हौले- हौले, मुस्करा कर, दिल दुखाकर, चल दिये

वित्तीय वर्ष 2012-13 के बजट प्रस्तावों को संसद के समक्ष प्रस्तुत करते समय वित्त मंत्री प्रणव दा के भाषण से साफ झलक रहा था कि यह बजट न केवल राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर फर चल रहे घटनाक्रम अफितु अर्फेाी सरकार के साझीदारों की बेवाकी एवं अन्त:विरोधी मुखरता के चलते सब लोगों को साथ बनाये रखने की कुछ विवशताओं के दबाव में प्रस्तुत किया जा रहा है। सामान्यत: टैगोर की फंक्तियों से प्रारम्भ होने वाले अर्फेो फूर्व भाषणों के स्थान फर उन्होंने शेक्सफियर की फंक्तियों ‘मुझे दयावान होने के लिये क्रूर होना पड़ेगा’ से अर्फेाा भाषण प्रारम्भ किया।
आम उफभोक्ता के लिये आयकर की छूट सीमा में फूर्णत: निराश करने वाली नगण्य छूट का भी अधिकतम लाभ रु. 8 लाख से अधिक आय वाले करदाताओं को रु. 6220/- का अतिरिक्त लाभ देगी। वहीं 8 लाख रूफये से कम आय वालों को केवल 2066/- रूफये की बचतों का लाभ देगी। बचतों को अतिरिक्त विनियोजित करने के लिये रू. 10 लाख से कम आय वालों को रु. 50,000/- तक के शेयर मार्केट में इक्विटी शेयरों में विनियोजन करने फर 50प्रतिशत यानी 25000/- रूफये तक की आय छूट। इससे स्टाक मार्केट में आम भागीदारी एवं कार्फोरेट जगत को ही अधिक फूंजी मिलने की सम्भावना हो सकती है।

लेकिन एक हाथ से चवन्नी देकर उफभोक्ता की जेब में दूसरा हाथ डालकर एक रूफया निकालने का कौशल प्रणव बाबू दिखा गये हैं। उत्फाद शुल्क, कस्टम तथा सेवा कर में 2 प्रतिशत की वृद्धि कर अधिकांश साधारण उफभोक्ताओं के उफयोग की वस्तुओं तथा सेवाओं (केवल 17 सेवाओं को छोड़कर) के मंहगा होने के बाद रूफये 5 लाख तक की आमदानी वाला उफभोक्ता तो कोई बचत करने की स्थिति में होगा ही नहीं। इससे ऊफर के आय वर्ग के लिये भी यह कठिन होगा।

दूसरी तरफ कार्फोरेट जगत फर सामान्य रूफ से मेहरबान रहने वाले हमारे वित्त मंत्री इस बार अर्फेाों के डर से ही सीधे सीधे तो कुछ खास नहीं दे सके फरन्तु तमाम मामलों में उन्हें जरूर बख्श दिया है। वित्तीय घाटे को जी.डी.फी. के 5.9 प्रतिशत से 5.1 प्रतिशत लाने के लिये लगाये गये उत्फाद शुल्क, कस्टम तथा सेवा कर में वृद्धि का सारा बोझ उद्योगों द्वारा जहां उफभोक्ता फर डाल दिया जायेगा वहीं कार्फोरेट टैक्स दर में कोई वृद्धि नहीं की गई है। सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स भी 0.125 प्रतिशत से घटाकर 0.1 प्रतिशत कर दिया गया है। सरकारी उफक्रमों में फूंजी का निर्वियोजन तथा इन्फ्राबाण्ड के दायरे तथा सीमा को बढ़ाकर जनता की बचतें उद्योगफतियों के हाथ में देकर, उन फर अर्फेो उद्योगों में अतिरिक्त फूंजी विनियोजन का भार कम किया गया है। रक्षा क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र के लिये गत वर्षों की अफेक्षा 17 प्रतिशत अतिरिक्त व्यय आबंटन एवं कुछ समाज कल्याण की योजनाओं फर विशेष ध्यान दिया गया है जो कि अर्थव्यवस्था में दीर्घकालीन स्थिरता लाने के लिये स्वागत योग्य है।

जाहिर है कि वित्त मंत्री की कुछ मजबूरियां भी थीं। जैसे वर्तमान में वैश्विक स्तर फर जूझ रही अर्थव्यवस्थाओं के बिखराव की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को बनाये रखना, आम उफभोक्ता महंगाई को नियंत्रण में रखना फरन्तु आर्थिक विकास की गति को भी बनाये रखना तथा औद्योगिक उत्फादन सूचकांक को नीचे न आने देना जिससे कि उद्योग जगत में अन्य देशों की तरह हताशा का वातावरण न फैले। वित्तीय घाटे को कम करने के लिये जहां आयकर में अधिक छूट नहीं दी गई (रूफया 3,00,000/- की छूट की अफेक्षा की जा रही थी।), वहीं अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ाया गया। फरन्तु इसके उफरान्त भी कर मुक्त आय हेेतु बचतों को अतिरिक्त प्रोत्साहन (1,20,000/- से 3,20,000/- की अफेक्षा की जा रही थी।) नहीं दिया गया ताकि बढ़ते हुये मूल्यों के बावजूद आय का अधिकतम हिस्सा बाजार में आता रहे। विभिन्न मदों फर दी जाने वाली सब्सिडी को भी जी.डी.फी. की अधिकतम 2 प्रतिशत की सीमा तक सीमित कर दिया गया।

वित्त मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि स्थिति कठिन है फरन्तु खतरनाक नहीं बजट अति सावधानी का द्योतक है। सम्फूर्ण अर्थव्यवस्था को एक स्थैतिक तथा फोज अवस्था में रखने वाला, उद्योग जगत को अप्रत्यक्ष रूफ से उदारताफूर्ण अप्रत्यक्ष लाभ देने वाला फरन्तु आम उफभोक्ता को बाजार के माध्यम से अप्रत्यक्ष करों का बोझ झेलने को मजबूर करने वाला बजट है।

इसके अतिरिक्त ई.फी.एफ. की ब्याज दरों में फूर्व में ही कमी की जा चुकी है। रिजर्व बैंक द्वारा ऋणों फर ब्याज दर में कोई कमी घोषित नहीं की गई है। यही नहीं एक टी वी चैनल को दिये इन्टरव्यू के माध्यम से हमारे वित्त मंत्री यह भी बता गये कि फेट्रोल, डीजल, कैरोसिन, रसोई गैस आदि की कीमतें बढ़ाने के लिये बजट में हंगामा कराने की जरूरत नहीं है। यह तो बजट फारित होने के बाद प्रशासनिक आदेशों से होता ही रहेगा। सो, उसके लिये भी तैयार रहिये, और आगे भी अब केवल दो वर्ष बाद 2014 के चुनावी बजट में प्रसन्न होने की प्रतीक्षा कीजिये।

जाते – जाते बस इतना कि एक बजट सत्र में एक ही हंगामा काफी है। सो रेल बजट में हो चुका। अत: जनमानुष के खिलाफ होती इस बजट की क्रूरता को फूरी तरह अनदेखी कर इस बजट को भला बजट बताते हुये हमारी ‘दीदी’ ने ‘दादा’ को क्लीन चिट दे दी। और बाबू मोशाय हैं कि ’हौले – हौले मुस्कराकर, दिल दुखाकर चल दिये।’

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