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***** डी . एस . रूबेन******

संगीत की जैसे जैसे प्रगति होती गई फिल्म संगीत निर्देशक पश् चिमी वादनवृंद की स्वरसंगति और उनके द्वारा प्रयुक्त वाद्यों के प्रति सजग होते गए। पश् चिमी वादनवृंद की विभिन्न लय होती हैं और कुछ एकल वाद्य होते हैं, जबकि भारतीय वाद्य इतने बेहतरीन ढंग से स्वरसंगति देते हैं कि इससे भारतीय फिल्म संगीत को एक नया रंग मिलता है और उसकी पहचान उभर उठती है। …संगीत के उस्तादों ने हजारों सदाबहार सुंदर गीत दिए हैं। उस्तादों के ये सदाबहार गीत सदियों तक याद किए जाते रहेंगे और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत होंगे।

 फिल्मों का जमाना १९३१ के पहले का था। परदे के सामने बैठ कर वाद्यवृंद संगीत बजाया करता था। १९३१ में बोलती फिल्में आईं। फिल्मों में ध्वनि का प्रवेश हुआ। उस जमाने में शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार संगीत निर्देशक हुआ करते थे। इन निर्देशकों के निर्देशन में नायक और नायिकाएँ दोनों स्वयं गाया करते थे।

इन फिल्मी कलाकारों का संगीत का अभ्यास नहीं होता था। इसलिए उनसे अच्छा गायन करवा लेना टेड़ी खीर हुआ करती थी। मिसाल के तौर पर अशोक कुमार, देविका रानी अपनी भूमिकाओं के गीत स्वयं गाते थे, हालॉंकि उनके गायन की एक सीमा ही होती थी।

सरस्वती देवी, रामचंद्र पाल, फीरोजशाह मिस्त्री, मास्टर मोहम्मद, रफीक गजनबी एवं आर . सी . बोराल जैसे तत्कालिन संगीत निर्देशक थे। उन्होंने बेहतर काम किया। १९४० -४२ के दौरान गुलाम हैदर, अनिल बिस्वास, खेमचंद प्रकाश एवं कुछ अन्य श्रेष्ठ संगीत निर्देशक हुए हैं। संगीत निर्देशक खेमचंद प्रकाश ने उन दिनों फिल्म “तानसेन ” में शानदार संगीत दिया था। सभी गाने के . एल . सहगल एवं खुर्शिद ने गाए थे। खेमचंद प्रकाश ने ही लता मंगेशकर को फिल्म “महल ” के आमुख गीत “आयेगा आयेगा आने वाला ” गाने का पहली बार मौका दिया था। इसी तरह फिल्म “रिमझिम ” में किशोर कुमार को आमुख गीत गाने का अवसर दिया। किशोर कुमार आरंभ में के . एल . सहगल की तर्ज पर ही गाते थे, लेकिन बाद में एस . डी . बर्मन के कारण उनकी अपनी मौलिक शैली विकसित हुई। खेमचंद प्रकाश के संगीत का आधार शास्त्रीय हुआ करता था और होता था गीत -संगीत में माधुर्य। सरदार हुसैन, श्याम सुंदर, हसनलाल भगतराम एवं पंडित अमरनाथ जैसे अन्य संगीत निर्देशक भी थे, जिन्होंने कई सुरीले तराने दिए। नौशाद ने “बैजू बावरा “, “मुगल -ए -आजम ” तथा कई अन्य फिल्मों के जरिए भारतीय शास्त्रीय संगीत को जनसाधारण तक पहुंचाया। नौशाद ने अपनी सभी फिल्मों में अपनी शैली बरकरार रखी।

