जीव एवं पर्मावरण रक्षक संस्था मसमस्त महाजनफ

गुजरात की प्रसिध्द सामाजिक सांस्कृतिक संस्था मसमस्त महाजनफ ने सामाजिक, सांस्कृतिक और मूल्याधारित शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया है। जीवदया और गोसेवा के क्षेत्र में संस्था का अतुल्य काम है। संस्था के कार्यों पर संस्थापक योगेश शाह से हुई भेंटवार्ता के कुछ महत्वपूर्ण अंश पेश हैं-

मसमस्त महाजनफ द्वारा जो सामाजिक कार्य किए जा रहे हैं उनका संस्कार स्त्रोत क्या है?

संस्कार के स्त्रोत हमारे प. पू. चंद्रशेखरजी विजय महाराज हैं। उन्होंने मुझे यह सामाजिक कार्य का चिचार विचार दिया। 1982 में मैं उनसे पहली बार मिला था। मैं तब युवा अवस्था मे था। 1990 तक मैं मेरे उद्योग में सफल रहा। तब तक बीच बीच में उनके दर्शन होते रहते थे। 1996 में उनके इसी तरह दर्शन हो गये। तब अचानक उनके मुंह से निकला कि तुमने उद्योग में बहुत कुछ कमाया है, अब थोड़ा जीवदया का काम करो। मुझे आश्चर्य हुआ। वह मेरे गुरु थे। उनकी आज्ञा प्रमाण मानकर मैने जीवदया का कार्य करना प्रारंभ किया।

मेरा कार्यालय मुंबई की प्रतिष्ठित जगह पर है। मेरे संपर्क में अच्छे उद्यमी हैं। उनसे सहयोग लेकर गौ सेवा का कार्य करने का निश्चय किया। पंधर-बीस दिन बीत गए। गौ सेवा के कार्य के लिए जितनी आर्थिक सहायता की अपेक्षा थी उसे मै पूरी नहीं कर पा रहा था। कारण यह कि मैं किसी से कुछ मांगने से हिचकता था।

एक माह के बाद फिर से गुरुदेव के पास गया और कहा कि जिस जीवदया कार्य का दायित्व आपने मुझ पर सौंपा है उसके लिए किसी से कुछ मांगने का काम मैं कर नहीं पाऊंगा।

गुरुदेव ने कहा कि गुजरात में गोशाला का कार्य करने वाले सभी महाजन मांगते फिर रहे हैं। महाजन का अर्थ होता है प्रतिष्ठित व्यक्ति। वह किसी के सामने हाथ फैलाने वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए। वह तो देने वाला व्यक्ति होना चाहिए। समाज की कुछ व्यवस्था टूट चुकी है। तुम कुछ ऐसी व्यवस्था खोजो कि सभी समस्या निराकरण हो जाए।

समस्त महाजनफ शब्द का मूल अर्थ क्या है?

ममहाजनफ इस शब्द का अर्थ है अच्छे लोग, जो समाज, धर्म, अर्थ, शिक्षा आदि का समाज के हित में विचार करते हैं। गुजरात मे ऐसे महाजन गौ सेवा या पांजरापोल के कार्य में ज्यादातर सक्रिय हैं। ऐसे गुजरात के सभी महाजनों का हमने एक संगठन बनाया। इस लिए इस संगठन का नाम मसमस्त महाजनफ रखा गया।

समस्त महाजनफ की स्थापना का मूल उद्देश्य क्या है?

संपूर्ण विश्व में कोई भी जीव भूखा न सोए और भूख की वजह से नहीं मर जाए। मनुष्य मांग के खा सकता है पर मूक जीव मांग नहीं सकते। हमारे कार्य का प्रारंभ यहीं से होता है। मछली को आटा देना है, पक्षी को दाना देना है और पशु को चारा देना है। इस कार्य की पूर्ति के लिए कार्य करना यह हमारा प्रमुख उद्देश्य है।

दूसरा उद्देश्म है, मूल्म आधारित शिक्षा देना। आज अपनी परंपरा, संस्कारों से जुड़ी शिक्षा व्मवस्था लुप्त होती जा रही है। उस शिक्षा व्मवस्था का मानी मूल्म आधारित शिक्षा व्मवस्था की पुनर्स्थापना करना। उसके प्रचार प्रसार हेतु अपना मोगदान देना।

प्राकृतिक आपदा में समाज को सहायता देना इस प्रकार से मसमस्त महाजनफ के प्रमुख उद्देश्य है। जल, जंगल, जानवर और जमीन इन चार बातों के संवर्धन के लिए अपना संपूर्ण योगदान देना यह समस्त महाजन की कार्य की दिशा है।

कार्म प्रत्मक्ष रूप में किस तरह आरंभ हुआ?

