सावन झूमा फिल्मों में

ये दिन सावन के हैं। सावन हिंदी फिल्मों में भी कम नहीं झूमा। ‘सावन के मूड़’ के एक से एक बेहतरीन द़ृश्य सहज ढंग से फिल्मों में पेश किए गए हैं। पारंपरिक लोकप्रिय फिल्मों की कितनी सारी खासियतों में से एक यह भी है कि उनमें कपोलकल्पित बातों के साथ ही भारतीय संस्कृति एवं परम्पराएं और मू्ल्य आदि सूत्र काफी अच्छी तरह पिरोए गए होते हैं। इसी कारण ‘आम आदमी’ मनोरंजन करने वाली इन ‘मसाला फिल्मों’ के साथ बड़ी आसानी से जुड़ जाता है।

सावन तो गीत-गीत में से बहता चला आया है। उसमें कहीं सावन में हरी-भरी प्राकृतिक छटाओं का बखान होता है, तो कहीं उस हरे भरे माहौल में सराबोर होते-होते ही अपनी माशुका पर प्यार भरी बौछारें होती हैं। दोनों की प्रशंसा के पुल बांधते समय ही अनोखा संतुलन निभाना यह तो हिंदी फिल्मों की अनोखी खासियत है। सावन की वजह चारों ओर फैली ठंडक प्यार करने वालों की मददगार ही होती है। इस ‘रियालटी शो’ का फिल्मवालों ने अलग‡अलग अंदाज में पेश किया है।

फिल्मी गीतों की सावनभरी बौछारों का क्या कहें! कभी उनमें खत लिखने के बहाने प्यार, कभी मन में छिपा भाव खोलकर बताने की ढिठाई। कुछ गीतों की रचनाओं का जिक्र करते आप सभी को सराबोर करना ही होगा। ‘सावन का महीना, पवन करे शोर….अरे बाबा! शोर नहीं, सोर (मिलन), अब की बरस सावन में (चुपके-चुपके), ओऽऽ,आया सावन झूम के (आया सावन झूम के), तुझे गीतों में ढालूंगा-सावन को आने दो (सावन को आने दो), सावन के झूले पड़े…तुम चले आओ (बेमिसाल)।

फिल्मों के नामों में भी ‘सावन मूड़’ झलकता है। कुछ शीर्षक अगर गिनने हो, तो मोहन सैगल का ‘सावन भादों’, जे. ओमप्रकाश का ‘आया सावन झूम के’, राजश्री प्रोडक्शन का ‘सावन को आने दो’, शक्ति सामंत का ‘सावन की घटा’ इत्यादि।

सावन के साथ फिल्मी लोगों का रिश्ता वैसे भी कहीं रुकता नहीं। पहले सावन के महीने में ही पौराणिक फिल्में प्रदर्शित की जाती थीं और समाज में उस मौसम में व्याप्त भक्तिमय माहौल का लाभ उठाया जाता था। ‘श्रीकृष्ण लीला’, ‘बलराम-श्रीकृष्ण’, ‘जय गणेश’, ‘सती अनसूया’ आदि कई फिल्में सावन में ही प्रदर्शित हुईं। उस जमाने में हमारे गिरगांव (मुंबई) में मैजेस्टिक थिएटर के बाहर वाला डेकोरेशन इन्हीं पौराणिक फिल्मों के दृश्यों से भरा एवं सभी दर्शकों को अभिभूत कराने वाला हुआ करता था। फिल्म की पूर्वप्रसिद्धि तथा दर्शकों को फिल्म की ओर आकर्षित करने की दृष्टि से यह उपयोगी हुआ करता था। मेरा बचपन इसी मैजेस्टिक थिएटर के सामने वाली ‘खोताची वाडी’ में बीता। उसके फलस्वरूप सावन महीने में मैजेस्टिक थियेटर में संपन्न होते त्यौहारों की महिमा स्वयं अपनी आंखों से देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। फिल्मों का समाज के साथ रिश्ता और ज्यादा मजबूत करने का यह भी एक उपाय है। मैजेस्टिक जैसे ही उसके नजदीक वाले सेंट्रल और लैमिंग्टन रोड का स्वास्तिक थिएटर यानी सावन के महीने में पौराणिक-धार्मिक फिल्में प्रदर्शित करने होने वाले बिल्कुल भरोसेमंद थिएटर। मैजेस्टिक, स्वस्तिक थिएटर्स तो समय में समा गये, तो सेंट्रल का ‘सेंट्रल प्लाजा’ बन गया।

पौराणिक-भक्तिमय फिल्मों में ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की काफी चर्चा रही। यह फिल्म भी ााल 1976 के सावन में ही प्रदर्शित हुई थी। तब मुंबई में उसका थिएटर था ‘अलंकार’। उस समय तो सुबह की मैटिनी शो के रूप में वह फिल्म पूरे एक साल तक वहीं चलती रही। उसी के साथ धोबी तलाव का ‘एडवर्ड’ और प्रभादेवी का ‘किस्मत’ इन थिएटरों में तो इस फिल्म ने रजतमहोत्सवी सफलता पाई। श्रावण सोमवार और श्रावण शनिवार के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं का इस फिल्म को देखने के लिए तांता लग जाता था। 1970 के दशक में तो श्रावण सोमवार के दिन विद्यालयों को आधे दिन की छुट्टी रहती थी, उससे पूरे परिवार के साथ मनोरंजन का एक अच्छा-खासा अवसर मिलता था।

