संगाई

संगाई को अंग्रेजी में हूता् ई, लैटिन में णन्ल्े ात्ग्ग् तथा ब्राह्मी भाषा में शामिन व मणिपुरी में संगाई कहते हैं। संस्कृत में उसे रूरू के नाम से जाना जाता है।

मृगपक्षीशास्त्र में रूरू का विवरण निम्नानुसार आया है‡

रुरवस्ते समएव्याता ये भृशं बहुशाखिन:॥
किंचित्तुंग शरीराश्व नाना वर्णक बिंदव:॥
बृहत्खुवा दीर्घकंठा: किंचिद्विकृत देहका:॥
मंदवेगा मंदबला; संतताहार लोलुपा:॥
शीतातपसहा: शांता मृदुरोमावलीयुता:॥
नितरां शद्बभीताश्च निद्रालस्यादिसंयुता॥

अर्थात‡ सिंग को अनेक शाखाएं हों तो उसे रूरू कहते हैं। वे कुछ ऊंचे होते हैं। शरीर पर धब्बे होते हैं। खूर बड़े, कंठ लम्बा व देह कुछ बेडौल होती है।

गति और शक्ति कम होती है। खाने की लालच होती है। ठण्ड, धूप सहन करते हैं। स्वभाव से शांत होते हैं। बाल मुलायम होते हैं। आवाज होते ही बिदक जाते हैं। नींद प्रिय होती है, आलसी होते हैं।

नर हरिण का रंग शीत के दिनों में गहरा नसवारी व गर्मी के दिनों में हल्का बादामी होता है। लेकिन मादा का रंग सालभर हल्का बादामी ही रहता है। शिशु के बदन पर धब्बे होते हैं। इस हरिण की विशेषता यह है कि वह आपकी ओर टकटकी लगाकर देखता रहता है। वह तेज गति से दौड़ने वाला व तेज नजर वाला होता है।

वह झाड़ियों के जंगलों, नदी व पहाड़ों में तैरती दलदल में रहना पसंद करता है। तैरती दलदल उसका अनोखा निवास है। तैरती दलदल सड़ गई वनस्पतियों की मिट्टी की परत से बनती है। वह पानी में तैरती रहती है। इस परत का एक बटा पांच भाग पानी के ऊपर होता है और शेष भाग पानी के नीचे होता है। इस परत पर 15 फुट ऊंचाई के सरकण्डे व घास बढ़ी होती है। इस परत को मणिपुरी भाषा में ‘फुगड़ी’ कहते हैं। ऐसी परत की मुटाई कुछ इंच से लेकर पांच फुट तक हो सकती है। कम मुटाई की परत पर चलें तो आप क्षणभर में नीचे चले जाएंगे। लेकिन संगाई हरिण हजारों वर्षों से इसी पर चलते रहे हैं। इसी कारण उनके पैरों के खूर चौड़े, समतल और बाहर की दिशा मे मुड़े होते हैं। पिछले पैर एक नखी होते हैं। उसकी सहायता से वे फुगड़ी पर से आसानी से चल सकते हैं।

इस तरह के स्थल मणिपुर के लोगटक सरोवर के किनारे हैं। वह कैबूल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान के नाम से पहचाना जाता है। यह तैरती दलदल वाला सरोवर है। संगाई हरिणों का यह राष्ट्रीय उद्यान है। विश्व में अपने किस्म का यह एकमात्र सरोवर है।
जनसंख्या व खेती का रकबा बढ़ने से इस तैरते सरोवर के सरकण्डों व घास को ग्रीष्म में आग लगा दी जाती है। इन सरकण्डों व घास का घर बनाने के काम में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। संगाई की शिकार से भी उन पर संकट छाया हुआ है।

1954 में उनकी संख्या करीब 100 थी। 1966 मेंं आई भीषण बाढ़ से यह संख्या घट कर आधी रह गई। 1974 की गणना में उनकी संख्या 50 थी। 1977 में वह घट कर 18 रह गई। राज्य वन विभाग के प्रयासों से उनकी संख्या 1978 तक 23 हो गई थी।
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