गोपालन मा पशुपालन के लिए तीन चीजें महत्वपूर्ण हैं- एक गौचर, दूसरी बात पानी और तीसरी महत्वपूर्ण बात वृक्ष।
इसी के आधार पर हमने हमारा सूत्र बनाया चरागाहों का विकास, देसी गायों का संवर्धन, और पानी का संचय। इसी सूत्र पर प्रत्यक्ष अमल के लिए गुजरात में संपर्क करना प्रारंभ किया। महसूस हुआ कि गांव गांव में गौशालाओं के पास हजारों एकड़ जमीन ऐसे ही पड़ी है। उस पर कोई कार्य नहीं होता है। गौशाला के संचालक उस जमीन पर कोई कार्य करने की इच्छा नहीं रखते थे। हमने उनसे कहा कि चलो चारा उगाने का काम हम कर लेते हैं। उस तरह से हमने चरागाह का प्रोजेक्ट डेवलप किया।

प्रथम हमने छापरीयाली पांजरापोल की 3600 एकड़ जमीन ले ली। वहां जमीन विकसित करने का काम शुरू किया। वहां पांजरपोल होने की वजह से पशु तो थे ही। उनसे गोबर मिल गया। उस गोबर का उपयोग करके 500 एकड़ जमीन में पानी का संचय और उसका वैज्ञानिक दृष्टीकोण से उपयोग करने के लिए एक अच्छी व्यवस्था तैयार की। अलग-अलग तरह के चारे का निर्माण किया। 45 प्रकार के चारों का निर्माण वहां पर हुआ। संपूर्ण बंजर भूमि हरीभरी हो गई। इसमें हमने कोई संघर्ष नहीं किया। स्वाभाविकता से कार्य करते गये और आगे बढ़ते गये। इसी सरलता से 12,000 एकड़ भूमि पर हमने यह काम किया है। अन्य 60,000 एकड़ भूमि पर काम अभी होना है। यह हमारे जैसे व्यापार क्षेत्र में काम करने वालों के लिए संतोष की बात है।

इस कार्म की पूर्ति के लिए आर्थिक मोगदान कैसे प्राप्त किमा?

गुरुदेव की कृपा से कार्म को दिशा मिलती गई। हमने समस्त महाजन का एक संचालक मंडल गठित किमा। गठन के समम मह विचार हमने सभी के सामने रखा कि लोगों के चंदे के सहारे सेवा कार्म करने के बजाए संचालकगण अपने प्रत्मक्ष मोगदान से इस संगठन के कार्म पूरा करें। हमारा संगठन 500-600 समर्पित महाजनों का है। उन्हें काम भी करना है और अपना आर्थिक मोगदान भी देना है।

जो आर्थिक सहामता मिलती है उसे तुरंत समान कार्म मा संस्था के उद्देश्म के लिए खर्च किमा जाता है, न कि उसकी बैंक में फिक्स डिपॉजिट होती है। जितना धन जमा होता है उससे अलग-अलग संस्थाओं को सहामता देते हैं। समस्त महाजन की मह नीति है मनो फिक्स डिपॉजिट।फ बैंक में हमारी कोई जमापूंजी नहीं है। पैसा हमारे संगठन से ही निर्माण होता है और समाज कार्म हेतु समाज कोे समर्पित होता है। प्राणलाल भाई दोशी, मनुभाई शांतिलाल शाह, रवींद्रभाई, अशोक भाई, हसमुखभाई ऐसे 8 मुख्म ट्रस्टी हैा। हमारे महा ट्रस्टी और कार्मकर्ता में भेद नहीं है। कार्मकर्ता और ट्रस्टी सभी अपने उद्योग से समम निकाल कर मह कार्म उत्साह से कर रहे हैं।

मसमस्त महाजनफ के माध्यम से अन्य संगठनों को आर्थिक सहायता दी जाती है। उसका मापदंड क्या है?

