आत्मनिर्भरता एकांगी विचार नहीं है

कोरोना संकट, इस दौरान सेवा कार्यों, आत्मनिर्भर भारत, राम मंदिर से उत्पन्न आत्मसम्मान की भावना आदि अनेक विषयों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह मा. भैयाजी जोशी से ‘हिंदी विवेक’ की विशेष भेंटवार्ता के महत्वपूर्ण अंश यहां प्रस्तुत हैं-

कोरोना के कारण स्थलांतर, बेरोजगारी, आर्थिक एवं सामाजिक संकटों का निर्माण हुआ है। इन समस्याओं से निजात पाना भारत के लिए आवश्यक है। इस संबंध में भारतीय समाज को अपनी सोच किस प्रकार से रखनी चाहिए?

वर्तमान में कोरोना संकट के प्रारंभ में जो समस्याएं निर्माण हो गई उसकी मूल बात को समझना चाहिए। देश के विभिन्न प्रांतों से बड़े-बड़े महानगरों में रोजगार एवं मजदूरी करने के लिए लोग आते हैं। जब वे अपने आपको इस महानगर में असुरक्षित अनुभव करने लगे, उनके रोजगार की आवश्यकताओं की पूर्ति होना असंभव हो गया तब उन्होंने अपने गांव की तरफ कदम बढ़ाने प्रारंभ किए। जब परिवार चलना मुश्किल हो गया, शहरों के सब चिकित्सालय एवं आस्थापनाओं पर बहुत बोझ बढ़ रहा था तब अपनी सुरक्षा के लिए वे अपने गांव की ओर चल पड़े थे। भारतीय संवेदनशील समाज के लिए यह बड़ा वेदना का अवसर था। लोग अपने गांव की ओर पैदल चल पड़े यह बात देखना और महसूस करना बहुत कठिन था। ऐसी मेरी भावना है।
इस समस्या के समाधान के बारे में जब हम सोचते हैं, तो हमें दो-तीन बातों पर विचार करने की आवश्यकता निर्माण हो रही है। सभी राज्यों में बेरोजगारी है, मजदूरी करने वाला वर्ग है। उन राज्यों की परिसर की सभी व्यवस्था राज्य एवं उसी परिसर से पूर्ण होनी चाहिए। कुशल मजदूर नहीं मिलते हैं, इस समस्या के समाधान का जब हम विचार करते हैं तो उन क्षेत्रों में जिस प्रकार के कुशल, अनुभवी और अकुशल मजदूर चाहिए वह उसी स्थान से, उसी राज्य से, उसी परिसर से तैयार होने चाहिए। इस प्रकार का विचार वहां की सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने मिलकर करना आवश्यक है। मजदूरों की कहीं भी कमी नहीं है। जैसे उत्तर प्रदेश का मजदूर रोजगार के लिए बाहर जाता है, वैसे बाहर का मजदूर भी रोजगार के लिए उत्तर प्रदेश में आता है। समस्या का समाधान इसी में है कि अपनी आवश्यकताओं के अनुसार मजदूरों के प्रशिक्षित किया जाए, मजदूरों का विकास किया जाए, मजदूरों के अंदर जो कौशल्य है उन कौशल्य गुणों का विकास किया जाए। उनकी आय का स्रोत बढ़े, मजदूरी के लिए बाहर के राज्यों में जाना ना पड़े। इस पर केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों और सामाजिक संस्थाओं के गंभीरता से सोचने का समय अब आ चुका है।

कोरोना महामारी से लड़ने में भारतीय समाज बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। इस भूमिका को आप किस दृष्टि से देख रहे हैं?

कोरोना महामारी तो विश्वव्यापी हो चुकी है। मैं विश्व के अन्यान्य देशों के बारे में तो कुछ नहीं कह पाऊंगा, लेकिन भारत में प्रारंभिक अवस्था में जो दृश्य हमने देखा वह भयावह था। लेकिन जैसी जैसी समस्या ध्यान में आती गई, तो समाज की सामाजिक संस्थाएं, राजनीतिक संगठन, सेवाभावी संगठन, आध्यात्मिक संस्थाएं संकट में फंसे समाज की मदद के लिए आगे बढ़े। केवल सत्ता पर निर्भर रहकर महामारी के संकट से संघर्ष नहीं किया जा सकता है। जब तक समाज सामने नहीं आता है तब तक समस्या हल होना प्रारंभ नहीं होगी। मैं तो कहूंगा, देश की हजारों सामाजिक संस्थाओं, विभिन्न जाति -बिरादरी की संस्थाओं, मठ -मंदिरों, गुरुद्वारों, जैन मंदिरों आदि सभी ने आगे बढ़कर कोरोना संकट से जूझ रहे जरूरतमंदों को सहयोग का हाथ दिया। सहयोग के लिए सभी ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। दुनिया में ऐसा दृश्य शायद ही कहीं दिखाई दिया होगा। भारत के जन सामान्य का इस संकट के समय जो व्यवहार रहा है, वह श्रेष्ठ स्तर का था। कारण मैं यही मानता हूं जो हिंदू जीवन शैली है, जीवन पद्धति है। हिंदू समाज का जो चिंतन है, वह सर्वे भवंतु सुखिनाः का चिंतन है। समाज की इस प्रकार की सोच के कारण ही यथाशक्ति अपना योगदान संकट से पीड़ित बंधुओं के लिए मिलता गया। मैं समझता हूं कि भारत की एक अलग पहचान संपूर्ण विश्व को इस कोरोना के संकट के कारण हुई है।