कई संगीतकारों ने फिल्म संगीत को नई ऊंचाइयां दीं। एस .डी . बर्मन ने मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे एवं हेमंत कुमार के शानदार स्वरों में फिल्मी संगीत के क्षेत्र में विविधता लाई। सी . रामचंद्र ने तो अपनी संगीत रचना मेंे आधुनिक जाझ संगीत को शामिल कर फिल्म संगीत को नया आयाम दिया। उनके “आना मेरी जान संडे के संडे “, “मैं हूं एक खलासी “, “मि . जॉन बाबा खान ” एवं “इना मिना डिका ” जैसे गीत इसकी मिसाल है। ये गीत मुख्यतः रॉक एण्ड रोल शैली के थे। पचासवें दशक के आरंभ में राज कपूर ने प्रतिभाशाली संगीतकार शंकर – जयकिशन के साथ “बरसात ” पेश की। शंकर – जयकिशन ने फिल्मी गीतों में बहुत प्रयोग किए। इसी अवधि में सुरीले संगीतकार रोशन आ गए। उन्होंने लता मंगेशकर व मोहम्मद रफी से बेहतरीन गाने गवाए। एक अन्य प्रतिभाशाली संगीतकार मदन मोहन पहले फौज में थे। बेगम अख्तर व तलत महमूद के कारण दिल्ली रेडियो में आ गए। गज़ल को संगीत में बेहतर ढंग से पिरोना एवं समकालिन संगीत को साज चढ़ाना कोई मदन मोहन से ही सीखे। सलिल चौधरी तो ऐसे संगीतकार थे जो पश् चिमी शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार थे। बिथोवन, मोझर्ट व बंगाली लोक गीतों में उन्हें महारत हासिल थी। इसी तरह के प्रतिभावान संगीतकार थे ओ .पी .नैयर, जिन्हें प्यार से लोग केवल ओ .पी . के नाम से ही पुकारते थे। उन्होंने सुरीली पंजाबी धुनों को फिल्मों में पेश किया। पश् चिमी व भारतीय शास्त्रीय संगीत का मधुर मिलाप उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। खय्याम, रवि, जयदेव एवं सरदार मलिक जैसे अन्य संगीतकारों ने भी फिल्मों में अनेक सुरीले गीत दिए। हेमंत कुमार न केवल श्रेष्ठ संगीत निर्देशक थे, अपितु उनकी आवाज भी बेहद मधुर थी।

समय के साथ कई नए -नए संगीतकार फिल्मी दुनिया में आए और गीत -संगीत को नए आयाम दिए। इनमें लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल और कल्याणजी – आनंदजी भी थे। लक्ष्मीकांत तो सब से बेहतर मेंडोलिन बजाते थे। प्यारेलाल का वायोलिन में कोई हाथ नहीं पकड़ता था। वाद्यवृंद के साथ उनका तालमेल असाधारण होता था। दोनों ने कई प्यारी धुनें दीं। आरंभ में कल्याणजी उनके यहां क्ले -वायलिन बजाया करते थे। इसी दौरान आर .डी . बर्मन ने उस समय ही लैटिन अमेरिकी संगीत, अफ्रो -क्यूबाई संगीत व मिस्री संगीत को पेश किया, जो कि आज के आधुनिक संगीतकारों का प्रिय क्षेत्र है। आर .डी .बर्मन मूलतया गायक थे और पश् चिमी लयों एवं वाद्यों को खूब जानते थे। एक और संगीतकार के नाम का उल्लेख जरूरी है और वे हैं बप्पी लाहिरी, जिन्होंने स्विंग म्युजिक, जैझ व संगीत के अन्य प्रकारों को बहुत माधुर्य के साथ पेश किया।

इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि इस अवधि में जतीन -लतिल एवं नदीम -श्रवण जैसे संगीतकारों ने भारतीय फिल्म संगीत में बहुत प्यारी धुनें दीं। वर्तमान संगीत निर्देशक भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। पुराने सदाबहार गीत जब लोग के मन में झंकारते रहते हो तब नए गीतों की रचना चुनौतीभरी होती है। मैं प्रीतम, शंकर -एहसान -लॉय, विशाल शेखर, सलिम -सुलेमान, साजिद -वाजिद, हिमेश रेशमिया और अन्य प्रतिभाशाली संगीत निर्देशकों का उल्लेख करना चाहता हूूं। मैं इन संगीतकारों से अनुरोध करना चाहूंगा कि फिल्म संगीत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए विश् व संगीत का इस्तेमाल जरूर करें, लेकिन गीतों में भारतीयता की आत्मा का विस्मरण न होने दें।

