उपभोक्ता संरक्षण कानून के 25 वर्ष

24 दिसम्बर 1986 को राष्ट्रपति ने उपभोक्ता संरक्षण कानून को अपनी मंजूरी दी थी। इस तरह इस कानून ने अपने अस्तित्व के 25 साल पूरे कर लिए। इस अवधि में देश की विभिन्न उपभोक्ता अदालतों में 37 लाख मामले दायर किए जा चुके हैं। उपभोक्ता संरक्षण कानून में सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए एक न्याय प्रणाली स्थापित की गई। इससे उपभोक्ता संरक्षण की अवधारणा में एक बड़ा बदलाव आ गया। इस कानून की मदद से उपभोक्ताओं ने राज्य एजेंसियों की अक्षमता और भ्रष्टाचार, खुदरा कारोबार के क्षेत्र में अनुचित व्यापार व्यवहार, स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और रेलवे तथा विमान कंपनियों की उदासीनता को समय समय पर चुनौतियां दीं।

उपभोक्ता अदालतों के गठन के बाद का समय उपभोक्ताओं के लिए ऊंची उम्मीदों और निराशाओं का दौर साबित हुआ। उपभोक्ता अदालतों के जरिए उपभोक्ता व्यापारियों, उत्पादकों और सेवा मुहैया कराने वालों की मनमानी से लड़ सकते थे। उपभोक्ता अदालतों में ग्राहकों की शिकायतों से ऐसे कई फैसले आए जिनसे कि उपभोक्ताओं के कानूनी अधिकारों को और मजबूती मिली। लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम एम. के. गुप्ता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य द्वारा संचालित विकास एजेंसियों को उनकी अक्षमता और ढिलाई के लिए फटकारा। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि इस तरह के घटिया सेवाओं के शिकार व्यक्ति मुआवजा पाने के पात्र हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि यह फैसला निजी बिल्डरों पर भी लागू होता है। इंडियन मेडिकल असोसिएशन बनाम बी. पी. शांता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल व्यावसाइयों की इस दलील को ठुकरा दिया कि वे उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में नहीं आते हैं। इस फैसले तथा इसके बाद कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत द्वारा दिए गए आदेशों से भारत में मरीजों का अधिकार परिभाषित हुआ। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट और उपभोक्ता अदालतों के विभिन्न फैसलों से उपभोक्ता अधिकारों की तस्वीर स्पष्ट होनी शुरू हुई लेकिन न्याय मिलने में देरी से उपभोक्ता न्याय प्रणाली कमजोर साबित होने लगी। इसके कई कारण थे। शुरू से ही राज्य सरकारें उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत राज्य और जिला स्तरों पर उपभोक्ता अदालतों के गठन के मसले पर उदासीन रवैया अख्तियार कर रही थीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक सख्त चेतावनी दिए जाने के बाद में उन्होंने उपभोक्ता अदालतों का गठन किया। इसके बाद उपभोक्ता अदालतों के सदस्यों को नियुक्ति में देरी की जाती रही। इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता अदालतों के कामकाज में प्राय: रूकावटें आती रहीं। कई राज्यों में तो सदस्यों की नियुक्ति में देरी से लंबे समय तक उपभोक्ता अदालतें बंद पडी रहीं। अभी भी देश में 629 उपभोक्ता अदालतों में से 11 उपभोक्ता अदालते रिक्तियों के कारण बंद हैं। नई दिल्ली में चार रिक्तियों के कारण राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत की दो पीठें काम नहीं कर रही हैं। शिकायतों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त ट्रिब्यूनल या पीठों के गठन में देरी से भी अनिर्णित मामलों की संख्या बढ़ती गई। मामलों के निपटारे की जटिल प्रक्रिया और वकीलों द्वारा मामलों को मुल्तवी करवाने से हालात और बिगड़ते गए। परेशानी झेल रहे उपभोक्ताओं के प्रति उपभोक्ता अदालतों के सदस्यों की असंवेदनशीलता और मुआवजे की राशि कम तय किए जाने के कारण भी इस अदालतों से राहत मांगने वालों में हताशा बढ़ी।