सेवा यह संघ का स्थायी भाव है। कोरोना संकट और लॉकडाउन के समय संघ के सेवा कार्यों का विराट दर्शन समाज ने किया है। इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए?

संघ में तो अपनेपन का संस्कार मिलता है। सारा समाज अपना है, समाज के प्रति आत्म संवेदना जीवंत रखने का संस्कार संघ देता है। ऐसे अवसरों पर स्वाभाविक रूप में संघ स्वयंसेवक पीड़ितों की सहायता के लिए दौड़कर आगे आते हैं। संकट के समय जीवन से जुड़े अनेक प्रश्न खड़े हुए थे। लोगों को दवाइयां चाहिए थीं, भोजन चाहिए था, सुरक्षा की व्यवस्था चाहिए थी और अन्य अन्य आवश्यक बातें पीड़ितों को अपेक्षित थीं। वे सभी सेवाएं संघ स्वयंसेवकों ने कोरोना संकट के प्रारंभ में देना शुरू किया। लेकिन समस्या जैसे जैसे और भी विकराल होती गई तब प्रशासन की व्यवस्था कम पड़ने लगी, प्रशासन को भी सभी तरह की सेवा के लिए सहायता की आवश्यकता निर्माण हुई। संघ स्वयंसेवकों ने शासकीय व्यवस्था से तालमेल करते हुए शासन की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप में चलाने के लिए आवश्यक सहयोग किया है। सामान्य व्यक्ति स्वास्थ्य के संदर्भ में सेवा तो नहीं दे सकता लेकिन स्वास्थ्य से जुड़ी मदद जरूर कर सकता है। महामारी ने संघ स्वयंसेवकों को सभी बातें सीखने के लिए प्रेरित किया। स्वास्थ्य से जुड़ी हुई सेवाएं हम और अच्छी तरह से किस प्रकार दे सकते हैं? शासन की व्यवस्था में जो बोझ निर्माण हो गया है उसे कम कैसे कर सकते हैं? शासकीय कर्मचारियों को सहायता की आवश्यकता थी। शासन की जो जो योजनाएं हैं, जैसे सर्वे करना है, सामग्री वितरण करना है, कहीं पर भीड़ का प्रबंध करना है ऐसे सभी प्रकार के कार्यों में स्वयंसेवकों ने शासन से तालमेल मिलाकर काम किया है।

गांव के लिए निकले मजदूर जिस वेदना से गुजर रहे थे उनकी सभी आवश्यकताओं को समझ कर शासन के कार्य में स्वयंसेवकों ने सहयोग देने का काम किया है। कोरोना महामारी में हमने एक नए संकट को महसूस किया। कोरोना के कारण मृत्यु होने के बाद भय के कारण अंतिम संस्कार करने के लिए उनके रिश्तेदार भी आगे नहीं आ पाते थे। इस प्रकार की अजीब कठिनाइयां सामने आ रही थीं। ऐसे समय में आवश्यक सावधानियां लेते हुए कोरोना वायरस के कारण मृत्यु हुए सैकड़ों मृतदेहों का अंतिम संस्कार संघ के स्वयंसेवकों ने किया है। स्वयंसेवकों के भिन्न भिन्न प्रकार के सेवाओं का अनुभव समाज ने इस करोना कार्य काल में लिया हुआ है। जान का जोखिम उठाकर किया गया यह काम था। इसके कारण कई स्वयंसेवक कोरोना से पीड़ित भी हो गए हैं। लेकिन इसकी चिंता ना करते हुए आज की यह आवश्यकता है, हमें यह करना चाहिए इस आत्मीय भाव से देशभर के सभी प्रांतों में स्वयंसेवकों ने अपना योगदान दिया है।

आत्मनिर्भर भारत की व्याख्या किस प्रकार से अपेक्षित है? आप की दृष्टि में आत्मनिर्भर भारत का सही अर्थ क्या है?