समाज में सामाजिक कार्य करने वाली अनेक संस्थाएं हैं। इनमें से बहुत सारी संस्थाएं हमारे पास से योगदान की अपेक्षा से आती हैं। सहायता मांगने वाली संस्था के संचाालक कितने समर्पित हैं, उनका आर्थिक आयव्यय कैसा है, सबसे पहले उनका उद्देश्य क्या है उसका विचार करते हैं। वह तालाब बनायेंगे, चारा भूमि निर्माण करेंगे, वृक्ष लगाएंगे, जमीन उपजाऊ करेंगे ऐसी बातों को ध्यान में लेकर ही हम अन्य संस्थाओं को मदद देते हैं। उनके कार्य से पशुओं का विकास हो, जमीन को लाभ मिले, जंगल बढ़ने में सहयता हो, प्राणियों के साथ मानव को लाभ हो यह हम देखते हैं।

पर्मावरण के संदर्भ में आप क्मा सोचते हैं?

कार्बन क्रेडिट की बात आजकल बहुत चल रही है। दिन भर में कार्बन प्रदूषण होता ही रहता है। आज पर्यावरण की बातें हम सब करते हैं लेकिन पर्यावरण की रक्षा हेतु प्रत्यक्ष योगदान देने की बात आती है तो हम कुछ नहीं करते। हम दिन भर पेट्रोल जलाते हैं और अन्य बातों से भी पर्यावरण का बहुत नुकसान करते हैं। महाराष्ट्र सरकार ने 100 लाख वृक्ष लगाने की घोषणा की है। यह नासमझी की बात है। इतने वृक्ष लगाएंगे तो जगह जगह पर भारी मात्रा में वृक्ष ही होंगे। ये सरकारी बाबू जून के दूसरे सप्ताह में वृक्ष लगाते हैं। 15 जुलाई तक जोरों से बारिश होती है। जिसमें सारे वृक्ष पौधें बह जाते हैं। यह होता है सरकार द्वारा किया गया वनीकरण उपक्रम। इसी प्रकार का आयोजन गत – 50 वर्षों से हो रहा है। ऐसे नुकसानदायी उपक्रमों से पर्यावरण नहीं बचेगा। पर्यावरण तब बचेगा जब हम योजनापूर्वक कोई विचार करें। हर गांव में पड़ती जमीन होती है। वहां पर बरगद, पीपल, आम, इमली, नीम, हरड़ा, बेहड़ा, आमला, शमी, बेलपत्र, जामुन और औदुंबर इस प्रकार के वृक्ष बारिश के हस्ती नक्षत्र के बाद लगाएंगे तो अच्छे पनपेंगे। हर गांव में प्रति व्यक्ति 5 पौधें लगाने चाहिए। इस प्रकार पर्यावरण रक्षा का विचार होना चाहिए।

पर्मावरण रक्षा के लिए मोर्चे, आंदोलन होते हैं। इससे पर्मावरण रक्षा कितनी होती है वे ही जाने, पर पर्मावरण रक्षा के लिए दिखावे के बजाम प्रत्मक्ष कृति की जरूरत है।

क्मा पर्मावरण रक्षा के लिए मसमस्त महाजनफ ने भी वृक्षारोपण किमा है?

हमारी संस्था के माध्यम से अभी तक 22,000 हजार वृक्षों का यशस्वी रोपण किया गया है। इस कार्य के लिए भारत सरकार से हमारी संस्था को मइंदिरा प्रियदर्शनी पुरस्कारफ से सम्मानित किया गया है।

हम कार्य करते हैं अपनी आत्मा की शांति के लिए। पुरस्कार पाना यह हमारे कार्य का लक्ष्य नहीं होता। हम किसी भी पुरस्कार के लिए खुद को कतार में खड़े नहीं करते हैं। मन:शांति यह हमारे कार्य की मूल प्रेरणा है।

गोरक्षा के संबंध में आपके क्या विचार हैं?