संगीत निर्देशक को भारतीय व पश् चिमी संगीत की अच्छी जानकारी आवशक होती है। वे जिन वाद्यों का इस्तेमाल कर रहे हैं उनका भलीभांति ज्ञान भी होना चाहिए। ज्यादातर संगीतकार मूलतया अच्छे गायक हैं और हार्मोनियम के साथ अन्य वाद्यों को बजाना भी खूब जानते हैं। संगीत रचना के कौशल और वाद्यवृंदों को सही निर्देशन से ही कोई अच्छा संगीतकार बन सकता है। अल्ला रखा श्रेष्ठ वादक भी हैं। संगीत निर्देशन में उनका नाम ए .आर . कुरैशी है। रविशंकर सितार में महारत रखते हैंं। “मीराबाई ” व अन्य कुछ फिल्मों में उन्होंने सुरीला संगीत भी दिया है। शिव कुमार (संतुर ) हरिप्रसाद चौरसिया (बांसुरी ) जैसे संगीतकारों ने शिव -हरि के नाम से “सिलसिला ” फिल्म में संगीत दिया है। इस फिल्म में नायक अमिताभ बच्चन व नायिका रेखा थी। साजिद हुसैन बेहतरीन मेंडोलिन बजाते थे। उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म “संगदिल ” में बेहतरीन संगीत दिया है। यही नहीं, शंकर – जयकिशन के सहायक एवं ढोलक उस्ताद दत्ताराम ने भी कई फिल्मों में संगीत दिया है। एक दूसरे ढोलक वादक और नौशाद के सहायक थे गुलाम मोहम्मद, जिन्होंने “पाकिज़ा ” व “मिर्जा गालिब ” में सुंदर संगीत दिया है। आर .डी .बर्मन ने कई फिल्मों में एस .डी .बर्मन के सहायक के रूप में काम किया, लेकिन अपने जौहर दिखाते हुए स्वयं संगीत देना आरंभ किया। इस तरह असली बात है संगीत की प्रतिभा, चाहे व्यक्ति कोई भी कार्य करता हो। मैं कुछ संगीत सहायकों के नाम देना चाहता हूं जो बाद में स्वयं संगीत निर्देशक बने। चालीस के दशक में रामसिंह नामक एक सहायक थे, जिन्होंने अनिल बिस्वास व हसनलाल भगतराम के साथ काम किया था। सेबास्टिन डिसूजा ऐसे ही सहायक हैं, जिन्होंने ओ .पी .नैयर, शंकर जयकिशन, सलिल चौधरी व कई अन्य संगीतकारों के साथ काम किया।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने समय के कई चोटी के संगीतकारों के साथ काम किया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के रूप में लोकप्रिय होने के पूर्व वे कल्याणजी आनंदजी के लिए काम करते थे। सी . रामचंद्र भी पहले अनिल बिस्वास के सहायक थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी राह बनाई। नौशाद जब पहली पहल मुंबई आए तो उन्होंने संगीतकार ज्ञान दत्त के सहायक के रूप में काम किया। बसु मनोहारी ने कुछ फिल्मों में संगीत दिया। वे पहले एस .डी .बर्मन व आर .डी .बर्मन के लिए काम करते थे। प्रसंगवश कुछ प्रसिद्ध गीत रिकार्डिस्टों के नामों का भी उल्लेख करना जरूरी है जैसे कि फेमस स्टूडियों के मीनू कात्रक एवं डी .एन .भणसाली, बाम्बे फिल्म लेबोरेटरी के बी .एन .शर्मा, वी . शांताराम स्टूडियो के मंगेश देसाई, मेहबूब स्टूडियो के कौशिक एवं फिल्मसेंटर के रॉबिन बैनर्जी। मुझे अक्सर स्वर्णिम युग के सदाबहार गीतों की लोकप्रियता के कारण पूछे जाते हैं। मैं दृढ़ता के साथ कहता हूं कि फिल्मी गीत तब तक सदाबहार नहीं हो सकता जब तक उसमें रागों के साथ सुगम शास्त्रीय संगीत का इस्तेमाल न हो। इसकी मिसाल के तौर पर मैं कुछ गानों का उल्लेख करना चाहता हूं। वे हैं – गुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में नूरजहां का गाया “तू कौनसी बदली मेरे “, खेमचंद प्रकाश के निर्देशन में लता मंगेशकर का गाया “आयेगा आयेगा आने वाला “, अनिल बिस्वास के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “दिल जलता है तो जलने दे ” और “ऐ दिल मुझे ऐसी जगा ले चल “, नौशाद का “सुहानी रात ढल चुकी ” व “दुनिया के रखवाले “, साजिद हुसैन के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “ये हवा ये रात चांदनी “, सरदार मलिक के निर्देशन में मुकेश का गाया “सारंगा तेरी याद में “, सी . रामचंद्र के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “मोहब्बत ये ना जो समझे ” एवं लता मंगेशकर का “मोहब्बत ऐसी धड़कन है “, एस .डी .बर्मन के निर्देशन में गीता दत्त का गाया “मेरा सुंदर सपना बीत गया “, हेमंत कुमार का गाया “जाने वे कैसे ” एवं मोहम्मद रफी का गाया “”दिन ढल जाये “, खय्याम के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “शामे गम की कसम “, श्याम सुंदर के निर्देशन में लता मंगेशकर का गाया “बहारें फिर भी आएंगी “, हसनलाल भगतराम के निर्देशन में मोहम्मद रफी का गाया “इक दिल के टुकड़े हजार हुए “, सुरैया का गाया “ये पास रहे ना दूर रहे “, पंडित अमरनाथ के निर्देशन में मोहम्मद रफी का गाया “ऐ मुहब्बत तुमसे मिलने “, रोशन के निर्देशन में मोहम्मद रफी का गाया “दिल जो ना कह सका ” और मुकेश का गाया “तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं “, मदन मोहन के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “मेरी याद में आंसू बहाना “, मोहम्मद रफी का गाया “आपके पहलू में आकर “, लता मंगेशकर का गाया “माही रे “, सलिल चौधरी के निर्देशन में मन्ना डे का गाया “ऐ मेरे प्यारे वतन “, लता मंगेशकर का गाया “मैं तो कबसे खड़ी हूं “, मुकेश का गाया “कहीं दूर जब दिन ढल जाये “, ओ . पी . नैयर के निर्देशन में शमशाद बेगम का गाया “कभी आर कभी पार ” एवं गीता दत्त का गाया “बाबूजी धीरे चलना “, मोहम्मद रफी का गाया “दीवाना हुआ बादल “, खय्याम के निर्देशन में तलत महमूद का गाया “शामे गम की कसम “, मुकेश का गाया “कभी कभी मेरे दिल में “, रवि चौधरी के निर्देशन में मोहम्मद रफी का गाया “चौदहवी का चांद “, मन्ना डे द्वारा गाया “ऐ मेेरे जोहरा जबी “, हेमंत कुमार के निर्देशन में स्वयं उनके द्वारा गाया गया “या दिल की सुनूं “, लता मंगेशकर का गाया “तन डोले मेरा मन डोल “, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के निर्देशन में मोहम्मद रफी का गाया “वो जब याद आये बहुत याद आये “, किशोर कुमार का गाया “मेरे महबूब कयामत होगी “, कल्याणजी आनंदजी के निर्देशन में किशोर कुमार का गाया “जिंदगी का सफर “, किशोर कुमार का ही गाया “पल पल दिल के पास “, मन्ना डे द्वारा गाया गया “कसमे वादे प्यार वफा “, आर .डी .बर्मन के निर्देशन में मोहम्मद रफी एवं आशा भोसले का युगल गीत “आ जा आ जा, मैं हूं प्यार तेरा “, किशोर कुमार का गाया “कुछ तो लोग कहेंेगे “, भप्पी लाहिरी के निर्देशन में किशोर कुमार का गाया “प्यार मांगा है तुम्ही से “, येसूदास का गाया “माना हो तुम “, आशा भोसले का “दम मारो दम “, “तुम आ गए हो “, पंकज मलिक के निर्देशन में स्वयं पंकज मलिक का गाया “पिया मिलन को जाना “, “चले पवन की चाल “, के .एल . सहगल का गाया “मैं क्या जानूं जादू है “, आर .सी .बोराल के निर्देशन में के .एल .सहगल का गाया “बाबूल मोरा “।