संपूर्ण विश्व जो चलता है वह परस्पर सहयोग के आधार पर चलता है। मैं सहयोग के आधार की बात नहीं कर रहा हूं। परस्पर सहयोग के आधार की बात है। जब हम वसुधैव कुटुंबकम् की बात करते हैं, तब उसका मतलब यही है कि सारी मानव जाति एक है। परंतु जैसे सारी मानव जाति समूह एक है, वैसे एक एक व्यक्ति भी व्यक्तिगत होता है। कोई भी व्यक्ति स्वाभिमान से जीना चाहता है। कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में आत्मनिर्भर होकर जीना चाहता है। इसका विस्तार हम और बढ़ाते हैं तो आत्मनिर्भर होने में सबकी अपनी अपनी प्रतिष्ठा है। जब आत्म सम्मान की बात आती है, आत्मनिर्भर व्यक्ति ही दूसरे का सम्मान और सहयोग कर सकता है। सक्षम बन सकता है। हम चाहते हैं दुनिया के सभी लोग आत्मनिर्भर बने। सभी देश आत्मनिर्भर बने और दूसरों पर जो अवलंबित रहता है वह परावलंबन का भाव समाप्त हो। अपना सामर्थ्य बढ़ाएं और अपने सामर्थ से दूसरों की समस्या में सहयोग करें। आत्मनिर्भर होना यह किसी प्रकार से एकांगी विचार नहीं है। आत्मनिर्भरता विचार किसी के विरोध में नहीं है। बहुत सकारात्मक चिंतन है ये। कोई भी स्वावलंबन और सम्मान के साथ रहना चाहता है। इस कोरोना संक्रमण के काल में विश्व को आत्मनिर्भर बनने का विचार भारत ने दिया है। किसी भी देश के खिलाफ बात नहीं है। आत्मनिर्भर बनना यही इस विचार की बात है।

स्वदेशी की ओर हमें मार्गक्रमण करना है, यह संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश की जनता को दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वदेशी का मंत्र अपने प्रारंभ से दे रहा है। स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत इस विषय को आप एक दुसरे से किस प्रकार से जोड़ सकते हैं?

देश के प्रधानमंत्री जी ने स्वदेशी के लिए स्थानीय उत्पादकों को बढ़ावा मिले यह बात कही है। उन्होंने शब्दप्रयोग किए हैं कि लोकल के लिए हो वोकल बनिए, स्थानीय बातों के लिए बोलने वाले बनिए। इसका सीधा संबंध बनता है सब प्रकार की व्यवस्थाएं विकेंद्रित होनी चाहिए। बड़ी-बड़ी कंपनियों पर आवश्यकता के अनुसार हम निर्भर रहेंगे लेकिन कई उत्पादन ऐसे हैं जिनके लिए बड़े उद्योगों की आवश्यकता नहीं है। छोटे छोटे स्तर पर वहां व्यवस्था हो सकती है। कुटीर उद्योग, लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सकता है। स्थान स्थान पर निर्माण हुए उत्पादन की बिक्री अगर वहीं पर होती है तो जिला, तालुका, गांव स्तर पर ही उत्पादनों के विपणन की व्यवस्था हो सकती है। कुछ उत्पादन ऐसे हैं जो तहसील के स्तर तक पहुंच सकते हैं। कुछ उत्पादन ऐसे हैं जो शहर -राज्यों के स्तर तक पहुंच सकते हैं। और कुछ उत्पादन ऐसे भी होंगे जो राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जा सकते हैं। विकेंद्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने का संकल्प यानी स्थानीय उत्पादनों के लिए बोलने वाले बनिये। इसमें कहीं भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध नहीं है। कोरोना के कारण निर्माण हुई स्थितियों में इस प्रकार के विचार करने का अवसर हमें प्राप्त हुआ है। हमें अधिकाधिक स्थानीय उत्पादनों को महत्व देना है। विकेंद्रित व्यवस्था के संदर्भ में सोचने का अवसर हमें मिला है, जो भारत के मूल व्यवस्था है। इसी को दूसरे शब्दों में हम स्वदेशी कहते हैं। दुनिया भर की अलग-अलग बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपना वर्चस्व स्थापित करें, इससे अच्छी यह बात है कि यहां की छोटी-छोटी कंपनियों का उत्पादन स्थान स्थान पर होता जाए तो इसी में भारत का कल्याण है ऐसा हमें लगता है।

आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को प्रत्यक्ष रूप में लाते समय वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को हम नजरअंदाज तो नहीं कर रहे? वैश्वीकरण के युग में आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना हमें विश्व से जोड़ेगी या तोड़ेगी?

