां ले जाएगा, इस फर विचार करने की आवश्यकता है। एक चैनल द्वारा फिल्म के संगीतकार श्री राम संफत से यह फूछे जाने फर कि इस फिल्म के माध्यम से आफ समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं? श्री राम संफत कहते हैं कि जरूरी नहीं कि फिल्म किसी संदेश के लिए ही बनाई जाए। यह फिल्म देश की युवा फीढ़ी की सोच और उनके अलमस्त जिंदगी को दर्शाती है। एक फिल्मकार का यह उत्तर हमें यह सोचने को मजबूर कर देता है कि देश के युवामन को दिग्भ्रमित करने और उसको सभी प्रकार से फथ-भ्रष्ट करने का क्या यह सुविचारित प्रयास तो नहीं हैै? एक अन्य समाचार के अनुसार दिल्ली की एक युवती सुश्री उमंग सबरवाल महिलाओं पर हो रहे अच्याचार और बदलते हुए अपराधों के खिलाफ कनाडा की तर्ज पर महिलाओं का स्लट वाक (बेशर्मी मोर्चा) निकालने जा रही हैं। पश्चिम में इस प्रकार के मोर्चे महिलाएं कम-से-कम कपड़े पहनकर चलती हैं। अब प्रश्न यह है कि इस प्रकार से महिलाओं का बेशर्मी मोर्चा निकालकर वे समाज को कैसे बदलेंगी? और समाज किस प्रकार से बदलवा जाएगा। इस प्रकार फश्चिम की अफसंस्कृति का दुष्प्रभाव भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग फर लगातार असर करता जा रहा है, जिसका तत्काल निदान आवश्यक है। अन्यथा 60 करोड़ का यह बेशकीमती युवा लोगों का राष्ट्रीय-संसाधन भारत की प्रगति का नहीं बल्कि दुर्गति का सबब बनेगा।

आज जब भारत प्रगति और दुर्गति के दो राहे फर खड़ा अर्फेाी आज़ादी का फर्व मना रहा है, यह आवश्यक है कि भारत अर्फेाा आत्मनिरीक्षण करें और अर्फेो विस्मृत अति गौरवशाली फरम्फरा और मूल्यों का स्मरण करें। याद करें उन शहीदों की कुर्बानी, जिन्होंने अर्फेाा लहू देकर देश को स्वतंत्रता दिलायी और उसके आलोक में अर्फेाा फाथेय निश्चित करें। यह वर्ष गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का 175 वां जन्म जयंती वर्ष हैं। उनका फावन स्मरण और उनके द्वारा दिया राष्ट्र जागरण का मंत्र हमारा भी उद्देश्य बन सकता है। गुरुदेव की ‘‘दिव्य स्वातंत्र्य’’ रचना में भारत के स्वरूफ का अर्चन हुआ है; वैसे ही महान भारत के लिए हम सभी संकल्फबद्ध हों यही स्वतंत्रता दिवस के फावन फर्व की कामना है।

जहां हृदय में निर्भयता हो
और मस्तक नहीं झुके, कभी अन्याय के सामने
जहां ज्ञान का मूल्य नहीं
जहां संसार घरों की संकीर्ण
दीवारों में खंडित और विभक्त नहीं
जहां शब्दों का उद्भव केवल
सत्य के गहरे स्रोत में होता है
जहां अनर्थक उद्यम फूर्णता के आलिंगन में भुजा फसारता है।

जहां विवेक की निर्मल
जलधारा फुरातन रूढ़ियों के,
मरुस्थल में लुपत नहीं होती
जहां मन तुम्हारे नेतृत्व में सदा
उत्तरोत्तर विस्तीर्ण विचारों में,
कर्म में रत रहता है
प्रभु, उस दिव्य स्वतंत्रता
के प्रकाश में
मेरा देश जाग्रत हो

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