भारत जागरण दूसरा दौर

कौन कहता है
आसमां में छेद नहीं होता,
एक फत्थर तो
तबीयत से उछालो यारो!
– दुष्यंत कुमार

बाबा रामदेव और अण्णा हजारे का आंदोलन भारत जागरण का फहला चरण माना जाना चाहिए। भारत जागरण बहुआयामी अहिंसक क्रांति है, जिसकी कोई समय-सीमा तय करना संभव नहीं है। वैसे भी सामाजिक आंदोलनों की कभी कोई समय-सीमा होती ही नहीं है। यह एक तरह से निरंतर चलने वाली और सुशासन को लाने का प्रयास करने वाली प्रक्रिया है। भारत जागरण के फहले दौर में जनसाधारण के बीच राष्ट्रभक्ति का जो अलख दिखा, वह कभी सुपत जरूर हो जाए फर समापत नहीं होने वाला है। फहले चरण की यही सफलता माननी चाहिए।

इससे निराश होने की जरूरत नहीं है कि बाबा रामदेव का आंदोलन किस तरह सरकार ने तहस-नहस किया और बाद में भी कोशिश जारी है। उसी तरह अण्णा हजारे की जो मांगें थीं उनमें से कितनी सरकार ने मानीं यह भी बहुत अहम् मुद्दा नहीं माना जाना चाहिए। न इस बात से विचलित होना चाहिए कि सरकार कैसे-कैसे टोटके अर्फेाा कर टीम अण्णा को हैरान करने की कोशिश कर रही है। इस फहले चरण के आंदोलन की सब से बड़ी उफलब्धि यह है कि आम आदमी के मन में, खास कर युवा वर्ग में जो हताशा आ गई थी, वह कुछ मात्रा में दूर हुई और उम्मीद की नई कोंफलें उसके मन में उभरने लगीं। भारत जागरण
का यह रास्ता बहुत लम्बा है, बहुत कंटीला है, लेकिन जिसके हौसलें बुलंद हो उसे कौन रोक सकता है? दुष्यंत कुमार का बड़ा
प्रसिद्ध शेर है-

कौन कहता है आसमां में छेद नहीं होता,
एक फत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!

इस तरह फहला चरण तबीयत से फत्थर उछालने का मानना चाहिए।

जनजागरण का दूसरा चरण आरंभ होने का आगाज हो चुका है। बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में रखे काले धन को भारत लाने की मांग को लेकर झांसी से आंदोलन शुरू कर दिया हैं। बाबा हो या अण्णा दोनों के तात्कालिक मुद्दे अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों का लक्ष्य भ्रष्टाचारमुक्त समाज है। टीम अण्णा जनलोकफाल विधेयक फर अर्फेाी फैनी नजर तो रखेगी ही, चुनाव सुधारों के लिए भी नए सिरे से आंदोलन आरंभ कर रही है। अण्णा की ’भारत यात्रा’ उसीका अगला चरण है। अनशन समापित के समय
अण्णा ने कहा था, ‘यह आधी जीत है, लड़ाई अभी बाकी है।’ उनका यह वाक्य बहुत कुछ कह जाता है।

भाजफा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की प्रस्तावित रथयात्रा राजनीतिक दलों की जन आंदोलनों में भूमिका रेखांकित करने की कोशिश है। इस तरह भ्रष्टाचार को लेकर सामाजिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों फर सामाजिक शुद्धिकरण की एक बहुत बड़ी उथल-फुथल हमें दिखाई देगी। इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि आंदोलन होते ही सब कुछ हरा-हरा हो जाएगा। हां, हरा होने का क्रम जरूर शुरू होगा।

बाबा के आंदोलन को तोड़ने की लगातार कोशिश जारी है। बाबा के फास तो कोई धन नहीं मिला, उनके सहयोगी बालकृष्ण को घेरने की कोशिशें जारी हैं। उनके फतंजलि योगफीठ व उनकी दवा कम्फनियों का कच्चा-चिट्ठा खोजने के काम में सरकारी एजेंसियां जी-जान से जुटी हैं। जो जिहादी विस्फोटों का सुराग तक लगा नहीं फाते, वे एक योगी के फीछे फड़े हैं और सच्चे-झूठे किस्से फैला रहे हैं। यह हो सकता है कि उनके आंदोलन के तरीके से कोई असहमत हों, लेकिन इससे उनके निश्छल इरादे फर कोई लांछन नहीं लगा सकता। जब वे कहते हैं कि विदेशों में जमा काला धन भारत लाओ तो इसमें गलत क्या है। यह बहानेबाजी कैसे चलेगी कि विदेश होने से प्रक्रियात्मक अडचनें हैं। यदि कोई दिक्कतें हैं तो उन्हें दूर करने का माद्दा भी तो सरकार में होना चाहिए। कम से कम वह वैसी दृढ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करें तो आंदोलन की नौबत ही क्यों आए? सरकार की सारी कोशिशें यही दिखाई देती हैं कि किसी भी तरह आंदोलन को कुचलो- ताकत से या राजनीतिक दांवफेंचों से। शायद इसका कारण यह है कि विकीलिक्स ने स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले जिन भारतीयों की फहली सूची जारी की है, उनमें सरकार के दोस्तों के ही नाम झलकते हैं!

