गोमुखासन से पाएं जोड़ों के दर्द से मुक्ति

स्वास्थ रक्षा में योगासनों का विशेष महत्व है। इनसे त्रिदोषों का संतुलन बना रहता है। दोषों के असंतुलन से ही रोग जन्म लेते हैं। जिनमें वातज रोग अधिक कष्टदायक होते हैं। क्योंकि इनमें काफी तकलीफ होती है। जैसे-संधिवात, आमवात, वातरक्त आदि। इनसे निजात पाने में योगासन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इन्ही योगासनों में से एक है गोमुखासन, जिससे निश्चित ही जोड़ों के दर्द से मुक्ति मिल जाती है।

गोमुख का अर्थ है गाय का मुख। गोमुखासन में पैरों की आकृति गाय के मुख की तरह बनती है। अत: इसे गोमुखासन कहा जाता है।
विधि- भूमि पर मोटी दरी या कम्बल बिछाकर उस पर दोनों पर आगे की ओर सीधे फैलाकर बैठ जाएं। अब बायें पैर को आगे से मोड़कर इस प्रकार पीछे ले जाएं कि इसकी एड़ी गुदा के बाएं भाग के नीचे सट जाए। फिर दायें पैर को आगे से मोड़कर ऊपर से इस प्रकार लाएं कि दायां घुटना बाएं घुटने के ऊपर हो जाए और दाएं पैर की एड़ी बाएं नितम्ब के बगल में सट जाए।

ध्यान रहे- बाएं पैर का पंजा सीधा होकर भूमि को स्पर्श करता रहेगा और दायें पैर का पंजा भी भूमि से सटा रहेगा।

अब दाएं हाथ को गले के बगल से कंधे के पीछे पीठ की ओर ले जाएं। तत्पश्चात् बाएं हाथ को बायीं ओर मोड़कर बगल के नीचे से पीठ की ओर से गर्दन की ओर इतना लाएं कि दोनों हाथों की उंगलियों में ताला-सा लग जाए। ताला दो मिनट तक रखें। धीरे-धीरे सांस लें। आंखें खुली रखें। धड़ पूरी तरह सीधा और तना हुआ रहें। इसी प्रकार दायीं ओर से भी करें। इसमें दाईं एड़ी गुदा के दाएं भाग के नीचे लग जाएं और बाईं टांग को आगे से मोड़कर ऊपर से इस प्रकार लाएं कि बायां घुटना दाएं घुटने के ऊपर हो जाएं और बाएं पैर की एड़ी दाएं नितम्ब के बगल में सट जाएं। पूर्व के विपरीत (उलट) बायां हाथ नीचे के स्थान पर ऊपर की ओर तथा दायां हाथ नीचे की ओर हो जाए।
समय – एक चक्र आधा से दो मिनट तक। दोनों ओर से तीन-तीन चक्र करें।
सावधानी- एक चक्र पूरा होने पर आसन खोल कर शवासन करना न भूलें।
पुरुष जननेंद्रिय जांघों के मध्य दब न जाए, इसका ध्यान रखें। आसन के समय सिर तथा मेरुदण्ड सीधा रखें। सामने तथा पीछे झुके नहीं तथा आसन की स्थिति में हाथ की कोहनी कान के समीप सीधी रखें।

लाभ- गोमुखासन के अभ्यास से रक्त संचार सुचारू रूप से होने लगता है। परिणामस्वरूप पैरों की नाड़िया सुदृढ़ हो जाती हैं और घुटने शक्तिशाली हो जाते हैं। पैरों का गठिया, गृध्रसी (साइटिका) तथा कमर के पुट्ठों का दर्द, भुजाओं की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसके नियमित अभ्यास से बगल में होने वाली गांठ से भी मुक्ति प्राप्त होती है। हाथों की मोच ठीक होती है। इसके अभ्यास से कमर एवं उसके निचले भाग की पीड़ा दूर होती है। मधुमेह, प्रमेह, बहुमूत्र रोग, स्वप्नदोष, धातु दौर्बल्य व शुक्रदोष रोग दूर होते हैं। अण्डकोषों की वृद्धि रुकती है। पौरुष ग्रन्थि के दोष दूर करने में यह रामबाण है। चालीस वर्ष की आयु के पश्चात् पुरुष वर्ग को गोमुखासन अवश्य करना चाहिए। यह ब्रह्मचर्य पालन में भी सहायक है। यह विषैले पदार्थोंं को किडनी के द्वारा बाहर निकाल कर मूत्रावरोध (मूत्र रुकना) को दूर करता है।

