भारतीय स्थापत्य कला का सुन्दर वर्णन करती पुस्तक

भारत का गुफा स्थापत्य
पुस्तक का शीर्षक: भारत का गुफा स्थापत्य
लेखक: पूनम प्रसाद
प्रकाशक: प्रारब्ध प्रकाशन
185, नया मम्फोर्ड गंज,
इलाहाबाद-211002
संस्करण: प्रथम, 2011 ई.
आकार व स्वरूप : डिमाई सजिल्द, चित्र आर्ट पेपर पर
पृष्ठ संख्या: 160
मूल्य: रू. 250/-

 

सामान्यत : पहाड़ों में स्थित कन्दराओं को गुफा कहा जाता है। बहुधा इन गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक रूप से होता है। प्रागैतिहासिक काल में वर्षा, ताप व शीत से बचाव के लिए मनुष्य व अन्य जीव-जन्तु इन गुफाओं में शरण लेते थे। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि तपस्या करते हुए इनमें एकान्त वास किया करते थे। धीरे-धीरे विभिन्न धर्मावलम्बियों ने अपने धार्मिक क्रिया-कलापों के लिए गुफाओं का उपयोग किया। प्राकृतिक रूप से निर्मित गुफाओं की कमीं और उनके आकार में लघु होने से जब आवश्यकता की पूर्ति नहीं होने लगी तो लोगों द्वारा छेनी-हथौड़ी की सहायता से पहाड़ो के गर्भ को काट व तराश कर बड़े आकार और अलंकारिक गुफाओं का निर्माण किया जाने लगा। कहीं-कहीं इन गुफाओं का आकार इतना विशाल है कि भीतर से वे महल जैसा दिखाई देती हैं।

भारत भर में पहाड़ों में गुफाओं का निर्माण किया गया है। इन सबका विस्तार से परिचय कराती हुई पुस्तक ‘भारत का गुफा स्थापत्य’ विदुषी इतिहास लेखिका पूनम प्रसाद ने लिखी है। इस पुस्तक में देशभर की गुफाओं का काल, संरचना, कला, स्वरूप और आकृति की दृष्टि से बड़े सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है, जो इतिहास के अध्येताओं, विद्यार्थियों, पर्यटकों और सामान्य जानकारी प्राप्त करने वालों के लिए बहुत उपयोगी है।

कृत्रिम गुफाओं के निर्माण का इतिहास मौर्य सम्राट अशोक से शुरू होता है। मगध के शासक के रूप में उन्होंने सर्वप्रथम गुफाओं का निर्माण आजीवक भिक्षुओं के लिए बराबर और नागर्जुनी पहाड़ों (दोनों वर्तमान बिहार राज्य में) में कराया। आगे चलकर जब वे शाक्य मुनि के अनुयायी बने, तो बौद्ध भिक्षुओं के लिए भी गुफाओं को बनवाया। इन गुफाओं को देखकर ही भारत और विदेशों में गुफा-निर्माण की परम्परा शुरू हुई। यह कार्य सम्राट अशोक ने अपने शासन के बारहवें वर्ष अर्थात 252 ईसा पूर्व में करवाया था। ये प्रारम्भिक गुफाएं अलंकार की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। प्रथम अलंकारिक गुफा लोमस की ऋषि गुफा (बिहार) है। इसके उपरान्त गुजरात, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कोंकण, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु इत्यादि राज्यों में शासकों द्वारा गुफाओं का निर्माण कराया गया।

पूनम प्रसाद जी ने संरचना के आधार पर गुफाओं को तीन श्रेणियों- ‘चैत्य’, ‘विहार’, (भिक्षुक गृह) और ‘शाला’ में विभक्त किया है। चैत्य बौद्ध धर्म के मन्दिरों को कहा जाता है। इन गुफाओं का आरम्भ व विकास मुख्यत: पश्चिम भारत में हुआ। विहार पहाड़ों को तराशकर के बनायी गयी उन गुफाओं को कहा जाता है, जिनमें बौद्ध भिक्षु निवास करते थे तथा शाला उन्हें कहते हैं जिनमें बौद्ध धर्म के अनुयायी सामूहिक रूप से प्रार्थना व सभा किया करते थे। इन सबका बहुत सुन्दर ढंग से व्यवस्थित व कालक्रम के अनुरूप वर्णन इस पुस्तक में किया गया है।

गुफाओं का निर्माण प्राय: मन्दिरों के रूप में कराया जाता था, इसलिए इनकी स्थापत्य योजना धार्मिक मान्यताओं और कर्मकाण्डों की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित की जाती थी। गुफाओं का निर्माण मुख्य तीन सम्प्रदायों बौद्ध, जैन व ब्राह्मण (सनातन वैदिक) के अनुयायियों द्वारा किया गया है। बौद्ध गुफाओं में सामूहिक प्रार्थना की दृष्टि से बड़े कक्ष के रूप में मन्दिर बनाया जाता था। जैनियों द्वारा तीर्थंकरों की पूजा की जाती है, इसलिए जैन गुफाओं में चौबीसों तीर्थंकरों की मूर्तियां लगायी जाती थीं। जैन गुफाएं अत्यधिक अलंकृत हैं। ब्राह्मण सम्प्रदाय में व्यक्तिगत आराधना (तपस्या) की मान्यता होने के कारण गुफा-मन्दिर के भीतर एक गर्भगृह बनाया जाता था। सम्प्रदाय के अनुरूप इन गुफाओं का निर्माण, उनका कालखण्ड, आरम्भ व विकास इत्यादि का वर्णन एक-एक गुफा को ध्यान में रखकर पुस्तक में विस्तार से किया गया है।

देश में गुफाओं का निर्माण कई समूहों में किया गया है। इन एक-एक समूहों में कई-कई गुफाओं का निर्माण किया गया है। भाजा समूह, नाशिक समूह, जुन्नार समूह, कार्ले समूह, अजन्ता समूह, कन्हेरी समूह, बाघ समूह, बादामी समूह, औरंगाबाद समूह, एलोरा समूह (यहां पर बौद्ध, जैन व ब्राह्मण तीनों गुफाएं स्थित हैं), एलीफैंटा समूह के रूप में विभाजित इन गुफा समूहों की प्रत्येक गुफा का वर्णन पूनम प्रसाद ने बड़ी सूक्ष्मता से किया है।
विदुषी लेखिका ने इन गुफाओं का वर्णन देश-विदेश के विद्वानों द्वारा किये गये गुफा-वर्णनों को आधार मानकर स्वयं के प्रत्यक्ष निरीक्षण व अध्ययन के अनुरूप किया है। देशभर की गुफाओं का भ्रमण करके वहां समय बिता करके तथ्यों का संकलन उन्होंने किया है। उनके अध्ययन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसके लिए उन्हें किसी संस्था या शासन द्वारा आर्थिक सहायता नहीं प्रदान की गयी। स्वयं आर्थिक भार वहन करके पूनम जी ने यह ऐतिहासिक कार्य किया है, इसके लिए वे अभिनन्दनीय हैं। उनकी एक अन्य पुस्तक स्तूपों पर शीघ्र ही आने वाली है।
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