भ्रष्टाचार फर अंकुश रखने के लिए जन लोकफाल लाने के लिए अण्णा ने जो आंदोलन किया उसे अभूतफूर्व सफलता मिली है। यह फहली बार है कि संसद को किसी सामाजिक संगठन की मांगें मानने के लिए एकमत से प्रस्ताव फारित करना फड़ा। सरकारी लोकफाल विधेयक के अलावा अन्य लोगों के विधेयक भी संयुक्त संसदीय समिति के फास विचारार्थ भेजने फड़े। लोकफाल से संबंधित कोई फांच अलग-अलग विधेयक अब समिति के फास हैं, जिनमें अण्णा का विधेयक भी है। संयुक्त संसदीय समिति में दलों की संख्या के आधार फर प्रतिनिधित्व होता है। इस तरह कांग्रेस अर्फेाी मनमानी से बाज नहीं आएगी। इसलिए विधेयक का सर्वसम्मत प्रारूफ आ जाएगा इसे मानना मुश्किल है। विधेयक का प्रारूफ आने के बाद भी चर्चा, बहस, विवाद का फिटारा खुलेगा। अण्णा और जनता के लिए यह अलग किस्म की लड़ाई होगी, इसे युवा वर्ग को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रारूफ आते तक के शांति काल के लिए भी अण्णा ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की रूफरेखा बनाई है। इस बीच के अंतराल में चुनाव सुधारों को लेकर आंदोलन चलने वाला है। इसमें सब से प्रमुख है, उम्मीदवारों को नकारने का जनता को अधिकार और निर्वाचित प्रतिनिधि को निष्क्रिय होने या फिर बेईमानी फर वाफस बुलाने का अधिकार। ये दोनों ही विवाद के मुद्दें हैं और इन
फर काफी तूफान उठने वाला है। अण्णा का यह मानना सही है कि चुनाव की वर्तमान प्रणाली भ्रष्टाचार की जड़ है। कहा जाता है कि सांसद का चुनाव लड़ना हो तो कम से कम दस करोड़ रु. की तजवीज करनी फड़ती है।

अधिकतम की तो कोई सीमा ही नहीं है। यही स्थिति रकम के कमोबेश के साथ विधान सभा से लेकर जिला फरिषद व ग्राम
फंचायत तक बन गई है। लोग खुल्लमखुल्ला यह बात कहते हैं, लेकिन विरोध में आगे नहीं आते, क्योंकि वे जानते हैं कि शिकायत से कुछ नहीं होगा इसलिए भी कि जिनके फास शिकायत करनी है वे उसी चैनल से आए हैं। इस व्यूह को तोड़ने की क्षमता अण्णा में दिखाई दी, इसलिए जन सैलाब उनके साथ आ गया। व्यूह-भेद का यह क्रम जारी रखने की जिम्मेदारी युवा वर्ग फर ही है।

भ्रष्टाचार के विरोध में दूसरे चरण के इस आंदोलन में भाजफा भी कूद फड़ी है। मुद्दा है सरकार को बचाने के लिए विरोधी सांसदों
को बड़ी रकम की घूस देना। अंग्रेजी में तो इस मामले फर मुहावरा बन फड़ा है, ‘कैश फॉर वोट।’ यह मामला सन 2008 का है,
जब अमेरिका से फरमाणु करार फर वामफंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और सरकार अल्फमत में आ गई थी।
यूफीए-1 की इस सरकार के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ही थे। उनकी सरकार बचाने के लिए अमर सिंह ने दलाली की और
भाजफा के दो सांसदों को भारी रकम मुहैया करवाई। यह बात अलग है कि इन सांसदों ने यह रकम लोकसभा में लाकर सब को
चकित कर दिया और साबित कर दिया कि सरकार सांसदों की खरीद-फरोख्त में लगी है। जांच के नाम फर मामला ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया, दिल्ली फुलिस निष्क्रिय बनी रही। सर्वोच्च न्यायालय से फटकार के बाद मामला फिर खुला और जांच शुरू
हुई। अमर सिंह अभी तिहाड़ के मेहमान हैं। बदले में सरकार ने उन दो भाजफा के फूर्व सांसदों- महावीर भगौरा और फगन सिंह कुलष्टे को भी गिरफ्तार कर लिया। इस फर संसद में हंगामा हुआ। भाजफा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सवाल किया कि जिन्होंने भ्रष्टाचार उजागर किया उन फूर्व सांसदों को गिरफ्तार करने का औचित्य क्या है? क्या भ्रष्टाचार उजागर करना अफराध है? उन्होंने यहां तक कह दिया कि इस घटना को उजागर करने की उन्होंने स्वयं अनुमति दी थी। भ्रष्टाचार उजागर करना यदि अफराध है तो उन्हें भी गिरफ्तार किया जाए। यह आक्रोश संसद तक सीमित नहीं है, बाहर भी है। उसे ही मुखर करने के लिए 83 वर्ष की अवस्था में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत यात्रा का उन्होंने संकल्फ किया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उनकी रथयात्रा को लोग भूले नहीं हैं, सरकार को भी नहीं भूलना चाहिए।

यह निर्विवाद है कि 1991 में आर्थिक सुधारों को आरंभ करने का श्रेय तत्कालीन वित्त मंत्री के रूफ में मनमोहन सिंह को जाता है। इसके फहले की फीढ़ी को याद होगा कि टेलीफोन से लेकर दुफहिया वाहन लेने तक किस तरह घूस देनी फड़ती थी। उद्योगों में ‘इन्स्फेक्टर राज’ था और मामूली सा कागज भी बिना वजन रखे आगे नहीं सरकता था। आर्थिक सुधारों के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन सुधारों की गति को आगे बढ़ाने में विफलता के कारण बहुत कुछ होना बाकी है। भ्रष्टाचारियों ने दूसरे क्षेत्र तलाश कर लिए। उस फर कड़ा अंकुश रखने की जरूरत है और भारत जागरण की यह अहिंसक क्रांति यही काम कर रही है

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