ये तो हुई सावन महीने में प्रदर्शित पौराणिक फिल्मों की खासियतें, लेकिन इसी सावन के महीने में प्रदर्शित पारंपरिक बड़ी विख्यात फिल्मों ने भी बड़ी भारी सफलता पाई। यह आप सभी शायद जानते न होंगे। यह संयोग कोई फिल्मी ढंग का ही माने, फिर भी वैसा संयोग हुआ, यह तो सावन महीने की और उसमें प्रकाशित फिल्मों की खासियत ही जो थी। रमेश सिप्पी निर्देशित सार्वकालीन हिट फिल्म ‘शोले’ (15 अगस्त 1975 को प्रदर्शित) भी सावन के महीने में ही प्रदर्शित हुई। इसके अतिरिक्त सुभाष घई की ‘सौदागर’, विधु विनोद चोपड़ा की ‘1942-ए लव स्टोरी’, सूरज कुमार बड़जात्या की ‘हम आपके हैं कौन’, संजय दत्त का विवादित ‘खलनायक’ ये सभी तो सावन के महीने में ही प्रकाशित होकर हिट बनी फिल्में हैं। हाल ही के सावन की एक हिट फिल्म ‘जानें तू…या जाने’।

सावन के महीने में बदला मूड़ शायद ऐसी फिल्मों की ओर दर्शकों को खींच लेने में सफल माना जा रहा होगा। सावन की बौछारें और त्यौहार इन दोनों से मनोरंजन की भूख शायद बढ़ती होगी तथा उसे मिटाने का सुनहरा- चंदेरी मौका अगर मिले, तो रसिकों की खुशी का क्या कहना!

सावन के महीने में आने वाली जन्माष्टमी और गोपालकाला कोें हिंदी फिल्मों में बड़े प्रभावशाली ढंग से पेश किया गया है। उसका श्रेय गिरगांव के खेडवाड़ी निवासी निर्देशक मनमोहन देसाई को देना होगा। आम आदमी के साथ उनका रिश्ता काफी जुड़ा हुआ था। उन्होंने गिरगांव की गली-गली में नाचने वाला गोविंदा पर्दे पर लाया और वह ‘हिट’ भी हुआ। अब तक तो आप जैसे रसिक दर्शकों को ‘ब्लफ मास्टर’ फिल्म में शम्मी कपूर ने अपनी लचीली अदाकारी से खेला-नाचा ‘गोंविदा आला रे आला’ की झट याद आई होगी। इस गीत को बेजोड़ शोहरत जो मिली। उससे कितनी सारी फिल्मों में ‘गोविंदा गीतों’ की गुजांइश भी बढ़ती गयी।

‘चोर मच गया शोर’, मुकाबला का ’तीन बत्तीवाला गोविंदा आला’ खुद्दार में अमिताभ की दहीं हांडी, जैसी कुछ हिट सावनी त्यौहारों की चंदेरी परंपरा है। नागपंचमी यह भी श्रावण महीने में एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। आप जानते ही हैं कि हिंदी फिल्मों में ‘नागिन’, ‘नगीना’ आदि ने कितनी शोहरत पायी थी। इनमें से कुछ फिल्मों का सावन के साथ कुछ संबंध जुड़ा न होगा, फिर भी ‘नाचे नागिन गली गली’ इस फिल्म में यह त्यौहार ही तो तो रंग भरता है। नारली पूनम याने रक्षा बंधन यह भी तो हिंदी फिल्मों में बड़ा और काफी महत्व रखने वाला त्यौहार है। ‘यह राखी बंधन है ऐसा’ से लेकर ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ तक के भाई-बहन के आपसी नजदीकी रिश्ते के गीत यह हिंदी फिल्मों की और एक खासियत है। सावन ने हिंदी फिल्मों को बहुत सारी खासियतें दिलाईं, उसका यह सुखद दर्शन है।

अब तो चारों ओर उपग्रह चैनलों की ही गूंज है, फिर भी कई बार अच्छी कल्पनाओं का अभाव ही महसूस होता है। कहानी को महत्व देने के बजाय त्यौहारों को मलिकाओं का हिस्सा बनाने का ट्रेंड काफी स्थायी बना सा लगता है। उससे बहुत सारी मालिकाओं में सावन महीने केे काफी त्यौहार मनाये जा रहे प्रदर्शित किये जाते हैं। यह समूचा कहानी से अलग अद्भुत (?) मामला हो, तो भी हिंदू धर्म की परम्पराओं, सभ्यता, संस्कृति, जीवन मूल्य आदि के निकट ले जाने की दृष्टि से वह एक फिल्मी मौका है, यह सच ही हैै।

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