इन महान संगीतकारों के सदाबहार गीतों की निर्मिति का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है। आरंभिक दिनों में वाद्यवृंद का रिकार्डिंग बहुत कम वाद्यों के साथ होता था, संगीत रचना, परस्पर समन्वय एवं अन्य तकनीकें कम हुआ करती थीं। संगीत की जैसे जैसे प्रगति होती गई संगीत निर्देशकों ने पश् चिमी वादनवृंद की स्वरसंगति और उनके द्वारा प्रयुक्त वाद्यों के प्रति सजग होते गए। पश् चिमी वादनवृंद की विभिन्न लय होती है और कुछ एकल वाद्य होते हैं, जबकि भारतीय वाद्य इतने बेहतरीन ढंग से स्वरसंगति देते हैं कि इससे भारतीय फिल्म संगीत को एक नया रंग मिलता है और उसकी पहचान उभर उठती है।

भारतीय फिल्म संगीत एवं उनके संगीत निर्देशकों का इतना विशाल है कि कई प्रतिभाशाली नाम छूट गए होंगे और आप जानते हैं कि उस्तादों ने हजारों सुंदर गीत बनाए हैं कि उनका नामोल्लेख तक संभव नहीं है। उस्तादों के ये सदाबहार गीत सदियों तक याद किए जाते रहेंगे और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत होंगे।

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