कहीं भी तोड़ने का संबंध नहीं है। भारत का जो चिंतन है वह परस्पर अवलंबन का है। कोई भी व्यक्ति या समूह अपनी सारी आवश्यकताएं अपने बल पर पूरी नहीं कर सकता। उसकी अपनी एक एक मर्यादा होती है, संसाधनों की मर्यादा होती है, बौद्धिक क्षमताओं की मर्यादा होती है, ढांचागत व्यवस्थाओं की मर्यादा होती है। इसलिए वसुधैव कुटुंबकम् की जब हम बात करते हैं, तो उसमें परिवार के हर सदस्य की भूमिका होती है। उनकी यह भूमिका एक दूसरों के लिए बाधा नहीं बन सकती है। बल्कि एक दूसरों के उपयुक्त बन सकती है। वसुधैव कुटुंबकम् की संकल्पना में एक कोई व्यवस्था चलाएं और बाकी सब उनके अनुसार चलें ऐसा नहीं है। एक परिवार में भी परिवार के हर सदस्य की अपनी-अपनी भूमिका होती है। वसुधैव कुटुंबकम् की संकल्पना में पूरे विश्व में कई प्रकार की भिन्नता है। उसके कारण एक नहीं हो सकते हैं, भारत के चिंतन में कभी भी एकरूपता की बात नहीं कही गई है। एक होकर चलने की बात कही गई है। एकरूप बनना और एक होकर चलना इन दोनों में अंतर है। एक होकर चलने में सब मिलकर चलते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् की कल्पना में विकेंद्रीकरण का कोई भेद नहीं है। हम यही चाहते हैं कि हम एक सूत्र में एक विचार लेकर चलें। एक दिशा लेकर चलें। परस्पर सहयोग के साथ चलते रहें। एक दूसरे की कठिनाइयों को समझ कर चलें। इसलिए हम कहेंगे आत्मनिर्भर हर क्षेत्र, आत्मनिर्भर हर जाति-बिरादरी, संपूर्ण भारत होना चाहिए। वसुधैव कुटुंबकम् की कल्पना को इससे कोई हानि नहीं पहुंचेगी। मिलकर एक दिशा में चलना यह एक होकर चलना है। कंधे से कंधा लगाकर चलना यही वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश है। इसलिए चलने वाला हर व्यक्ति आत्मनिर्भर हो, इसका मतलब है हर देश आत्मनिर्भर हो। इसी दिशा में हम चलना चाहते हैं।

जन-जन के मन में बसे राम का मंदिर का शिलान्यास संपन्न हो गया है। भारत को आत्मनिर्भर बनाने में राम मंदिर निर्माण की भूमिका सहायक हो सकती है, इस प्रकार की भारतीय जन की धारणा है। हिंदू समाज की यह धारणा क्यों है?

राम मंदिर का मुद्दा आत्मनिर्भरता से ज्यादा आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ है। श्रद्धा, भावना यह अलग बात होती है। व्यवहार के धरातल पर कुछ बातें अलग होती हैं। इसलिए राम मंदिर के साथ आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा हमारे समाज में है। इसके पीछे का कारण है कि हम सशक्त होते जाएंगे। भगवान राम के जीवन का संदेश क्या है? सभी समर्थ हो। सभी शक्तिशाली हो। अपनी रक्षा हम स्वयं करें ऐसा समाज बने। मै सोचता हूं कि भगवान राम के जीवन का संदेश क्या है? भगवान राम से मर्यादा शब्द जुड़ा है। हर व्यक्ति को अपनी मर्यादा में रहने का संदेश मिलता है। राम से पुरुषोत्तम शब्द जुड़ा है। हर व्यक्ति उत्तम होना चाहिए, श्रेष्ठ संस्कार होने चाहिए, श्रेष्ठ विचारों का होना चाहिए, इसी को पुरुषोत्तम कहा जाता है। मर्यादा भी है, पुरुषोत्तम भी है। हजारों वर्षों के बाद भी किसी अच्छी व्यवस्था का वर्णन किया जाना हो तब रामराज्य का उल्लेख किया जाता है। महात्मा गांधी जी ने भी स्वराज्य की बात करते समय रामराज्य की बात कही थी। हर कुशल प्रशासक रामराज्य की दृष्टि को लेकर चलता है। रामराज्य में सभी के सुखों की और संपन्न होने की कल्पना है। समाज मे निर्भय भाव निर्माण होने की संकल्पना है। इसीलिए मैं समझता हूं राम मंदिर यह सिर्फ एक मंदिर का विषय नहीं है। हम सबको, सारे विश्व को आदर्श जीवन की दिशा देने वाला मार्गदर्शक विषय है। आत्मनिर्भरता के साथ-साथ आत्मसम्मान से यह देश खड़ा रहेगा यह संदेश देने वाला यह राम मंदिर है। इसलिए हमें पुरुषोत्तम बनना है, आदर्श व्यवस्थाओं को निर्माण करना है यही संदेश यह राम मंदिर संपूर्ण विश्व को दे रहा है। इसी कारण भव्य मंदिर की संकल्पना को लेकर संपूर्ण समाज राम मंदिर से जुड़ रहा है, ऐसा मुझे लगता है।
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