महिलाओं के मासिक धर्म एवं प्रदर में इससे अच्छा लाभ होता है। गर्भाशय और योनि की शिथिलता दूर होती है। गर्भाशयभ्रंश होने की संभावना नहीं रहती। इसके नियमित अभ्यास से स्तनों की मांसपेशियां सशक्त होती हैं। जिससे स्तन सुदृढ़, कठोर और आकर्षक होते हैं।

गर्दन संबंधी दोष, पीठ की कशेरुका रोग में लाभ करता है। वक्ष प्रदेश को सशक्त बनाता है और उसका विस्तार भी करता है। कंधे सरलता से घूमने लगते हैं।

इसके अभ्यास से फेफड़ों का व्यायाम हो जाता है। चिकित्सा शोध से ज्ञात हुआ है कि गोमुखासन से फेफड़े संबंधी व्याधियां राजयक्ष्मा, श्वास-कास में लाभ होता है। दमे का दौरा समाप्त हो जाता है। श्वासनलियों की सिकुड़न धीरे-धीरे कम हो जाती है। जिससे श्वास-प्रश्वासन में किसी भी तरह का कष्ट महसूस नहीं होता। अत: दमा एवं क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति को यह आसन अवश्य करना चाहिए। निम्न एवं उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा फेफड़ों के रोगों के निवारण में इसकी उपयोगिता है। लम्बे समय तक ध्यानरत रहने में उपयोगी है।

निषेध – खूनी बवासीर के रोगी इसका अभ्यास न करें।

अस्थि रोगों में
लाभकारी मत्स्यासन

विधि– समतल भूमि पर कंबल बिछाकर पद्मासन में बैठ जाएं। दोनों पैर सामने की ओर फैलाएं। अब दोनों हाथों से दाहिने पैर को घुटने से इस प्रकार मोड़ें कि एड़ी उदर भाग से सट जाएं और पंजे की उंगलियां जांघ के बाहरी भाग तक फैली रहे।

अब बाएं पैर को घुटने से मोड़ते हुए अंदर की ओर लाएं तथा दोनों हाथों से एड़ी और पंजे को सहारा देते हुए दाहिनी जांघ के जोड़ पर जमाएं। दोनों हथेलियों तथा जोड़ों को मुलायम तथा लचीला बनाने का अभ्यास कर लें।

तत्पश्चात् हाथों की कुहनियां के सहारे पीछे की ओर श्वास बाहर निकालते हुए धीरे-धीरे पीठ के बल लेट जाइए। दोनों हथेलियों को कंधों के बगल में इस तरह रखें कि धड़ ऊपर उठ जाए। अब श्वास को बाहर निकालते हुए कमर को जितना धनुषाकर उठा सकें उठाएं।

अब सिर को पीछे की ओर इस तरह फैलाएं कि एक ओर सिर की शिखा (चोटी) और दूसरी ओर नितंब भूमि पर दृढ़तापूर्वक टिके रहें। इसके बाद दाएं हाथ की तर्जनी से बाएं पांव का अंगूठा तथा बाएं हाथ की तर्जनी से दाएं हाथ का अंगुठा पकडें। फिर दोनों घुटनों को धरती से सटाकर पृष्ठ भाग को इतना ऊपर उठाएं कि समस्त शरीर मात्र दो घुटनों और सिर के आधार पर उठ जाए और कुहनियां भूमि पर रहें। श्वास को रोकें, दांत मिचे हुए, मुख बंद रखें। तत्पश्चात् हाथ खोलकर कमर भूमि से सटाकर और सिर ऊपर उठाकर पूर्वस्थिति में आ जाएं।

लाभ- मत्स्यासन के अभ्यास से शरीर में सहनशीलता, शीघ्रता, संघर्ष करने की क्षमता, तीव्र गति से कार्य करने की शक्ति आदि का विकास होता है। यह आसन शरीर की मांसपेशियों में होनेवाली ऐंठन तथा अस्थि-विकारों में लाभकारी है। इसके अभ्यास से आमवात (गठिया) रोग से बचाव होता है। इस आसन के करने से रीढ़ का झुकाव, कमर, गला व पेट के विकार नहीं होते। इससे पीठ की मांसपेशियों के साथ-साथ गर्दन एवं जांघों का व्यायाम भी अच्छी तरह हो जाता है। यह वात रोगों के शमन में बहुत उपयोगी आसन है। मत्स्यासन करने से यकृत, प्लीहा एवं आमाशय की मालिश होने से पाचन एवं मल-विसर्जन क्रिया सुचारू रूप से होती है। इस प्रकार यह आसन आमवात (गठिया) में विशेष लाभकारी है।
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