न्याय प्रणाली की इन सब कमियों का खुदरा व्यापारियों, उत्पादकों और सेवा मुहैया कराने वालों ने भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने पाया कि उपभोक्ता अदालतों के फैसलों के खिलाफ अपील दायर कर वे वर्षों तक मामलों को खींच सकते हैं तथा इस तरह उपभोक्ताओं को उपभोक्ता अदालतों में शिकायत करने से हतोत्साहित कर सकते हैं। इस प्रवृत्ति का एक प्रतीकात्मक उदाहरण निराकार साहू नामक एक बेरोजगार युवक की शिकायत का है। निराकार साहू ने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत मंजूर किए गए ऋण को जारी न किए जाने की शिकायत एक बैंक के खिलाफ की। निचली उपभोक्ता अदालत ने साहू के पक्ष में फैसला भी सुना दिया। इसके बाद बैंक ने मामले को लटकाए रखने का हर दांवपेंच आजमाया। जब तक राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत द्वारा इस मामले या निपटारा हुआ नौ वर्ष का समय बीत चुका था और प्रधानमंत्री रोजगार योजना खत्म हो चुकी थी।
इसी तरह भाऊसाहेब देवराम पाटील ने पाया कि 13 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद उपभोक्ता अदालत ने निर्देश दिया कि डीलर उनके दोषपूर्ण टीवी सेट की मरम्मत करें या राशि उन्हें लौटा दे। 13 वर्षों बाद यह फैसला निरर्थक हो चुका था। महाराष्ट्र के 129 किसानों ने दोषपूर्ण बीज बेचे जाने के लिए मुआवजे की मांग करते हुए उपभोक्ता अदालत में दस्तक दी थी। उनकी शिकायतों का निवारण होने में इतनी देर हो गई कि 10 किसान फैसला होने से पहले ही काल के गाल में समा चुके थे।
उपभोक्ताओं को शीघ्र और सस्ते में न्याय दिलाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण कानून बनाया गया था। इस कानून के मुताबिक 90 दिनों के भीतर शिकायत का निपटारा कर दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से 25 प्रतिशत मामलों का निपटारा ही इस निर्धारित समय-सीमा के भीतर हो पाता है। 75 प्रतिशत मामलों के निपटारे में पांच महीने से तीन वर्षों तक का समय लग जाता है। यदि राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाती है तब तो मामला और लंबा खींच जाता है। इसके बाद अदालत के आदेश को क्रियान्वित करने में भी देरी होती है।

उपभोक्ता अदालतों के कामकाज के नियमित और सक्षम ऑडिट की जरूरत है। उपभोक्ता अदालतों में वकीलों की उपस्थिति भी नियंत्रित होनी चाहिए। इससे मामलों के निपटारे में कम समय लगेगा और कानूनी प्रक्रिया भी सरल होगी। एक लाख रुपये तक के मामलों में वकीलों की उपस्थिति और अपीलों पर कड़ाई से नियंत्रण होना चाहिए। लगभग 25 प्रतिशत मामले घरेलू उपकरणों और अन्य सामानों की शिकायतों के होते हैं। इन मामलों का निपटारा अदालतों से बाहर किया जा सकता है। इसके लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत को निष्पक्ष तथा प्रभावी पर्यायी विवाद निवारण क्रियाविधि मुहैया कराने के लिए मजबूर कर सकती है। सेवाओं और सामानों के क्षेत्र को विनियमित करने वाले कानूनों के समुचित क्रियान्वयन से भी उपभोक्ता अदालतों का भार हल्का किया जा सकता है। लेकिन इन सब बातों के लिए पहली जरूरी शर्त यह है कि सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें अन्यथा उपभोक्ता संरक्षण कानून की रजत जयंती मनाना निरर्थक साबित होगा।

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