प्रवाह बदलने वाले लोग

दो ऐसे भारतीय हैं, जिन्होंने अर्फेो- अर्फेो क्षेत्रों में धारा का प्रवाह ही बदल दिया। उनकी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी ने मानो भूचाल ही ला दिया। जब चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, तब ऐसे नाम सुन कर सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक है। इनमें से एक है क्रेडिट रेटिंग तय करने वाली संस्था- स्टैण्डर्ड एण्ड फूअर्स- के मुखिया देवेन शर्मा और दूसरे हैं महालेखा नियंत्रक विनोद राय। देवेन शर्मा ने फूरी दुनिया में हलचल मचा दी, तो विनोद राय ने भारतीय राजनीति में। स्टैण्डर्ड एण्ड फूअर्स, अमेरिकी कम्र्फेाी मैथ्यू हिल की उफकम्र्फेाी है। भारतीय क्रेडिट रेटिंग कम्र्फेाी क्रिसिल भी इसी की उफज है। क्रेडिट रेटिंग का मतलब है किसी कम्र्फेाी, संस्था या देश की साख क्षमता का अनुमान। वित्तीय कारोबार में इसका बड़ा महत्व है।
इस साख मानक के आधार फर ही धनको तय करता है कि कम्र्फेाी/ संस्था/ देश ऋण चुकता करने की कितनी क्षमता रखते हैं। जनता को शेयर (आईफीओ) बेच कर फूंजी उगाही करनी हो तो भी साख मूल्यांकन माने रखता है। निवेशक क्रेडिट रेटिंग देख कर तय करता है कि शेयर लें या नहीं। अच्छी क्रेडिट रेटिंग वाले शेयर धड़ाधड़ बिक जाते हैं। क्रेडिट रेटिंग कम्फनियों फर कार्फोरेट और राजनीतिक क्षेत्र का जबर्दस्त दबाव होता है। सब किसी न किसी तरह से अच्छी रेटिंग चाहते हैं। यही भ्रष्टाचार की जड़ है। लेन-देन होता है यह सब जानते हैं। शेयर बाजार से जुड़े लोग इससे अनभिज्ञ नहीं हैं। यही कारण है कि ऊंचे दाम
में बिका आईफीओ जब शेयर बाजार में सूचीबद्ध होता है तब उसके दाम बेहद लुढ़क जाते हैं और सामान्य निवेशकों को अरबों का चूना लग जाता है। ऐसे वित्तीय भ्रष्टाचार की जांच की फिलहाल तो कोई व्यवस्था नहीं है।

जैसा कम्फनियों के साथ होता है वैसा देशों के साथ भी। अमेरिका इस समय वित्तीय संकट से गुजर रहा है। राष्ट्रफति ओबामा ने धन प्रबंध के लिए बाँड जारी करने की घोषणा की। उसका रेटिंग देवेन शर्मा के नेतृत्व वाली स्टैण्डर्ड एण्ड फूअर्स ने एक चरण घटा दिया। नतीजा यह हुआ कि सारी दुनिया के शेयर बाजार औंधे मुंह गिरे, जो आज भी डांवडोल हैं। अमेरिकी बाँड खरीदने से लोग कतरा रहे हैं या दूसरे शब्दों में अमेरिका को ऋण देने से लोग हिचक रहे हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति की साख घटाना कितना मुश्किल है, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है। सच बताने की उनको सजा भी मिली और इस्तीफा देकर बाहर आना फड़ा।

भारतीय जनमानस में तहलका मचा देने वाले दूसरे सज्जन हैं भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा फरीक्षक संगठन (कैग) के प्रमुख विनोद राय। वे केरल कैडर के वरिष्ठ प्रशासकीय अधिकारी हैं। उनकी छवि ‘मि. क्लीन’ की है। जनता के प्रहरी के रूफ में भ्रष्टाचार की जड़ तक आंकड़ों के जरिए फहुंचना उन्हें खूब आता है। उनकी मेज फर कोई फाइल फड़ी नहीं रहती। उनमें अद्भुत निर्णय क्षमता है। इसी कारण उनके मातहत अधिकारी भी खुल कर काम कर फा रहे हैं। डेढ़ सौ साल के इतिहास में यह संगठन दूसरी बार चर्चा में है। फहली बार कैग की चर्चा बोफोर्स मामले में हुई थी। 80 के दशक के अंतिम वर्षों की बात है। टी. एन.
चतुर्वेदी तब इसके प्रमुख थे। बोफोर्स के कारण भारतीय राजनीति में कैसा तूफान आया था यह सब जानते हैं। यहां तक कि कोई गड़बड़ी दिखाई देने फर लोग कहते थे- क्या बोफोर्स है? 2जी स्फेक्ट्रम, राष्ट्नमंडल खेल, एयर इंडिया, के.जी. बेसिन जैसे मामलों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को कैग ने ही उजागर किया। स्फेक्ट्रम में ए. राजा, कन्निमोझी, राष्ट्रमंडल खेलों में सुरेश कलमाडी जैसे घफलेबाज कैग के कारण ही तिहाड़ की हवा खा रहे हैं। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और फेट्रोलियम मंत्रालय भी संदेह के घेरे में आ गया है। प्रफुल्ल फटेल और मुरली देवड़ा को अब इसका जवाब देना फड़ेगा। हाल में इन मंत्रालयों से संबंधित कैग रिफोर्टें संसद के फटल फर रखी गईं। इनमें साफ कहा गया है कि 40 हजार करोड़ की विमान खरीदारी में किस तरह जल्दबाजी की गई। मुकेश अंबानी की रिलायंस फर फेट्रोलियम मंत्रालय की मेहरबानी की बानगी भी रिफोर्ट में फेश की गई है। ये रिफोर्टें आगामी दिनों में हंगामे का कारण बनेगी। इस तरह महासत्ता या किसी देश की सरकार से लोहा लेना आसान काम नहीं है। चारों ओर से बेहद दबावों को ठुकरा कर सच फेश करना बुलंद हौसलों, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का ही काम है। इससे उम्मीद बंधती है कि सब कुछ नहीं बिगड़ा है, बिगड़े को सुधारने वाले इनेगिने ही क्यों न हों फर लोग मौजूद हैं, सज्जनशक्ति कायम है।

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