गौ और पशु में हम फर्क नहीं करते। भारतीय संस्कृति में किसी भी जीव कत्ल होना उचित नहीं माना जाता। गाय, बैल, बकरी, मुर्गी कोई भी जीव हो उसकी हत्या अनुचित ही है। गाय को बचाना है तो पहले चरागाह बनाने होंगे। आज किसान गाय क्यों बेच रहा है? इसलिए कि गाय को खिलाने के लिए चारा नहीं है। अतिलाभ के चक्कर में घास की जगह कपास उगाया जा रहा है। चारा खरीदना कठिन हो रहा है।

हजारों करोड़ की लागत से रासामनिक उर्वरक बनाने के कारखाने खड़े हो रहे हैं। लेकिन गाम के लिए 5 रु. का चारा उपलब्ध हो इस तरह के उपक्रम सरकार की ओर से नहीं चलाए जाते। मह विषमता है। गाम फिर कैसे बचेगी?

सिर्फ मंदिर के बाहर चारा खिलाने का धर्म करने से गाय नहीं बचेगी। किसानों को गाय का वैज्ञानिक, आर्थिक और धार्मिक उपयोग व महत्व समझाना पड़ेगा। गाय से किसान को किस प्रकार लाभ है यह बताना पड़ेगा। अपने यहां हर गांव में ठाामसेवक हैं, तलाठी हैं, ठाामपंचायत है। भारत सरकार का कृषि मंत्रालय इनके जरिए गाय को बचाने का कार्यक्रम चला सकता है। गाय, वृक्ष और गांव एक दूसरे से सम्बध्द हैं। गाय बचेगी तो पेड़ बचेंगे। पेड़ बचेंगे तो गांव बचेगा। यह एक शृंखला है। भारत सरकार रासायनिक खाद पर जो सब्सिड़ी देती है, वह पशु रक्षा के लिए दें तो गौ परियोजनाएं, पांजरापोल, पशुओं की रक्षा हो सकती है। आगे इससे अनेक लाभ हो सकते हैं।

समस्त महाजन के अन्य उपक्रम कौनसे हैं?

आज की पीढ़ी को हम मूल्यरहित शिक्षा दे रहे हैं। इससे समाज का स्तर गिरता जा रहा है। मसमस्त महाजनफ ने पहली से बारहवीं तक मूल्याधारित, अपनी संस्कृति से जुड़ा, भविष्य में अच्छे संस्कार देने वाला, समाज निर्माण करने वाला शिक्षा पाठ्यक्रम विकसित किया है। हमने गुजरात सरकार को यह शिक्षा पाठ्यक्रम पेश किया है।

इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकम्प, सुनामी, बाढ़, बारिश का प्रलय होने पर हम सहायता करते हैं। यह सहायता हम पैसे के रूप में नहीं देते। उस क्षेत्र का विकास करते हैं।

समस्त महाजन को दस साल पूरे हो रहे हैं। आप जब इसका पुनरावलोकन करते हैं तो क्या पाते हैं?

एक ही बात बता सकता हूं। आत्मा को बहुत संतोष मिलता है। उसी के लिए काम करते हैं। 12,000 एकड़ में काम किया है। 12,000 एकड़ भूमि का वनीकरण हुआ है। 80 तालाब बनाए गए हैं। करोड़ों रुपया समाज कार्य के लिए सामाजिक संस्थाओं को दान में दिया है। अनेक पांजरापोल व गौसेवा परियोजनाओं को हमने बल प्रदान किया है। दस साल में ये उपलब्धियां मसमस्त महाजनफ ने पाई हैं। यह कार्य राष्ट्र, समाज, पर्यावरण और धर्म से जुड़ा है तो उस कार्य से मन को शांति तो मिलती ही है।

भविष्म की मोजनाएं क्मा हैं?

गुजरात के तिवरा पोल 242 हैं। उनकी 72,000 उनकी जमीन है। उसका हमें विकास करना है। शिक्षा के क्षेत्र में 10,000 विद्यार्थियों को मूल्य आधारित शिक्षा देने का प्रकल्प हम तय कर रहे हैं। अगले साल प्रथम चरण में 1000 विद्यार्थी इस शिक्षा पद्धति से जुड़ जायेंगे। संपूर्ण भारत की गो सेवा के संदर्भ में सरकार के साथ मिलकर हम गौ-सेवा, गौ-प्रकल्प, गौ-उद्योग से जुड़ी अपनी सोच संपूर्ण भारत के किसानों तक पहुंचाने का प्रकल्प तैयार कर रहे हैं। जिससे चारा भूमि, तालाब, पशु और साथ में देश का किसान समर्थ होगा। फिलहाल हमारा कार्य गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तक सीमित है। भविष्य में वह और फैलेगा।
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