कुरसी तू बड़भागिनी

हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा ने एक लंबा रास्ता तय करके अपना प्रमुख स्थान अर्जित किया है। हिंदी के विद्वान जब पद्य को ही साहित्य की मुख्य धारा मानते थे और गद्य साहित्य को दोयम दर्जा देते थे, उस भक्तिकाल से समाज की कुरीतियों पर जो प्रहार किया था, वह व्यंग्य ही था। ऐसा माना जाता है कि भारतेन्दु युग में खड़ी बोली में हिंदी के गद्य लेखन की शुरुआत हुई। उस समय भारतेंदु हरिशचंद्र ने ‘अंधेर नगरी’ और ‘भारत दुर्दशा’ में व्यंग्य का उत्कृष्ट स्वरूप प्रस्तुत किया था। आधुनिक युग में गद्य पद्य दोनों ही विधाओं में व्यंग्य प्रचुरता में लिखा जा रहा है।

व्यंग्य साहित्य की वह विधा है, जो विषय वस्तु पर सीधा मार करती है। पाठक गुदगुदाते मन से पूरी रचना को पढ़ जाए और आखिरी वाक्य तक उत्सुकता भी बनी रहे। यही तो सधे हुए व्यंग्यकार की कसौटी है कि बाण गहरे तक धंसे, विंâतु पीड़ा न पहुंचाए।इस दृष्टि से व्यंग्यकार विजयकुमार जी सिद्धहस्त हैं।
श्री विजय कुमारजी साहित्य और पत्रकारिता के स्थापित तीरंदाज हैं। उनका मानना है, ‘‘व्यंग्य की विधा साहित्य में कुछ विशेष प्रकार की है। जैसे क्रिकेट में सफल गेंदबाज वही, जिसकी गेंद की गति, दिशा और उछाल का बल्लेबाज को अंतिम समय तक अनुमान न हो पाये। सफल फिल्म और उपन्यास भी वही होता है, जिसका रहस्य और निष्कर्ष अंत में जाकर पता चलता है। इसी प्रकार व्यंग्यकार जो संदेश देना चाहता है, वह प्राय: अंतिम दो-तीन वाक्यों में ही स्पष्ट होता है और पाठक को यात्रा करते-करते अचानक अपने लक्ष्य पर पहुंचने जैसी संतुष्टि प्राप्त होती है।

श्री विजय कुमार जी निरंतर व्यंग्य लिखते और पांञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, साहित्य अमृत, जनसत्ता, विवेक, दैनिक जागरण, स्वदेश, नाराणीयम्, स्वतंत्र वार्ता के साथ ही अंतरजाल पर प्रभासाक्षी, लोकमंच, हिंदुस्थान समाचार में छपते रहे हैं। उनमें से ही कुछ व्यंग्यों का संकलन है, ‘‘कुरसी तू बड़भागिनी’’।

श्री विजय कुमार जी के इस संग्रह में कुल ४८ व्यंग्य रचनाएं संकलित हैं। ये देश व समाज के विविध पहलुओं को छूते हुए जैसे जीवन के ककहरे को सामने लाते हैं। इन सभी रचनाओं में लक्ष्य पर तीखे प्रहार के साथ हास्य पुट भी है, जिसे व्यंग्यकार स्वयं ‘भोजन की थाली में चटनी और अचार जैसा मजा’ देने वाला मानते हैं।

संग्रह का प्रथम व्यंग्य ‘कुर्सी तू बड़भागिनी’ ही संकलन का शीर्षक है। इस व्यंग्य में श्री विजय कुमार जी ने राजनेताओं की सदैव सत्ता में बने रहने का आकांक्षा को उभारा है। इसके माध्यम से उन्होंने समाज की स्वार्थी और आत्मवेंâद्रित प्रवृति पर चोट की है। पद और प्रतिष्ठा की लालसा में सारी सीमाओं के उल्लंघन से परहेज न करने वालों की कुर्सी पाने की सोच पर वे लिखते हैं, कुरसी की महिमा अपरंपार है। यह सताती, तरसाती और तड़पाती है, यह खून सुखाती और दिल जलाती है, यह झूठे सपने दिखाकर भरमाती है, यह नाचती, हंसाती और रूलाती है, यह आते या जाते समय मुंह चिढ़ाती और खिलखिलाती है।’’

‘कुरसी तो बड़भागिनी’ में राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था व कार्यशैली, उद्योगपतियों-व्यवसायियों की स्वार्थी प्रवृत्ति, समाज, देश-विदेश की घटना, सरकारी नीति, भ्रष्टाचार, महंगाई इत्यादि विविध मुद्दों पर लिखे गए व्यंग्य हैं।
इसमें उन्हीं भावों को दर्शाया गया है, जो आज देश के एक सामान्य व्यक्ति के भाव हैं। इनमें उन्हीं दिक्कतों को प्रस्तुत किया गया है, जो दैनंदिन कार्यों में जनता को भुगतनी पड़ती है। इसलिए श्री विजय कुमार जी के अनुभव, उनकी सोच पाठक के अपने अनुभव और सोच लगते हैं।

‘मोबाइल मीटिंग’ में ब्यूरोव्रेâसी द्वारा गंभीर विषयों की उपेक्षा व लापरवाही पर करारा व्यंग्य किया गया है। राजनीतिक मुद्दों पर विजय कुमारजी ने बहुत ही चुटीले व्यंग्य लिखे है। शायद दिल्ली में रहते हुए राजनीति पर नजदीक से नजर रखने के कारण ऐसा हुआ है। उन्होंने राजनीति के अलावा अन्य मुद्दों पर बेबाकी से लिखा है। न्याय व्यवस्था, खेल, प्रशासन, साहित्य, परिवहन संचार, पर्यावरण, रहन-सहन से लेकर आतंकवाद, उदारीकरण, आर्थिक प्रगति, वेंâद्र सरकार की योजनाएं इत्यादि सभी विषयों उनके व्यंग्य रचना में समाहित है। इनसे यही लगता है कि विजयकुमारजी देश और देश की परिस्थिति पर बड़ी गहराई से चिंतन-मनन करते हैं।

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